स्त्री सुरक्षा की दिशा और महिला थाना

  • 2015-10-20 09:29:03.0
  • उगता भारत ब्यूरो

स्त्री-सुरक्षा की दिशा में महिला थाना का गठन स्वाभाविक रूप से ध्यान खींचता है- अपने अनूठे नाम से भी और खालिस स्त्रीवादी स्वरूप के चलते भी। इस वर्ष रक्षाबंधन पर हरियाणा सरकार ने ‘राज्य की बहनों’ के लिए सौगात के रूप में हर जिले में एक महिला थाना खोलने की तत्परता दिखाई है। हालांकि व्यवहार में एक विशुद्ध मर्दवादी, अन्यत्र विफल-सिद्ध यह रणनीति स्त्रियों को पूर्णतया हताश ही करेगी, जैसा कि अब तक के अन्य बहुतेरे मर्दवादी स्त्री-सुरक्षा उपायों का हश्र रहा है, स्त्री की विवश-आरोपित छवि ही इन महिला थानों के माध्यम से भी मजबूत होने जा रही है, न कि स्त्री स्वयं।

एक तरह से सरकार ने स्वीकार किया है कि मौजूदा स्वरूप में पुलिस-केंद्रों का लैंगिक माहौल सुधारा नहीं जा सकता। चंद हफ्तों पहले स्वयं मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट््टर के क्षेत्र करनाल के विशाल मधुबन पुलिस परिसर में कार्यरत करीब आधा दर्जन महिला पुलिसकर्मियों को भी विभागीय लैंगिक उत्पीडऩ पर सार्वजनिक रूप से रोष व्यक्त करना पड़ा था। खेलों से जुड़ी इन लड़कियों ने लिखित रूप से उनके यौन शोषण के प्रयासों का खुलासा किया। आरोप के घेरे में वरिष्ठ अधिकारी थे। कई आरोपियों के विरुद्ध जांच और अनुशासनिक कार्रवाई शुरू हुई है, लेकिन मूल मुद्दा, ‘कार्यस्थल पर महिला संवेदी लैंगिक प्रोटोकॉल का निर्वहन’ अछूता रहा। क्या अंदाजा लगाना मुश्किल है कि ऐसे राजनीतिक-पुलिस नेतृत्व के लिए सामान्य थानों के माहौल को आम स्त्री की खातिर लिंग-संवेदी कर पाना कितनी टेढ़ी खीर साबित होगा?

महिला थाना का गठन और कुछ नहीं, इसी मर्दवादी उलझन का विस्तार जैसा है। सोचिए, अगर जिले भर में स्त्रियों को एक ही पुलिस थाना उपलब्ध हो तो क्या इसका मतलब यह भी नहीं कि बाकी थानों के दरवाजे उनके लिए बंद कर दिए गए हैं! हरियाणा के करीब तीन सौ थानों में से नई व्यवस्था में केवल इक्कीस थाने आधी आबादी को उपलब्ध होंगे। जबकि बड़ी संख्या में थाने खोले ही जनता की सुविधा के लिए जाते हैं ताकि हर जरूरतमंद की पुलिस तक त्वरित पहुंच संभव हो सके। इसके लिए सौ वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल और एक लाख की जनसंख्या सर्व-प्रयुक्त मानक माने जाते हैं, जिससे अपराध और अपराधी पुलिस राडार पर बिना समय गंवाए लाए जा सकें। क्या पुलिस संख्या के भौगोलिक-सामरिक विस्तार की सुविधा केवल पुरुषों को चाहिए, स्त्रियों को नहीं?

यही नहीं, आपराधिक मामलों में स्त्रियां केवल पीडि़त की हैसियत से ही तो थानों में नहीं आतीं; वे आरोपी और गवाह भी होती हैं- और ऐसे भी मसलों में उनका वास्ता थानों से पड़ता है जहां शिकायतकर्ता कोई पुरुष हो। फिर समाज में तमाम तरह के अंधे-अबूझ अपराध भी होते हैं जहां शुरू में पता ही नहीं होता कि संदेह के घेरे में कौन है- महिला या पुरुष? बहुतेरे अपराधों में दोनों ही शामिल होते हैं। इन मामलों में महिला थानों की भूमिका बनेगी या सामान्य थानों की? यही नहीं, महिलाओं को भी पुरुषों की भांति सत्यापन, गुमशुदा, धरना-प्रदर्शन, पैरवी, घरेलू-वैवाहिक, या अन्य विविध सिलसिलों में भी आवेदनकर्ता के रूप में थानों में आना होता है। वे क्यों दूर के तयशुदा महिला थाने में बेवजह धक्के खाने पर मजबूर की जाएं?

