यही स्थिति हम किसान के अन्य उत्पादों के बारे में देखते हैं। आप आलू का उदाहरण लें। आलू किसान से 10-12 रूपया प्रति किलो के हिसाब से क्रय किया जाता है। जिसे हम बाजार में हम 20-25 रूपये प्रति किलो से खरीद रहे हैं। किसान की लागत और अपनी मजदूरी सब लगभग बराबर पर छूट जाते हैं। बेनी जी जरा समझो। एक किसान के लिए आपकी सरकार यूरिया का कट्टा 350 रूपये में तथा डाई का कट्टा लगभग 950 रूपये का उपलब्ध करा रही है। इसके अलावा अन्य कीटनाशकों और रासायनिक खादों की कीमत अलग है। खेतों की जुताई निराई गुड़ाई पानी आदि का खर्चा अलग है। एक बीघा खेत की निराई के लिए एक मजदूर कम से कम 600 रूपया लेता है, जबकि पानी की लागत (डीजल ईंजन से) कम से कम 100 रूपया प्रति बीघा एक बार के लिए आती है, जुताई की लागत भी प्रति बीघा खेत से लगभग 400 रूपया आती है। इस प्रकार खाद-पानी-जुताई आदि की लागत मूल्य प्रति बीघा 2500 रूपये से अधिक है। गेंहूं का अधिकतम उत्पादन 4 कुंतल प्रति बीघा है। जिसकी कीमत 1250 रूपये प्रति कुंतल से 5000 रूपया होती है। गेंहूं की कटाई के लिए एक मजदूर एक मन अनाज प्रति बीघा लेता है और गेंहूं निकासी की मजदूरी अलग रह जाती है। यदि इसे लगाया जाए तो कुल उत्पादन में लगभग डेढ़ मन और कम कर दो जिससे उत्पादन प्रति बीघा हुआ लगभग साढ़े 8 मन। जिसकी कीमत हुई 4250 रूपया। गेंहूं की खेती पर प्रति बीघा लागत आयी 3250 रूपया तथा उत्पादन हुआ 4250 रूपया। यह भी तब है, बेनी जी! जबकि सूखा ना पड़े, ओलावृष्टिï ना हो, अधिक वारिश ना हो जाए, तेज हवा से फसल गिर ना जाए, या फसल में कोई रोग ना लग जाए। तब चार माह तक एक परिवार एक हजार रूपया प्रति बीघा कमा रहा होता है। एक परिवार में कम से कम 5 आदमी भी लगायें तो पांच आदमी 1000 रूपया प्रति बीघा कमाकर कितनी देर प्रतियोगिता में टिक सकते हैं? बेनी जी, महंगाई के परली और और खड़े किसान की इस समस्या पर आपका क्या कहना है? अपनी चीजें महंगाई में भी सस्ते दर पर बेचने के लिए अभिशप्त किसान सस्ती दर पर चीजें बेचता है और महंगी खरीदता है। बेनी जी आप सही तब हो सकते हैं जब किसान को उसका उत्पादन का सही मूल्य दिलाओ। दूध के बिचौलियों को बीच से हटाओ, किसान से सीधे दूध खरीदो। उसे कम से कम 30 रूपया प्रति किलो दूध का मूल्य दो। आपको नही पता कि किसान से शुद्घ दूध लेकर बीच में उस शुद्घ दूध में कितनी मिलावट कर दी जाती है और उसे पीने के योग्य ही नही छोड़ा जाता। जो लोग इस प्रकार के कार्यों में लगे हुए हैं, उन्हें बीच से हटा दो। क्योंकि किसान की बदहाली का और देश में मिलावटी चीजों के माध्यम से बीमारी परोसने का जिम्मेदार यही वर्ग है। आप आलू जैसे उत्पादन पर पुन: विचार करें। आलू चिप्स के एक पैकेट में मुश्किल से 50 ग्राम चिप्स होते हैं, जिनकी कीमत कम से कम 10 रूपया है। यानि एक किलो चिप्स की कीमत 200 रूपया होती है। इस प्रकार किसान का एक किलो आलू चिप्स के माध्यम से 200 रूपया में बिकता है लेकिन इसका लाभ किसे मिलता है? यदि यह लाभ किसान को देने के लिए रणनीति बनायी जाए और उसे चिप्स बनाने या कोल्ड स्टोरेज में आलू रखने के लिए प्रेरित किया जाए तो वह तो खुशहाल होगा ही बिचौलियों के हटने से महंगाई भी नियंत्रित होगी। आज भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना ही ये है कि यहां बिचौलियों से चंदा लेकर राजनीति की जाती है। इन बिचौलियों को इनके राजनीतिक आका पहले खूब कमवाते हैं फिर उनकी कमाई में अपना हिस्सा लेते हैं और अपनी राजनीति चमकाते हैं। असल समस्या पर किसी का ध्यान नही जाता या जानकर उस ओर ध्यान दिया नही जाता।
विपक्ष की ओर से बेनी प्रसाद वर्मा के बयान पर भी शोर तो मचाया गया है पर दर्द की दवा नही की गयी है। बेनी अनाड़ी वैद्य कहे जा सकते हैं जिन्होंने किसान के दर्द को अनजाने में हवा दे दी है पर वह इसका उपाय या उपचार नही जानते। वह पुराने समाजवादी हैं, परंतु आज वह कांग्रेसी हैं। उनका समाजवाद सत्ता के गलियारों में कहीं दबकर रह गया लगता है, इसलिए वह एक अनाड़ीपन से भरा हुआ बयान दे गये हैं। किसान की चिंता तो उन्हें है परंतु किसान आज पहले से भी बदत्तर जीवन क्यों गुजार रहा है? इसका चिंतन उनके पास नही है। किसान की राजनीति वह करना चाहते हैं परंतु वह ये नही जानते कि किसान के दिल पर हुकूमत कैसे की जा सकती है? वह किसान की समृद्घि तो चाहते हैं परंतु यह नही जानते कि किसान समृद्घ कैसे होगा? महंगाई देश में बढ़ रही है। इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव किसान पर पड़ता है। आप पेट्रोल महंगा करें, तो माना ये जाता है कि इसका प्रभाव किसान पर नही पड़ेगा। लेकिन होता ये है कि उसका प्रभाव भी किसान ही पड़ता है। मार्केट में जो चीजें पेट्रोल की कीमतें बढऩे से महंगी होती हैं, उन्हें जब एक किसान खरीदता है तो वह भी पेट्रोल की बढ़ी कीमतों के दुष्प्रभाव को झेल रहा होता है।
अब बेनी जी स्वयं सोचें कि वह कितने सही और कितने गलत हैं? सचमुच किसान के लिए इस दौर में अपने बच्चे पढ़ाना और उन्हें आगे बढ़ाना बड़ा कठिन हो गया है। जब सूखा पड़ती है तो वह आकाश में बनने वाली हर बदरिया के बरसने की नजरों से उसकी ओर टकटकी लगाकर देखता है और जब अति वृष्टि होती है तो भी वह हर बरसते बादल की ओर इस दृष्टि से देखता है कि बस अब काफी हो गया, वरूण देव बंद हो जाओ। आज वह ऐसी ही नजरों से बेनी जी आपकी ओर देख रहा है कि अपने समाजवादी स्वरूप को पहचानो और कुछ करो। बहुत देर हो चुकी है यदि आप भारत के किसान के बारे में वास्तव में चिंतित हैं तो भारतीय राजनीति को सही दिशा दो। किसान के दर्द का बेहतर इलाज यही होगा।
लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है