भारतवर्ष में किनके निशाने पर हैं लोकतंत्र का चौथा स्तंभ

  • 2016-05-18 12:40:48.0
  • संजीव पांडेय

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ
एक ही दिन में दो पत्रकारों की हत्या हो गई। चौथे खंभे पर बेखौफ हमला लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। एक हमला बिहार के सीवान में हुआ, तो दूसरा हमला झारखंड के चतरा में। बिहार के सीवान के शहरी थाना क्षेत्र में एक राष्ट्रीय दैनिक के पत्रकार राजदेव रंजन की गोली मार कर हत्या कर दी गई। हत्यारे पेशेवर अपराधी थे। वे मोटरसाइकिल पर सवार थे और हत्या के बाद फरार हो गए। प्रारंभिक जांच में हत्या के पीछे का कारण माफिया-राजनेता गठजोड़ बताया जा रहा है। हालांकि पुलिस अभी जांच में लगी हुई है। जिस दिन राजदेव की हत्या हुई उसी दिन बिहार के पड़ोसी राज्य झारखंड के चतरा में एक टीवी चैनल के पत्रकार की हत्या कर दी गई। उन्हें भी पेशेवर अपराधियों ने गोली मारी। दो पत्रकारों की हत्या के बाद अब दूरदराज के इलाकों और जिलों में तैनात संवाददाताओं में खौफ है।

भारतीय प्रेस परिषद ने हत्या की इन दोनों घटनाओं को गंभीरता से लिया हैं और इन पर बेहद चिंता जताते हुए इनकी जांच के लिए समिति गठित की है। बिहार और झारखंड पहले राज्य नहीं हैं जहां पत्रकारों पर जानलेवा हमले हुए हैं। इससे पहले देश के दूसरे राज्यों में भी पत्रकारों की हत्या की घटनाएं हुई हैं। सीवान में पत्रकार की हत्या का मामला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि इससे पहले इसी जिले में पहले भी दो बार पत्रकारों पर गंभीर हमले हुए थे। खुद राजदेव पर 2005 में एक बार घातक हमला हो चुका था। लेकिन पुलिस ने मामले में गंभीरता से कार्रवाई नहीं की थी। उससे पहले 1994 में एक पत्रकार इंद्रमणि सिंह की हत्या सीवान में की गई थी। जबकि इसके कुछ साल बाद ही एक राष्ट्रीय समाचार पत्र के ब्यूरो चीफ रवींद्र प्रसाद वर्मा पर भी जानलेवा हमला हुआ था।

अगर 2016 के पहले चार महीनों के आंकड़ों को देखें तो भारत में पत्रकारों की सुरक्षा की स्थिति पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी खराब हो गई है। इस साल पाकिस्तान में एक पत्रकार की हत्या की गई। जबकि बांग्लादेश में भी एक संपादक की हत्या कर दी गई। वहीं अफगानिस्तान में एक पत्रकार को आतंकियों ने मार दिया। पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा के डेरा इस्माइल खान में पत्रकार मोहम्मद उमर की हत्या कर दी गई। अफगानिस्तान में ननगहार रेडियो के मोहम्मद जुबेर की हत्या की गई। आंकड़ों के हिसाब से बात करें तो पूरी दुनिया में 2016 के चार महीनों में उन्नीस पत्रकार मारे गए, जिनमें से दस पत्रकारों की हत्या के पीछे रहे मकसद का जांच एजेंसियों ने पता लगा लिया। जबकि छह पत्रकारों की हत्या किस इरादे से की गई, इसका पता अभी तक नहीं चल पाया है।

कमेटी फॉर प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट के आंकड़े भारत में पत्रकारों की सुरक्षा की गंभीर स्थिति को दर्शाते हैं। भारत में पत्रकार नक्सलियों, माफियाओं, राजनीतिकों, अपराधियों के निशाने पर हैं। पत्रकारों पर हमलों को लेकर जो आंकड़े सामने आए हैं वे भारत की छवि पाकिस्तान और बांग्लादेश के जैसी बना रहे हैं। 1992 से अब तक भारत में इकसठ पत्रकारों की हत्या हुई है। इनमें से अड़तीस पत्रकारों की हत्या का उद््देश्य पता चल गया है। जबकि तेईस पत्रकार की हत्या के पीछे रहे मकसद का पता नहीं चला। पाकिस्तान के हालात कहीं ज्यादा खराब हैं, क्योंकि यहां अनेक पत्रकारों की जान आतंकी संगठनों ने ली है। तालिबान के मुख्य निशाना पत्रकार ही रहे हैं। वहीं कराची जैसे शहर में पत्रकार संगठित अपराधी गिरोहों की भी आंख की किरकिरी बने रहे हैं। पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में पत्रकारों की जान आईएसआई जैसी खुफिया एजेंसियों और आतंकियों दोनों ने ली है।



