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विशेष संपादकीय

मेरे मानस के राम ,अध्याय – 44 : रावण का युद्ध के लिए प्रस्थान

(सुपार्श्व मंत्री ने रावण से कहा कि तुम्हें इस समय सीता जी को मारने की निम्नस्तरीय सोच का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए, अपितु अपने परमशत्रु राम के विनाश की योजना पर काम करना चाहिए। इसके लिए आपको एक वीर योद्धा का परिचय देते हुए युद्ध के मैदान में जाकर राम से युद्ध करना अपेक्षित है। कल चैत्र की अमावस्या के दिन यह युद्ध होना उचित रहेगा । पाठक वृंद ! यहां पर ध्यान देने का कष्ट करें कि यह युद्ध चैत्र की अमावस्या के दिन हुआ था। इसकी स्पष्ट सूचना वाल्मीकि कृत रामायण में मिलती है। जबकि लोक प्रचलित मान्यता है कि कार्तिक मास में दशहरा के दिन युद्ध हुआ था। कार्तिक मास की अमावस्या को युद्ध होने की गलत धारणा को छोड़कर हमें सत्य को ग्रहण करना चाहिए। रावण का अंत करने के पश्चात श्री राम चैत्र के माह में षष्ठी तिथि को सही समय पर अयोध्या लौट आए थे।
उसी दिन उनका वनवास हुआ था। इस प्रकार पूरे 14 वर्ष पूर्ण करने के पश्चात श्री राम अयोध्या लौटे। उन्होंने अपने भाई भरत को भी यही वचन दिया था कि 14 वर्ष पूर्ण होने के पश्चात वह अयोध्या लौट आएंगे। )

अमावस्या कल चैत्र की, करो युद्ध लंकेश।
दशरथ नंदन राम का, कर दो नाश नरेश।।

मंत्री के सुनकर वचन, लौट गया लंकेश।
सुबह हुई – चला युद्ध को, सही समय लंकेश।।

विजय अभिलाषी राक्षस, विजय का कर रहे नाद ।
आगे बढ़ते जा रहे , करते हुए सिंहनाद ।।

समय यदि प्रतिकूल है , मत समझो प्रतिकूल।
प्रयास सदा ही कीजिए , हो जावें अनुकूल।।

जब रावण के अनेक योद्धा संसार से जा चुके थे तो उस समय उसके बचे हुए योद्धाओं का मनोबल टूट चुका था। वह लड़ाई तो लड़ रहे थे पर अब उन्हें अपनी पराजय अपने सामने खड़ी दिखाई दे रही थी। रावण भी इसी भावना से ग्रस्त था। वाल्मीकि जी ने रामायण में अपने हर पात्र के साथ न्याय करते हुए उसके चरित्र का सही-सही चित्रण करने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। वह रावण को हठीला और अभिमानी तो दिखाते हैं पर युद्ध से वह भागने की भी सोच रहा होगा , यह कहीं भी नहीं दिखाया गया। उसकी वास्तविक मानसिकता का सही-सही चित्रण करने का वाल्मीकि जी ने सफल प्रयास किया है। रावण के कुछ बचे हुए वीर योद्धाओं में से चुने हुए योद्धा आज युद्ध क्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुए थे।

उस दिन किया सुग्रीव ने , विरुपाक्ष का अंत ।
उसका भय तब व्याप्त था, दिग और दिगंत।।

रोमांच को था पा गया , उस दिन का संघर्ष ।
विजय हुई सुग्रीव की , हुआ वीर उत्कर्ष।।

महोदर भी पहुंचा दिया , सीधा ही यमलोक ।
शत्रु उस पर कर रहे , मिलकर सारे शोक ।।

कर दिए सुग्रीव ने , दो – दो शत्रु ढेर।
गर्जन उसकी मान लो , जैसे वन में शेर।।

मित्र वही संसार में , करे मित्र का मान।
अपने सम ही मानता , मित्र का अपमान।।

अंगद ने दिखला दिया , वह कितना बलवान।
महापार्श्व का अंत कर , तोड़ दिया अभिमान ।।

तुमुल नाद करने लगे , वानर दल के लोग।
शत्रु दल भगने लगा , छा गया गहरा शोक।।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है। )

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