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कविता

किए का फल मिलना निश्चय

हर वृक्ष लता से पूछा मैंने,
तुम किस कारण यहां खड़े ?
किस कारण तुम भोग रहे हो,
फल कर्मों के बहुत कड़े ?

वृक्ष लता एक सुर से बोले –
नियम भंग के दोषी हैं हम।
कठोर मिली है कारा हमको,
दूर-दूर तक छाया है तम।।

पाप रहा होगा छोटा सा,
फल भयंकर विषधर सा।
डंसता है दिन रात विषैला,
कठोर न्याय है ईश्वर का।।

किए का फल मिलना निश्चय,
इसे मनुज नहीं समझा करता।
व्यतीत करे पापों में जीवन,
तनिक नहीं- लज्जा करता।।

एक-एक क्षण कर बीत रहा है,
तामस की भेंट चढ़ा जाता।
जीवन बड़ा अनमोल रे मनवा !
अनिष्ट की ओर बढ़ा जाता।।

– राकेश कुमार आर्य 

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