जाकिर नाइक की फितरत, वतन और वतनपरस्ती

  • 2016-07-15 09:30:47.0
  • रज्जाक अहमद

जाकिर नाइकअब से करीब चालीस वर्ष पहले तक जब देश में आम चुनाव होते थे तब मुस्लिम बहुल आबादी में कांग्रेस के पिछलग्गू मुस्लिम नेता यह नारा देते थे कि इस्लाम खतरे में है और अशिक्षित समाज को गुमराह करके अपना मकसद हासिल कर लेते थे। उनका वह नारा एक सियासी झूठ व फरेब था। उस समय हमें इस्लाम के खतरे में होने की बात अनर्गल लगती थी, लेकिन आज यह सच है कि सारी दुनिया में ‘इस्लाम खतरे में है।’

समय के साथ विकृति तो सभी धर्मों में पैदा हुई है लेकिन जितना नुकसान इस्लाम धर्म को हुआ है उतना दुनिया में और किसी को नही। कौन जिम्मेदार है इसके लिए ? वह कठमुल्ला (धर्म का अधकचरा ज्ञान रखने वाले आलिम) जो मस्जिदों में खड़े होकर धर्म की गलत व्याख्या करते हैं और लोगों में अनावश्यक भ्रम और रोष पैदा करते हैं। उनके सुनने वालों में मुस्लिम समाज का वह अशिक्षित तबका होता है जो गरीबी, अशिक्षा बेरोजगारी, बढ़ती आबादी व अन्य परेशानियों से जूझ रहा है। वह इनकी बातों पर ऐसे विश्वास करता है जैसे यह कोई ‘खुदा का दूत’ प्रवचन कर रहा है। ये आलिम लोग बिना जरूरत हर बात पर फतवा जारी करते हैं। उनमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी देवबंद दारूल उलूम की है।  तमाम आतंकवादी और आजकल चर्चा में आया जाकिर नाईक आतंक की इसी शिक्षा को मानने वाले हैं। यह सारा कुछ सूफीवाद के विरूद्घ है, क्योंकि सूफीवाद दुनिया में दया व क्षमा के लिए जाना जाता है।

जहां तक जाकिर नाईक की बात है तो, मैंने भी बहुत पहले इसके प्रवचनों को सुना है। अपने संबोधन में वह अकसर अपने धर्म की तारीफ करते हुए यह बताने की कोशिश करता है कि दुनिया में इस्लाम धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है और दूसरे धर्मों में खामियां निकालता है। उनकी बुराई करता है और उन्हें किताबों से नजीर देकर साबित करने की कोशिश करता है। यहां तक तो ठीक है कि उसे अपने धर्म को अच्छाई बताने का अधिकार है लेकिन यह अधिकार उसे किसने दिया कि वह दूसरों के धर्म में खामियां निकाले या बुराई करे, लेकिन बेवकूफों की जमात में अपने आपको साबित करने का यह अच्छा हथियार है। आज वह इसी रास्ते पर बढ़ते हुए इस्लाम धर्म का, रिसर्च स्कॉलर हो गया। वह अरब व अन्य मुल्कों में जाने लगा बस यहीं से उसका व्यवसाय शुरू हो गया। उसने अपना एक एनजीओ ‘इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन’ बना लिया उसके लिए विदेशी से फंडिंग होने लगी। इस पैसे से वह नई तकनीक के दौर में प्रवेश कर गया। कई मुल्कों में उसकी पहचान मुस्लिम उपदेशक के रूप में होने लगी। जाकिर नाइक की भाषा बदल गयी, व्याख्यान में आतंक के समर्थन की बू आने लगी। खतरा तब शुरू हुआ जब इसके प्रवचन से प्रभावित होकर ऊंचे पढ़े लिखे नौजवान डॉक्टर, इंजीनियर व अन्य ऊंची डिग्री धारक युवक इंसानी समाज को तबाह करने को निकल पड़े। यह बात हमारी सरकार या दूसरे धर्म या समुदाय का इलजाम नही है। बल्कि यह बांग्लादेश में हुए आतंकी हमले की जांच में सामने आयी है। आज सारी दुनिया मेें इस्लामी आतंकवाद का खौफ है कितने ही संगठन ऐसे हैं जो जिहाद के नाम पर हर रोज फिदायीन हमले करते हैं। जिनमें सैकड़ों बेगुनाह लोग मारे जाते हैं। इन संगठनों का संचालन करने वाले हाफिज कारी मौलवी व अन्य धार्मिक डिग्री धारक लोग हैं। एक तरफ यह कुरान की आयतों, श्लोकों की व्याख्या करके बताते हैं कि कुरान में यह लिखा है कि किसी ने अगर एक बेगुनाह इंसान का कत्ल किया या हत्या की (यहां उसमें धर्म या समुदाय शब्द नही है) तो मानो उसने सारी इंसानियत का कत्ल किया है। इंसानियत की इस प्रकार व्याख्या करने वाले लोग सैकड़ों बेगुनाहों का रोज खून बहा रहे हैं, यह कौन सा इस्लाम है? या यह कौन सी कुरान को मानने वाले मुसलमान हैं? आज जब यह खतरा फंडिंग करने वालों के दरवाजे तक पहुंचा है तो उन्हें पता चला कि आतंकवाद क्या होता है ? ये सच्चाई है कि इसे दुनिया में पैदा करने वाला अमेरिका है, लेकिन यहां उस पर चर्चा का विषय नही है। विषय ये है कि जाकिर नाईक व उस जैसे तमाम लोग जो भारत में विदेशी पैसे से एनजीओ चला रहे हैं, उन सबकी गहन जांच होनी चाहिए। चूंकि यह दानव भारत में आंध्र प्रदेश, महाराष्ट, बंगाल, केरल में अपनी पैठ बना चुके हैं और आसाम जैसे आर्थिक पिछड़े एरिया में घुसने की कोशिश कर रहा है।

अगर देर हो गयी तो यहां भी नतीजे गंभीर होंगे। सरकार इन सबकी जांच करवाये अगर जांच में कहीं भी कुछ भी गलत मिलता है तो सरकार इस पर सख्त कार्यवाही करे। देश की सुरक्षा के मामले में इसकी परवाह नही होनी चाहिए कि कौन समर्थन कर रहा है, कौन विरोध कर रहा है? जाकिर नाईक व उस जैसे तमाम लोगों को तुरंत प्रतिबंधित किया जाए। देश का वफादार मुसलमान इनका समर्थन नही करता है।

कश्मीर पर भी सरकार को अपना नजरिया बदलना होगा। कब तक जवान शहीद होते रहेंगे? कब तक पत्थर खाते रहेंगे? आतंकवादियों का समर्थन करने वालों को सरकार अलगाववादी कहती है, बार-बार उन्हें नजरबंदी के नाम पर सुरक्षा देती है। जो भारत से अलगाव की बात करते हैं, वह सब आतंकवादी या उनके सरपरस्त हैं। भारत सरकार व प्रदेश सरकार सुरक्षा बलों को छूट दे। इनका इलाज प्यार की बोली नही बंदूक की गोली है, और समय आ गया है कि अब हमें प्यार की बोली के स्थान पर बंदूक की गोली को चुन लेना चाहिए। वतन पहले है और मजहब बाद में है-जो इस सच को कबूल करे वही सच्चा वतनपरस्त माना जाए।
-रज्जाक अहमद
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)