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कविता

गीता मेरे गीतों में , गीत 58 ( गीता के मूल ७० श्लोकों का काव्यानुवाद)

विश्व रूप का दर्शन करना

अनेकों रूप ईश्वर के जिन्हें मैं योग से जाना।
तू भी देख ले अर्जुन! कितने रूप हैं नाना।।

जो तूने देखा नहीं अब तक , उसे तू देख ले अर्जुन।
मेरे में सिमटा हुआ सारा यह संसार है अर्जुन।।

विश्व के दर्शन करा दिए , एक ब्रह्म तत्व में कृष्ण ने।
‘एक’ में सारा जगत उपस्थित – यह बतलाया कृष्ण ने।

अनेकता को एक में लाना -यह भारत की संस्कृति है।
जो एकता को अनेक बनाए – यह मानव की विकृति है।।

विश्व रूप का दर्शन करना – सबको एक समझना है।
सबमें ‘एक’ ‘एक’ में सब हैं – ऐसा अनुभव करना है ।।

संसार हमें ना एक दीखता – यह नजरों का धोखा है।
हम इसको पाकर मुक्ति पाएं , किसने हमको रोका है ?

है अनेकता नहीं खंडता – समरसता ही है एकता।
हमारे तन में भी अनेकता नहीं, बस भासती है एकता।।

हमारे शरीर में आंख आदि अवयव- दिखते अनेक हैं।
पर इन सभी के मूल में – वह ‘मैं’ अकेला ‘एक’ है।।

दीखता है भेद हमको , पर है अभेद हमारे शरीर में।
इंद्रियों में भेद नाना , पर है एकात्म हमारे शरीर में।।

‘एक’ ही वह सूत्र है, जो बांधता हमें एकता की डोर में।
साधक ‘एक’ की ही खोज में , है संकल्प लेता भोर में।।

तब घेर लिया अर्जुन को आकर, अनुभूतियों के साये ने।
समझा था उसने ब्रह्म को अब तक विभूतियों के साये में।।

अर्जुन ने लिए ‘दिव्य चक्षु’ – ‘एक ब्रह्म’ के दर्शन के लिए।
हृदय पुलकित हो गया , और दिव्य – दर्शन भी किए ।।

यह गीत मेरी पुस्तक “गीता मेरे गीतों में” से लिया गया है। जो कि डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई है । पुस्तक का मूल्य ₹250 है। पुस्तक प्राप्ति के लिए मुक्त प्रकाशन से संपर्क किया जा सकता है। संपर्क सूत्र है – 98 1000 8004

डॉ राकेश कुमार आर्य

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