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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

देश का विभाजन और सावरकर, अध्याय 10 ( क ) गांधी – नेहरू की आत्महीनता

आजकल हम अक्सर अखंड भारत की बातें सुना करते हैं। इस अखंड भारत में आज के अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, सिक्किम, भूटान, बर्मा, श्रीलंका और मालदीव को सम्मिलित कर लिया जाता है। हम सोच लेते हैं कि यही अखंड भारत है। जहां तक जिसकी सोच और दृष्टि जाती है वहीं तक वह भारत को अखंड मानकर उसका एक कल्पित मानचित्र अपने मानस में अंकित कर लेता है। यदि भारत की चक्रवर्ती सम्राटों की परंपरा पर दृष्टिपात किया जाए तो पता चलता है कि भारत वर्ष कभी संपूर्ण भूमंडल पर राज करता था। इस दृष्टिकोण से तो संपूर्ण भूमंडल ही भारत नाम के राष्ट्र की परिकल्पना का साकार स्वरूप होता दृष्टिगोचर होता है। महाभारत काल तक आते-आते भारतवर्ष का मानचित्र सिमटता गया। तब इसे 16 जनपदों में विभाजित किया गया था । उस समय के 16 जनपदों को यदि देखा जाए तो वह भी अलग- अलग लगभग एक देश जैसे ही थे।
महाभारत युद्ध के पश्चात सर्वप्रथम सम्राट अशोक ने भारत की राष्ट्रीय अखंडता को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने शस्त्र से अधिक शास्त्र को वरीयता दी। जिसका परिणाम यह हुआ कि उसकी मृत्यु के उपरांत भारतवर्ष पर राक्षस प्रवृत्ति के लोगों के आक्रमणों की प्रक्रिया आरंभ हो गई थी। इसका कारण केवल एक था कि सम्राट अशोक ने शास्त्र को शस्त्र से आगे कर दिया था। सम्राट अशोक यह भूल गए थे कि उनके राजवंश की स्थापना के समय चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य ने जिस नीति पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया था, वह शस्त्र को आगे रखकर शास्त्र की रक्षा करने का संकल्प था। यह बात पूर्णतया सत्य है कि :-

जब-जब शासक हथियारों से मुंह फेर खड़ा हो जाता है।
तब तब शत्रु घातक बनकर मानिंद गिद्ध की मंडराता है।।

 सम्राट अशोक के वंश के अंतिम उत्तराधिकारी ब्रहद्रथ को उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने मौत के घाट इसीलिए उतार दिया था कि उसके समय में ग्रीक राजा मिनिंदर ने भारत की अखंडता को तार-तार करने का प्रयास किया था और राजा हाथ पर हाथ धरे बैठा रह गया था। तत्कालीन बौद्ध धर्म के धर्माचार्य  राक्षस प्रवृत्ति के ग्रीक राजा मिनिंदर को अपनी सहायता दे रहे थे जो उस समय सनातन धर्म के विनाश का संकल्प ले चुका था। मिनिंदर चुपचाप बौद्ध धर्माचार्यों से सनातन धर्म के विनाश के संबंध में अपनी सांठगांठ कर चुका था।

सम्राट अशोक की भूल

कई लोग ऐसे हैं जो यह मानते हैं कि महात्मा बुद्ध की शस्त्र ना उठाने की रणनीति को अपनाकर सम्राट अशोक ने बड़ा काम किया था। उनका मानना है कि अशोक सम्राट के कारण भारत की अहिंसावादी नीति का प्रचार- प्रसार संसार में हुआ और भारत को इससे सम्मान प्राप्त हुआ। वास्तव में ऐसा विचार भारत के इतिहास का एक बहुत बड़ा घोटाला है। यह एक ऐसा घपला है, जिसने हमें अपने अतीत का सही-सही मूल्यांकन करने से रोका है। सम्राट अशोक के हथियार फेंक देने का परिणाम यह हुआ कि राक्षस प्रवृत्ति के लोगों को भारत का अहिंसावाद अपने उद्देश्यों की पूर्ति को लेकर सबसे अधिक अनुकूल लगा। यही कारण रहा कि अशोक के शासन के पश्चात भारत राक्षसों के आक्रमणों की क्रीड़ास्थली बन गया। अशोक के पश्चात अंग्रेजों के आने तक जितने भर भी राक्षस प्रवृत्ति के लोगों ने भारत पर आक्रमण किए वह सबके सब मानवता के शत्रु थे , क्योंकि उन्होंने शांतिपूर्वक जीवन जीने वाले लोगों के अधिकारों का हनन किया, उनका अपमान किया, अप्रत्याशित अत्याचार किए और उनकी बहन बेटियों का शीलभंग किया। अत्यंत पीड़ादायक यातनाएं दे-देकर जनसंहार किए।

जनसंहारी बनकर आए गिद्ध हमारे भारत में,
लूटपाट और मारकाट सर्वत्र मचाई भारत में।
थर-थर कांप रही मानवता दया दुष्ट को ना आई,
हिंसा तांडव करती थी, अहिंसा वादी भारत में।।

