मालदीव पर भारत चुप क्यों?

  • 2015-11-15 10:30:53.0
  • डॉ0 वेद प्रताप वैदिक

पिछले तीन वर्षों से मालदीव में गजब की उथल-पुथल मची हुई है लेकिन भारत की भूमिका एक असहाय तमाशबीन की-सी हो गई है। मनमोहन-सरकार हो या मोदी सरकार, यह समझ में नहीं आता कि वे हाथ पर हाथ धरे, क्यों बैठी रहती हैं? मालदीव के उप-राष्ट्रपति अहमद अदीब को पहले गिरफ्तार किया गया और अब उन पर महाभियोग लगाकर उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। पूरे देश में आपात्काल थोप दिया गया है। राष्ट्रपति यामीन अब्दुल कय्यूम का आरोप है कि उनके उप-राष्ट्रपति ने उनकी हत्या की साजिश की थी। उन्होंने उनके बोट में बम रखवा दिया था। बम फूटा तो सही लेकिन राष्ट्रपतिजी बच गए। सुरक्षित बच निकले राष्ट्रपति यामीन ने अपने उप-राष्ट्रपति को दबोच लिया लेकिन मुख्य प्रश्न यह है कि यामीन ने आपात्काल की घोषणा क्यों की?

इसका तात्कालिक कारण तो स्पष्ट है। शुक्रवार को सारे विरोधी दल मालदीव की राजधानी माले में जबर्दस्त प्रदर्शन करनेवाले थे। इस प्रदर्शन की मुख्य आयोजक पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद की मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी थी। नशीद को भी राष्ट्रद्रोह के आरोप में 13 साल की सजा मिली हुई है। सारे विरोधी दलों ने संसद में अदीब के महाभियोग का बहिष्कार करके यह बता दिया था कि अब यामीन के खिलाफ वे सब एक हो गए हैं। यदि यह संयुक्त प्रदर्शन हो जाता तो यामीन का अपनी कुर्सी में बने रहना मुश्किल हो जाता। यामीन ने मालदीव में शासन कम चलाया है, वे अपने विरोधियों से ज्यादा निपटते रहे हैं। पिछले दो साल में यामीन ने सरकार ऐसे चलाई है, मानो वह उनकी बपौती हो। उन्होंने अपने दो उप-राष्ट्रपतियों पर महाभियोग चलाया, दो सुप्रीम कोर्ट के जजों की छुट्टी कर दी, आठ मंत्रियों को घर बिठा दिया, फौज के कई अफसरों को निकाल दिया और पुलिस व गुप्तचर विभाग में भी भारी फेर-बदल कर दिया। लगता है कि मालदीव में उनसे ज्यादा असुरक्षित कोई नहीं है। मालदीव के एक पूर्व राष्ट्रपति, एक उप-राष्ट्रपति, दो रक्षा मंत्री और एक संसद के उपाध्यक्ष जेल में सुस्ता रहे हैं। इस आपात्काल में अब पता नहीं वे कितनों को अंदर करेंगे।

आपात्काल में सारे नागरिक अपने मूल अधिकारों से वंचित कर दिए गए हैं। अब कोई अपना मुंह भी नहीं खोल सकता। अखबार, टीवी चैनल और रेडियो पर कड़े प्रतिबंध लग गए हैं। अमेरिका और ब्रिटेन की कई संस्थाओं ने यामीन के इन तानाशाही कदमों का साफ शब्दों में विरोध किया है। अमेरिका की केंद्रीय जांच एजेंसी ने तो ये तक कहा है कि राष्ट्रपति के बोट में बम-विस्फोट की बात भी बनावटी है। उप-राष्ट्रपति अदीब को यामीन ने इसलिए बर्खास्त किया है कि वे अपने अलावा किसी को भी मालदीव में लोकप्रिय और ताकतवर होता हुआ नहीं देख सकते। उनके उप-राष्ट्रपति अदीब पिछली सरकार में पर्यटन मंत्री थे। पर्यटन मालदीव की आमदनी का सबसे बड़ा स्त्रोत है और पर्यटन कंपनियों के पैसे के दम पर मालदीव की राजनीति चलती है। पर्यटन के क्षेत्र में अदीब की उपलब्धियां इतनी थीं कि जब यामीन की सरकार बनी तो अदीब को दुबारा वही पद मिल गया। यामीन के राज में अदीब जरुरत से ज्यादा प्रभावशाली हो गए। उप-राष्ट्रपति तो वे बन ही गए थे, वे मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता भी करने लगे। फौज और पुलिस में भी उनकी गहरी पैठ हो गई थी। उन्हें उप-राष्ट्रपति बनाने के लिए यामीन ने संविधान में संशोधन करवाया लेकिन अब यामीन उनसे इतना घबरा गए हैं कि उन्होंने मालदीव को ही सांसत में डाल दिया है।