आंकड़ों के अनुसार 1992 से लेकर अब तक पाकिस्तान में सतहत्तर पत्रकार मारे गए हैं। इनमें से सत्तावन पत्रकारों की हत्या का उद्देश्य जांच एजेंसियों ने पता कर लिया, जबकि बीस पत्रकारों की हत्या का उद्देश्य अभी तक रहस्य के आवरण में है। पाकिस्तान में सतहत्तर पत्रकारों के अलावा टीवी चैनल में काम करने वाले अन्य सात कर्मचारी भी आतंकी हमलों में मारे गए हैं। जबकि भारत के अन्य पड़ोसी बांग्लादेश में 1992 से अब तक उनतीस पत्रकारों की हत्या हुई है। इनमें से बीस पत्रकारों की हत्या का मकसद पता चल गया, जबकि नौ पत्रकारों की हत्या का मकसद अब तक जाना नहीं जा सका है।

बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत में पत्रकारों पर हो रहे हमलों के कई कारण समान हैं। लेकिन भारत के लिए चिंता की बात है कि यहां कानून-व्यवस्था की स्थिति पाकिस्तान और बांग्लादेश जितनी खराब नहीं है। पाकिस्तान में बेशक माफिया गिरोहों और संगठित अपराधियों ने भी पत्रकारों की हत्या करवाई है। लेकिन पाकिस्तान में बड़ी संख्या में पत्रकारों की हत्या के पीछे तालिबान और अन्य आतंकी संगठन हैं। कई बार तालिबान ने पत्रकारों को खुले तौर पर धमकाया। उन्हें सरकार का गुलाम बता कर उन पर लगातार जान से मारने की धमकी दी गई। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों ने कई पत्रकारों की हत्या करवाई है। ये पत्रकार अपनी खोजी खबरों के कारण आईएसआई के निशाने पर आए। पत्रकार हामिद मीर पर हुए हमले के पीछे भी आईएसआई का हाथ बताया गया था। जबकि पत्रकार शहजाद सलीम की मौत ही आईएसआई की हिरासत में हुई। उधर पिछले दिनों बांग्लादेश में पत्रकारों पर हुए हमलों में सीधे तौर पर चरमपंथियों का हाथ बताया जा रहा है। हाल ही में एक पत्रिका के संपादक की हत्या चरमपंथियों ने कर दी। भारत में भी पाकिस्तान की तरह उग्रवाद प्रभावित राज्यों में पत्रकार निशाने पर रहे हैं। नक्सल प्रभावित राज्यों में पत्रकार आतंकियों और पुलिस बल के बीच फंसे हुए हैं। आतंकवाद प्रभावित मणिपुर, असम, कश्मीर में कई पत्रकारों की हत्या बीते सालों में हुई है। लेकिन बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में पत्रकारों की हत्या चिंता का नया विषय है। क्योंकि यहां पर पत्रकारों की हत्या के पीछे संगठित अपराधी गिरोह, माफिया और राजनीतिकों का गठजोड़ है। आतंकवाद के दौर में पंजाब में भी पत्रकारों की हत्या हुई। 1980 से 1995 तक वहां आतंकवाद के दौर में कई पत्रकार मारे गए। ‘पंजाब केसरी’ के मालिक लाला जगतनारायण, उनके बेटे रमेश चंद्र और ऑल इंडिया रेडियो के एमएल मनचंदा की हत्या आतंकियों ने की थी। कश्मीर में पत्रकारिता करते हुए अब तक कई पत्रकार आतंकी हमलों के शिकार हुए हैं। पूर्वोत्तर के राज्यों में भी पत्रकार आतंकियों के हमलों के शिकार हुए।

लेकिन हिंदी पट्टी में पत्रकारों को ज्यादा खतरा संगठित अपराधी गिरोहों से है। 2015 में चार महीनों के भीतर अकेले उत्तर प्रदेश में चार पत्रकार मारे गए। इन हत्याओं में शक की सूई भूमाफिया, खनन माफिया और राजनीतिकों पर गई। पिछले साल चंदौली जिले में एक टीवी चैनल के अंशकालिक संवाददाता हेमंत कुमार यादव और उत्तर प्रदेश के ही शाहजहांपुर में पत्रकार जगेंद्र सिंह की हत्या कर दी गई। जगेंद्र सिंह हत्याकांड में छह लोग नामजद भी किए गए। जगेंद्र सिंह पत्रकारिता के नए माध्यम सोशल मीडिया से जुड़े हुए पत्रकार थे। उन्हें घर से खींच कर तेल छिडक़ कर जिंदा जलाने का प्रयास किया गया था। उन्होंने इलाज के दौरान इलाके के पुलिस अधिकारियों और राजनीतिकों पर गंभीर आरोप लगाए। उनका आरोप था कि चूंकि उन्होंने इलाके के ताकतवर लोगों के गैरकानूनी कामों का लगातार खुलासा किया था, इसीलिए उन्हें जलाने की घटना हुई। 2015 में बरेली में एक स्थानीय हिंदी दैनिक के अंशकालिक संवाददाता संजय पाठक और चित्रकूट जिले में भी एक पत्रकार की हत्या कर दी गई। दोनों की हत्या के आरोप खनन माफियाओं पर लगे थे। पत्रकारिता के फलक का विस्तार हुआ है। आजादी के बाद भारत में प्रिंट मीडिया और रेडियो पत्रकारिता के मुख्य माध्यम थे।
-संजीव पांडेय