दरअसल, व्यावहारिक धरातल पर महिला थाना स्त्री के लिए असुविधाजनक है। तमिलनाडु या उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां महिला थाना प्रयोग व्यापक रूप से किया गया, इन थानों की महिला-विरोधी अपराधों से निपटने की भूमिका उत्तरोत्तर सीमित होती गई है। अधिकांशत: ये पति-पत्नी विवाद निपटारे के विशेष प्रकोष्ठ या महिला पुलिसकर्मियों के शरणस्थल जैसे बन कर रह गए हैं, न कि आपराधिक विवेचना के मानक केंद्र। पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में हाल में जेंडर वर्कशॉप के दौरान वहां की महिला थानाध्यक्ष ने दूरदराज की महिलाओं की दर्जनों भौगोलिक और प्रशासनिक परेशानियां सिलसिलेवार बयान कीं- आश्चर्य नहीं कि हरियाणा के नव-स्थापित महिला थानों में भी तमाम वैसी ही दिक्कतें पहले दिन से सतह पर आनी शुरू हो गई हैं।

एक निरुपाय महिला पड़ोस के पुलिस थाने में राहत की गुहार के साथ पहुंचती है और उसे बीसियों-तीसियों किलोमीटर दूर स्थित महिला थाने का रास्ता दिखा दिया जाता है। जबकि विधि स्थापित प्रक्रिया के अनुसार अपराध की सूचना मिलते ही कानून का पहिया घूमना चाहिए और शिकायतकर्ता किसी भी थाने में जाय उसे क्षेत्राधिकार के आधार पर ठुकराया नहीं जा सकता। इस लिहाज से भी महिला थानों का वर्तमान गठन सर्वोच्च और तमाम उच्च न्यायालयों की स्थापनाओं का सरासर उल्लंघन है।

अब सरकारी सफाई में कहा जा रहा है कि महिलाएं अपनी शिकायत लेकर करीब के सामान्य थाने में जाने को भी स्वतंत्र हैं। अगर ऐसा है तो अलग से महिला थाने बनाए ही क्यों गए? न्यायिक मजिस्ट्रेट और अस्पताल भी पुलिस जांच कार्य से अनिवार्य रूप से नत्थी होते हैं। महिला थाना बनने से उनके क्षेत्राधिकार न बदले हैं, न ही बदले जा सकते हैं।

इसका मतलब है पीडि़त, गवाह, आरोपी, हर भूमिका में महिला के हिस्से में और धक्के! जैसी मर्दवादी सोच से यह शुरुआत हुई है उसका एक नमूना इन थानों की अपनी सुरक्षा-व्यवस्था में अब भी पुरुषों की भूमिका जारी रहने से लग जाता है। फरीदाबाद में उद्घाटन के दिन ही एक वरिष्ठ पुरुष पुलिस इंस्पेक्टर की तिरस्कार-भरी टिप्पणी सुनने को मिली- इनकी सुरक्षा के लिए अब अतिरिक्त गश्त और लगानी पड़ा करेगी! एक महिला थाना इंचार्ज के मुताबिक सामान्य थानों में पुरुष पुलिसकर्मी की उपस्थिति वहां आने वाली स्त्रियों को असहज करती थी, अब ऐसा नहीं होगा। इतना जटिल मुद्दा और उसके निदान का इतना सरल समीकरण!