मालदीव का पर्यटन उद्योग अब चौपट हुए बिना नहीं रहेगा। जहां सडक़ों पर शेर लड़ रहे हों, वहां सैर करने कौन जाएगा? इसके अलावा यदि गृह-युद्ध की नौबत आ गई तो क्या होगा? वही होगा, जो श्रीलंका में हुआ या बांग्लादेश में हुआ था।

हजारों लोग शरणार्थी बनकर भारत में डेरा जमाएंगे। क्या तब भी भारत वही कहेगा, जो अभी कह रहा है? वह क्या कह रहा है? वह कह रहा है- हम सजगतापूर्वक देख रहे हैं। हमें पता है, वहां क्या हो रहा है। मालदीव हमारा पड़ौसी है।’ भारत को पता क्यों नहीं होगा? हमारा दूतावास वहां है। हमारी गुप्तचर एजंसियां सक्रिय हैं। हमारे रिपोर्टर खबरें भेज रहे हैं। हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज गत वर्ष मालदीव हो आई थीं। मार्च में सेशेल्स और श्रीलंका के साथ-साथ प्रधानमंत्री मालदीव भी जानेवाले थे लेकिन नहीं गए, क्योंकि वातावरण अनुकूल नहीं था। क्या यह वातावरण अब और अनुकूल होने की संभावना है? पिछले साल सुषमा डर के मारे विरोधी नेताओं से नहीं मिलीं थीं। समझ में नहीं आता कि भारत सरकार किस सोच में पड़ी हुई है? जब नशीद ने 2012 में उत्तेजित होकर इस्तीफा दे दिया था और उप-राष्ट्रपति वहीद राष्ट्रपति बन गए थे, उसी समय भारत को मालदीव के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए था। वहीद ने जीएमआर नामक भारतीय कंपनी का सौदा अचानक रद्द कर दिया था। यह कंपनी 50 करोड़ रु. के सौदे के तहत माले हवाई अड्डे का नवीनीकरण कर रही थी। वहीद ने चीन-यात्रा के दौरान बार-बार भारत को सुई चुभाने की कोशिश की। उन्होंने वहां कहा कि चीन कितना अच्छा देश है? वह मालदीव के आंतरिक मामलों में (भारत की तरह) हस्तक्षेप नहीं करता। यह बात कमोबेश यामीन भी कहते रहे हैं जबकि उन्हें पता है कि मालदीव के पर्यटन उद्योग में भारत के करोड़ों-अरबों रु. लगे हुए हैं, 30 हजार भारतीय वहां कार्यरत हैं और मालदीव की सुरक्षा का सारा खर्च भारत उठा रहा है। 1988 में जब यामीन के भाई राष्ट्रपति मामून अब्दुल कय्यूम के खिलाफ तख्ता—पलट हो रहा था, तब उन्हें भारत की फौजों ने ही बचाया था। यामीन में कुछ तो कृतज्ञता—भाव होना चाहिए। यह ठीक है कि चीन के पास ज्यादा मालमत्ता है। वह मालदीव, श्रीलंका और नेपाल जैसे भारत के पड़ौसियों की तात्कालिक मदद काफी शानशौकत के साथ कर सकता है लेकिन इन देशों को यह नहीं भूलना चाहिए कि जब पांव मुड़ते हैं तो वे पेट की तरफ ही झुकते हैं। यह ठीक है कि आजकल भारत के पड़ौसी देशों में चीन की रुचि कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। लेकिन इन देशों को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत के बिना उनका गुजारा नहीं हो सकता। भारत और ये सब देश सदियों से एक—दूसरे में गुंथे रहे हैं।

हमारे पड़ौसी देशों के कुछ नेता कभी—कभी बहुत ही गैर—जिम्मेदाराना बर्ताव करते हैं लेकिन उनके साथ भारत का बर्ताव कैसा होना चाहिए? मैं स्वयं इस पक्ष में कभी नहीं रहा कि हम इन देशों के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप करें या बात—बात में उन्हें धमकी दें। मैं नहीं चाहता हूं कि कूट नीति की बजाय हम उन्हें कूटने की नीति चलाएं। यह उनकी संप्रभुता का उल्लंघन होगा लेकिन यह देखना भारत की जिम्मेदारी है कि उसके पड़ौस में अराजकता न फैले, क्योंकि उसका सीधा असर यदि किसी पर सबसे ज्यादा होगा तो भारत पर होगा। यदि पड़ौसी के घर में आग लगेगी तो हमारा घर कैसे बचेगा? यह पड़ौसी के भी हित में होगा और भारत के हित में भी कि हम उसकी मदद करें। मालदीव में शांति और व्यवस्था बनी रहे और लोकतंत्र भी प्रतिहत न हो, इसके लिए इस समय भारत की कूटनीतिक सक्रियता बेहद जरुरी है।