अशोक की भूल फिर दोहरायी गई

यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो लोग भारत में अत्याचार करते हुए प्रवेश करने और यहां पर अपना स्थायी निवास स्थापित करने में किसी भी प्रकार सफल हो गए थे, वही समय आने पर नए देश की मांग करने लगे। इन अत्याचारियों के अत्याचारों पर पर्दा डालकर कई इतिहासकार ऐसे खड़े हुए जिन्होंने इनकी राक्षस वृत्ति को उदारता और क्रूरता को वीरता में परिवर्तित करने का प्रयास किया। उनके लिए भारत की एकता और अखंडता के प्रति संकल्पित होकर अपनी शिखा खोलने वाले चाणक्य के महान राष्ट्रवादी चिंतन और प्रयासों का कोई मूल्य नहीं। इनके लिए पुष्यमित्र शुंग अपने कायर और देशद्रोही राजा का वध करने पर हत्यारा हो जाता है और जिन लोगों ने इस देश के टुकड़े-टुकड़े करने के लिए दिन-रात काम किया और काम करते-करते अपने प्रयास में कई बार सफल भी हुए , वे इनके लिए मानवतावादी और उदारवादी बने हुए हैं।
वास्तव में इस प्रकार का चिंतन देश के लिए गांधीजी की सबसे बड़ी देन है। गांधी जी ने इस प्रकार के चिंतन को देकर सम्राट अशोक की गलतियों से शिक्षा न लेकर उन्हें एक बार फिर से दोहराने का काम किया। जिस कार्य को पुष्यमित्र शुंग के समय में बौद्ध धर्माचार्य ग्रीक राजा मिनिंदर को अपना सहयोग और आशीर्वाद देकर कर रहे थे, थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ गांधीजी उसी काम को मुस्लिम लीग और अंग्रेजों के साथ मिलकर देश के सनातन मूल्यों के विरुद्ध कर रहे थे। पात्र वही थे, भूमिका वही थी, केवल चेहरे-मोहरे बदल गए थे।

पात्र वही और वही भूमिका ,चेहरे – मोहरे बदल गए,
जो लोग हमारे अपने थे , अब तेवर उनके बदल गए।
हिंदू का खून पानी समझा, मुस्लिम उनको प्यारे थे,
लोग दोगले – बात दोगली, कर देश का कतल गए।।

इस देश की मूल विचारधारा ने या राष्ट्र की आत्मा ने ऐसे किसी भी राक्षस आक्रमणकारी को यहां बसने की अनुमति नहीं दी, जिसने किसी काल विशेष में मां भारती के टुकड़े करने का काम किया अथवा यहां के लोगों पर अप्रत्याशित और अमानवीय अत्याचार करते हुए अपनी क्रूरता के कीर्ति स्तंभ स्थापित किए। देश के टुकड़े कराने वाला जिन्नाह उन्हीं क्रूर राक्षस आक्रमणकारियों का मानस पुत्र बन चुका था जो भारत के लोगों पर अपने तथाकथित पूर्वजों द्वारा किए गए अत्याचारों को मानवीय बताकर उनकी वकालत कर रहा था और अपने स्वयं के हिंदू अतीत को भुलाकर अपने हिंदू भाइयों का गला काटने के लिए खड़ा हो गया था। यदि गांधी और नेहरू उस राक्षस वृत्ति को जिन्नाह के रूप में प्रोत्साहित कर रहे थे जो देश के टुकड़े कराने में अतीत में भी सहायक रही थी तो गांधी और नेहरू के ऐसे आचरण को किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता।

गांधी जी को समझना चाहिए था…..

गांधीजी और नेहरू जी को यह बात समझ में आनी चाहिए थी कि जहां-जहां इस्लाम ने अपना अधिक फैलाव किया , वहीं – वहीं देश कटते – बंटते चले गए। बाहरी देशों के उदाहरण को आगे रखकर गांधी – नेहरू को अपने देश भारत के बारे में भी यह समझना चाहिए था कि जब अफगानिस्तान में मुसलमान अधिक हो गया तो एक समय ऐसा आया, जब यह देश भारत से स्थायी रूप से अलग हो गया। इसी देश को अपना शिविर बनाकर या अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए इसे अपने लिए एक आदर्श बनाकर लोगों ने देश को तोड़ने के लिए फिर काम करना आरंभ किया। परिणामस्वरूप आज के पाकिस्तान के तत्कालीन भारतीय भू-भाग पर विदेशी मजहब को मानने वाले लोगों की जब संख्या बढ़ी तो वह भी अलग देश मांगने की बात करने लगे। मजहब के नाम पर अफगानिस्तान का एक अलग देश बना पाकिस्तान की मांग करने वालों के लिए एक अच्छा और आदर्श उदाहरण था। सावरकर जी या किसी भी हिंदूवादी नेता पर देश तोड़ने का आरोप लगाने वाले इस तथ्य को भी गहराई से समझें। गांधी जी को भी समय रहते इस तथ्य को समझना चाहिए था और इस्लाम के मौलिक चिंतन और आचरण की गंभीरता से पड़ताल करनी चाहिए थी।

जब दोगले नेता बनें देश के तब देश रसातल जाता है,
तेजस्वी जब नेता होता तब भवि उज्जवल हो जाता है।
यदि पसर चुकी हो कायरता तो देश की हत्या होती है,
पौरुष के प्रताप से बन्धु ! सब संभव बन जाता है।।

जब पाकिस्तान बना तो उस समय कुछ लोग नारा लगा रहे थे कि ‘हंस के लिया पाकिस्तान लड़ के लेंगे हिंदुस्तान’ उनके इस नारे का निहित अर्थ यही था कि वह जैसे अफगानिस्तान को अपना शिविर बनाकर पाकिस्तान लेने में सफल हो गए थे, वैसे ही पाकिस्तान को शिविर बनाकर सारे भारत को मिटाने के सपने संजोने लगे।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह लेख मेरी नवीन पुस्तक “देश का विभाजन और सावरकर” से लिया गया है। मेरी यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स दिल्ली से प्रकाशित हुई है जिसका मूल्य ₹200 और पृष्ठ संख्या 152 है।)

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