उम्र की डोर से फिर एक मोती झड़ रहा है…. तारीख़ों के जीने से दिसम्बर फिर उतर रहा है.. कुछ चेहरे कई घंटे, चंद और यादें जुड़ गई वक़्त में…. उम्र का पंछी नित दूर और दूर निकल रहा है.. गुनगुनी धूप और ठिठुरी रातें जाड़ों की.. गुज़रे लम्हों पर झीना-झीना सा इक पर्दा गिर […]
एक मोती झड़ रहा है
