- पुनीत उपाध्याय
आधुनिक जीवन शैली के नाम पर बदली लाइफ स्टाइल के चलते मधुमेह और ह्रदयघात के बढ़ती रोगियों की संख्या पहले से ही चिंता का सबब बनी हुई थी इधर डिजीटल युग के नाम पर ज्यादा देर तक ऑन स्क्रीन रहना मानव जाति को एक और महामारी को ओर धकेल रहा है। बच्चों और युवा पीढ़ी में कमजोर नजर एक नई महामारी बनकर उभर रही है। निकट दृष्टि दोष का प्रचलन बढ़ रहा है तथा इस बात का अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक दुनिया की लगभग आधी जनसंख्या इससे ग्रस्त हो जाएगी।
हाल ही में हुए एक नए अध्ययन से सामने आया है कि टैबलेट या स्मार्टफोन जैसी डिजिटल स्क्रीन पर हर दिन एक घंटा से चार घंटे तक का समय बिताने से निकट दृष्टिदोष का खतरा 21 प्रतिशत बढ़ सकता है। एक नए शोध में 45 जांच-पड़ताल के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिसमें बच्चों से लेकर वयस्कों तक के 3 लाख 35 हजार 000 से अधिक लोग शामिल थे। शोध में कहा गया है कि स्क्रीन पर अधिक समय बिताने से ध्यान अवधि कम होने के कारण मस्तिष्क के संज्ञानात्मक कार्यों पर असर पड़ सकता है। लंबे समय तक स्क्रीन के इस्तेमाल में अक्सर बिस्तर या सोफे पर असहज मुद्रा में बैठना शामिल होता है। स्क्रीन के लंबे समय तक संपर्क में रहने से मोटापा, शरीर में दर्द, रीढ़ की हड्डी की समस्या और पीठ दर्द सहित कई स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। आंखें हैं तो जीवन है, इसलिए इन्हें बचाए रखना बेहद ही जरुरी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आंखों पर पड़ने वाले तनाव को कम करने के लिए, हर 20 मिनट में 20 सेकंड तक दूर रहें और 20 फीट दूर किसी भी चीज को देखें। जामा नेटवर्क ओपन नामक पत्रिका में प्रकाशित शोध में कहा गया है कि स्क्रीन से आंखों पर पड़ने वाले खतरनाक असर को रोकने के लिए हर 20 मिनट में 20 सेकंड तक दूर रहें और 20 फीट दूर किसी भी चीज को देखें।बच्चों के लिए ज्यादा खतरनाकजानकारी में आया है कि दुनिया का हर तीसरा बच्चा निकट दृष्टि दोष से पीड़ित है। आशंका है कि अगले 26 वर्षों में निकटदृष्टि दोष या मायोपिया से जूझ रहे बच्चों की संख्या बढ़कर 74 करोड़ तक पहुंच जाएगी टीवी, मोबाइल, लैपटॉप जैसे उपकरणों के सामने ज्यादा से ज्यादा समय बिताना, साथ ही खराब जीवनशैली जैसे कारक बच्चों की आंखो के लिए खतरा बन रहे हैं। गौरतलब है कि निकटदृष्टि दोष या मायोपिया, आंखों से जुड़ी एक आम समस्या है। इससे पीड़ित व्यक्ति को दूर की चीजे धुंधली दिखाई देती हैं। इस विकार में आंखों के कॉर्निया का आकार बदल जाता है। नतीजन जब रोशनी आंखों में प्रवेश करती है, तो वह रेटिना पर केंद्रित होने के बजाय, रेटिना से थोड़ा आगे केंद्रित हो जाती है। इससे छवि स्पष्ट न होकर धुंधली दिखने लगती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक यह विकार आमतौर पर बचपन में विकसित होता है और उम्र के साथ स्थिति और बिगड़ती जाती है।
1990 से 2023 के बीच बच्चों में निकटदृष्टि दोष के मामले तीन गुणा बढे हैं। गौरतलब है कि जहां 1990 से 2000 के बीच इनकी दर्ज 24 फीसदी से बढ़कर 2011 से 19 में 30 फीसदी और 2020 से 23 के बीच 36 फीसदी तक पहुंच गई है। ऐसे में आज दुनिया का हर तीसरा बच्चा इस समस्या से जूझ रहा है। अध्ययन में इस बात का भी अंदेशा जताया गया है कि 2050 तक यह समस्या दुनिया के 74 करोड़ बच्चों को अपना शिकार बना सकती है। आनली माई हैल्थ डाट काम वेवसाइट के अनुसार यह बहुत हैरानी की बात है कि हाल के सालों में बहुत छोटे बच्चों के पास भी अपना पर्सनल मोबाइल या टैब हो गया है। जबकि, तमाम विशेषज्ञ बार-बार यह सलाह देते हैं कि बच्चों को मोबाइल या टैब से दूर रखना उनके स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है। इसके बावजूद, इंटरनेट के इस युग में पेरेंट्स बच्चों के स्क्रीन टाइम को कम नहीं कर पा रहे हैं।बच्चों को स्क्रीन देखने की आदत कैसे छुड़वाएं?बच्चों को स्क्रीन देखने की आदत छुड़वाने के लिए उन्हें मोबाइल और टीवी से दूर रखें। इसके लिए आपको बच्चों के टीवी देखने के समय को नियमित करने की जरूरत है। इसके लिए आपको बच्चों को साथ बैठकर समझाना चाहिए। बच्चों को स्क्रीन देखने से होने वाले नुकसान के प्रति जागरुक करें।
पुनीत उपाध्याय
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