सर्वशिक्षा अभियान के विकल्प पर हो काम

  • 2015-10-20 03:10:52.0
  • उगता भारत ब्यूरो

नरवीर लांबा

जब हमारे गुरुजनों को ही सरकारी स्कूलों पर विश्वास नहीं है तो आम बच्चों के अभिभावकों की बात करना बेमानी है। सरकार को चाहिए कि कम से कम अध्यापकों के बच्चे तो सरकारी स्कूलों में दाखिला लें, ताकि गांव के दूसरे बच्चे भी निजी स्कूलों के बजाय सरकारी स्कूलों में पढ़ाई शुरू करेंज्भले ही एक स्तर तक सर्वशिक्षा अभियान की बदौलत स्कूलों की बाहरी काया थोड़ी बहुत बदली हो, लेकिन इस अभियान ने शिक्षा की जड़ों को खोखला कर  इसे कागजी कार्रवाई में उलझा दिया है। केंद्र सरकार से लेकर सभी राज्य की सरकारें शिक्षा में गुणवत्ता लाने के ढोल अकसर पीटती रहती हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहता है। जब-जब नई शिक्षा नीति लाने की सिफारिशें आईं, तो राज्य सरकारों ने उन्हें लागू किया, परंतु उतने सुखद परिणाम नहीं आए, जितनी उम्मीदें की गई थीं। शिक्षा का सबसे ज्यादा नुकसान किया है, तो उस महत्त्वकांक्षी प्रोजेक्ट ने, जिसे सर्व शिक्षा अभियान के नाम से जाना जाता है। दूसरे शब्दों में यदि इसे सर्वसत्यानाश अभियान कहा जाए तो शायद आश्चर्य न होगा।
एक सर्वे के मुताबिक हिमाचल प्रदेश के जिला बिलासपुर के सदर खंड के तहत आने वाली माकड़ी सीहड़ा प्राथमिक पाठशालाओं में बच्चों की संख्या बहुत कम है। माकड़ी प्राइमरी स्कूल में कुल 14 छात्र पढ़ते हैं, जबकि शिक्षकों तथा एक जलवाहक व एक कुक व हेल्पर के वेतन पर लगभग हर माह 88 हजार रुपए का खर्च होता है। यानी सरकार प्रति छात्र लगभग 6,250 रुपए हर माह व्यय कर रही है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा तो सस्ती है, परंतु शिक्षक महंगे हैं, जबकि निजी स्कूलों में शिक्षा महंगी है और शिक्षक अद्र्धकुशल। सरकारी स्कूलों में इन्फ्रास्ट्रक्चर बढिय़ा है, जो यहां के निजी स्कूलों में नहीं है। इसके अलावा सरकारी प्राथमिक स्कूलों में छात्रों को मुफ्त वर्दी, मुफ्त मिड-डे मिल तथा मुफ्त पाठ्य पुस्तकें व निशुल्क शिक्षा सहित आईआरडीपी जैसी योजनाओं पर भी खर्च किया जाता है। ये कितनी बड़ी विडंबना है कि सरकारी स्कूलों में ट्रेंड टीचर होने के बावजूद छात्रों का शिक्षा का स्तर बहुत निम्न है। कुछ तो राजनीतिक हस्तक्षेप, कुछ शिक्षकों की लापरवाही और सबसे अधिक शिक्षा की नैया को सर्वशिक्षा अभियान ने डुबोया है। 99 प्रतिशत अध्यापक अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति सजग नहीं होते हैं, जबकि निजी स्कूलों में पढऩे वाले छात्रों के अभिभावक न केवल अपने बच्चों के स्कूल प्रशासन से सीधा संवाद करते हैं, बल्कि वे अपने बच्चों के होम वर्क से लेकर बच्चों की अन्य गतिविधियों में उसकी मदद करते हैं। अभिभावकों का यह भी कहना है कि सरकारी स्कूलों में अकारण राजनीतिक हस्तक्षेप होता है, जिस शिक्षक का तबादला हो जाता है उस स्कूल में कई महीनों तक शिक्षक का पद रिक्त रहता है।दूसरे सरकारी स्कूलों में कागजी कार्रवाई पर ज्यादा दबाव बना रहता है। ऐसे में कौन अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाना चाहेगा। एनुअल स्टेटस रिपोर्ट 2014 में यह खुलासा  कि प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों के बच्चों को जमा और घटाना भी नहीं आता। यहां तक कि संख्या तक को भी बच्चे पहचान नहीं रहे हैं।  पूरे प्रदेश में 10,484 प्राइमरी स्कूल हैं। हिमाचल सरकार ने पहली बार प्राइमरी स्कूलों में अंग्रेजी मीडियम शिक्षा उपलब्ध करा दी है, लेकिन 10353 स्कूलों ने अंग्रेजी मीडियम से पढऩे से हाथ खींच लिए हैं, मात्र 181 प्राइमरी स्कूल अंग्रेजी मीडियम से पढऩे को तैयार हैं। अन्य स्कूलों ने अंग्रेजी सिलेबस को शुरू करने पर हाय- तौबा मचा दी है, तो अंग्रेजी मीडियम में बच्चे कितना सीख पाएंगे अंदाजा कोई भी लगा सकता है। जब हमारे गुरुजनों को ही सरकारी स्कूलों पर विश्वास नहीं है तो आम बच्चों के अभिभावकों की बात करना बेमानी है। सरकार को चाहिए कि कम से कम अध्यापकों के बच्चे तो सरकारी स्कूलों में दाखिला लें, ताकि गांव के दूसरे बच्चे भी निजी स्कूलों के बजाय सरकारी स्कूलों में पढ़ाई शुरू करें।यही कारण है कि सरकारी स्कूलों में लगातार बच्चों की संख्या घटती जा रही है। सर्वशिक्षा अभियान के तहत करोड़ों रुपए की पुस्तकें छपवा दी हैं, जो स्टोर रूमों में धूल फांक रही हैं। इस अभियान में जो नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं उनका सकारात्मक असर नजर नहीं आता। डाइट द्वारा हर वर्ष शिक्षकों के लिए जो कार्यशाला लगाई जाती है उनका नाममात्र ही लाभ होता है। अभी भी मौका है कि इस सर्वशिक्षा अभियान को बंद कर दिया जाए वरना शिक्षा की हालत इतनी बदतर हो जाएगी कि बस में लगे रूट बोर्ड को भी अधिकांश छात्र नहीं पढ़ पाएंगे। इसके इतर अगर सरकार प्राइमरी स्तर से ही नैतिक तथा आध्यात्मिक शिक्षा तथा योग को सिलेबस में जोड़े तो ऐसा करने से हमारे बच्चे का भविष्य नैतिक रूप से उज्ज्वल होगा, क्योंकि यही बच्चे देश के भविष्य के निर्माता हैं। इस तरह तो हम बच्चों को सही दिशा नहीं दे पाएंगे।