स्त्रियों को सशक्त करने के नजरिये से जरूरत थी जिले के हर पुलिस थाने के इन्फ्रास्ट्रक्चर और मानव-संसाधन को महिला संवेदी बनाने की। साथ ही हर पुलिसकर्मी को लिंग संवेदी होने की पूर्वशर्त में बांधने की। दूसरे शब्दों में हर थाना, महिला थाना बनाया जाना चाहिए था। लेकिन भवन-डिजाइन, मानव-संसाधन और प्रशिक्षण-अनुकूलन जैसे स्त्री को सशक्त कर सकने वाले महत्त्वपूर्ण आयामों को दरकिनार कर, महिला थाना मात्र को रामबाण की तरह प्रचारित किया गया। स्त्री शालीनता के भावनात्मक तर्क की ओट में खड़े होकर हरियाणा सरकार ने भी यही सिद्ध किया है कि राखी पर बहनों को सदिच्छा की ही सौगात दी जा सकती है, न कि वास्तव में सुरक्षा और शालीनता की गारंटी।

वाहवाही लूटने की जल्दी में यह सोचा ही नहीं गया कि महिला थानों को चलाने के लिए वांछित संख्या में महिला पुलिसकर्मियों को कहां से लाया जाएगा। लिहाजा, जिलों में जैसे-तैसे अपना काम चला पा रहे पुलिस के महिला प्रकोष्ठों को समेट कर इन नए बने थानों को स्थापित किया गया है। तमाम महिला प्रकोष्ठ एक तरह से पारिवारिक कलह निपटाने के मंच की तरह स्वीकृत हो चुके हैं और इनका एकबारगी ठप होना मानो सामाजिक शून्य पैदा करने जैसा ही हुआ। इसी तरह, सामान्य थानों में महिलाकर्मी पहले से ही कम थीं, उन्हें और भी कम करना पड़ा है ताकि महिला थानों में तैनाती पूरी की जा सके। यानी अब सामान्य पुलिस थाने स्त्रियों के लिए और भी असुविधाजनक बना दिए गए हैं।

इस क्रम में हरियाणा सरकार ने एक हजार नई महिला पुलिसकर्मियों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की है जिन्हें चयनित करने और प्रशिक्षण देने में कम से कम पंद्रह महीने तो लगेंगे ही। हालांकि यह संख्या भी ऊंट के मुंह में जीरा जैसी ही साबित होगी। फिलहाल राज्य में महिला पुलिसकर्मियों का अनुपात खींचतान कर सात प्रतिशत के गिर्द लाया जा सका है। वर्तमान रफ्तार से यह कुछ खास बदलने नहीं जा रहा। जबकि कुछ वर्षों से केंद्र की घोषित नीति पुलिस बलों में महिला अनुपात को तीस प्रतिशत तक बढ़ाने की रही है, तब भी राष्ट्रीय अनुपात छह प्रतिशत के आसपास ही चल रहा है। अब तक सिर्फ एक दर्जन राज्यों ने नई भर्ती में तीस प्रतिशत की नीति अपनाई है- जिनमें बिहार और तेलंगाना (पैंतीस प्रतिशत) अग्रणी हैं। हरियाणा उन राज्यों में है जिनकी महिला पुलिस की संख्या के विषय में कोई स्पष्ट नीति नहीं है। दरअसल, खाप-मूल्यों से संचालित पुरुष-प्रधान ग्रामीण समाज वाले इस राज्य में पुरुषों को ही सरकारी नौकरियों में भर्ती करना राजनीतिक रूप से लाभप्रद समझा जाना स्वाभाविक रहा है। जाहिर है, राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में राज्य में महिला पुलिस अनुपात को कामकाजी स्तर तक लाने में बरसों नहीं दशकों लगेंगे।

स्त्री-विरुद्ध अपराधों को ही महिला पुलिस थानों के अधिकार क्षेत्र में लाना न केवल अव्यावहारिक सिद्ध हुआ है बल्कि यह महिला पुलिसकर्मियों के मनोबल को तोडऩे वाला कदम भी है। दरअसल, इस मर्दवादी पड़ाव से आप बहुत कुछ नकारात्मक ही कह रहे होते हैं। महिला थानों की स्थापना का जो भी संदेश बनता हो, क्या वह अंतत: इसी अलिखित सामाजिक धारणा को बल देने में नहीं खप जाएगा कि महिला पुलिसकर्मी दूसरे अपराधों की जांच या अन्य पुलिस-कर्म में पुरुषों जितनी कारगर नहीं हो सकतीं! डिजिटल जमाने की सरकारें स्वयं भी इनकी उपयोगिता को लेकर स्पष्ट नहीं हैं। देश के कुल चौदह हजार से अधिक पुलिस थानों में महिला थाने बमुश्किल पांच सौ से कुछ ऊपर हैं, इनमें भी आधे से अधिक केवल दो राज्यों तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में हैं। स्पष्टता का अभाव शासन के हर स्तर पर है।