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इतिहास के पन्नों से

जब दिया था धन सिंह कोतवाल ने अपना अमर बलिदान

4 जुलाई शहादत दिवस पर विशेष

मेरठ गजेटियर लिखता है कि 4 जुलाई अट्ठारह सौ सत्तावन को प्रातः 4:00 बजे धन सिंह कोतवाल के गांव पांचली खुर्द पर अंग्रेजी खाकी रिसाले ने तोपों से हमला कर दिया। अंग्रेज खाकी रिसाले में 56 घुड़सवार, 38 पैदल सिपाही और 10 तोपची थे। पूरे गांव को तोप से उड़ा दिया गया। 400 से ज्यादा लोग मारे गए। जो बच गए उनमें से 46 को कैद कर लिया गया और इनमें से 40 को फांसी दे दी गई। दरअसल 10 मई अट्ठारह सौ सत्तावन को मेरठ में हुई क्रांतिकारी घटनाओं में पुलिस की भूमिका की जांच के लिए ब्रिटिश सरकार ने मेजर विलियम की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की ।

मेजर विलियम ने उस दिन की घटनाओं का विशद विवेचन एवं अनेक अलग-अलग गवाहियों के आधार पर इस संबंध में एक स्मरण पत्र तैयार किया। इस पत्र में मेजर विलियम ने मेरठ में क्रांतिकारी गतिविधियों के विस्फोट के लिए धनसिंह कोतवाल को मुख्य रूप से दोषी ठहराया । उसका मानना था कि यदि धनसिंह कोतवाल ने अपने पुलिस कर्तव्य का निर्वाह ठीक प्रकार से किया होता तो निश्चित रूप से मेरठ में जनता को भड़कने से रोका जा सकता था। रिपोर्ट में धन सिंह कोतवाल को पुलिस नियंत्रण के छिन्न-भिन्न हो जाने के लिए दोषी पाया गया। उन्होंने रिपोर्ट में धन सिंह पर क्रांतिकारियों को खुला संरक्षण देने का आरोप लगाया और गवाहों के आधार पर कहा कि धनसिंह कोतवाल क्योंकि स्वयं गुर्जर हैं इसलिए उसने क्रांतिकारियों, जिनमें गुर्जर बहुसंख्या में थे, को नहीं रोका । बल्कि धनसिंह कोतवाल ने स्वयं आसपास के गांव के लोगों को क्रांति में शामिल होने के लिए बुलवाया। धनसिंह कोतवाल के नेतृत्व में उनकी समग्र गुर्जर जाति और रांघढ़ व मेव अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्षरत हो गए। इतिहास की पुस्तकों में लिखा है कि अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति का प्रारंभ 10 मई अट्ठारह सौ सत्तावन को मेरठ में हुआ था। क्रांति की शुरुआत करने का श्रेय अमर शहीद धनसिंह कोतवाल को जाता है। उस दिन मेरठ में धन सिंह के नेतृत्व में विद्रोही विद्रोही सैनिकों और पुलिस फोर्स ने अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांतिकारी घटनाओं को अंजाम दिया। धनसिंह कोतवाल जनता के संपर्क में थे, धनसिंह का संदेश मिलते ही हजारों की संख्या में भारतीय क्रांतिकारी रात में ही मेरठ पहुंच गए ।
क्रांति में अग्रणी भूमिका निभाने की सजा धनसिंह कोतवाल को उसके गांव को 4 जुलाई अट्ठारह सौ सत्तावन को अंग्रेज खाकी रिसाली द्वारा तोपों से नष्ट करके दी। पॉचली खुर्द गॉव को विशेष दमन का शिकार होना पडा। स्वतंत्रता संग्राम के विफल हो जाने पर राष्ट्रहित में दिया गया उनका सर्वोच्च बलिदान उनके अदम्य साहस, शौर्य, निर्भीकता और उत्सर्ग में राष्ट्रभक्ति की उदात्त भावना को व्यंजित करने वाला मुंह बोलता प्रमाण है। इन्हीं गुणों के कारण वह कालजयी, अमर हुतात्मा भारतीय इतिहास में अमर हो गया । स्वतंत्रता के चितेरे को शत्-शत् नमन्।

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