व्यवहार है मनुष्य की आंतरिक स्थिति का विज्ञापन

  • 2016-06-19 08:30:30.0
  • रज्जाक अहमद

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हमें अपने वेदों और अन्य भारतीय धर्मग्रंथों में सुख के विषय में बहुत कुछ पढऩे को मिलता है। वैसे भारत की आध्यात्मिक संस्कृति सुख से भी आगे संतोष एवं आनंद की बात करती है। उनके बताये अनुसार सुख और संतोष में आकाश-पाताल जैसा अंतर है। सुख भौतिक है-संतोष आध्यात्मिक सुख मांगपरक है, तो संतोष अनुभूति परक मनुष्य सदैव आत्म संतोष और आनंद प्राप्ति की कामना करता है। कभी उसे सुख से संतोष मिलता है, तो कभी सुख को त्यागकर सुख साधनों पर निर्भर ही नही करता है, बल्कि यह मन: स्थिति पर निर्भर है। आप अक्सर देखते हैं कि अधिकतर साधन संपन्न व्यक्ति दुखी रहते हैं, जबकि अभावग्रस्त किसान व मजदूर सदैव सुखी व प्रसन्न रहते हैं। व्यक्ति भांति-भांति के सुख साधनों को एकत्र कर लेना ही सुख का आधार मानता है। नीति-अनीति से या उचित-अनुचित किसी भी तरह हो संसार के सभी भोग्य पदार्थों को इंसान स्वयं ही हड़प लेना चाहता है और इसमें इतना डूब जाता है कि उसे बाकी किसी जिम्मेदारी का अहसास ही नही रहता। इस विवेकहीनता में मनुष्य सुख भोगने की क्षमता ही गंवा बैठता है। सुख के अधिक अतिक्रमण में भी दुख है। गरीब व पात्र की मदद, बीमार व्यक्ति की सेवा या अन्य किसी भी सेवा में चाहे वह पशु-पक्षियों की ही हो, करने में कितना ही कष्ट क्यों ना हो पर जिस आत्मिक संतोष की अनुभूति होती है, उसका शब्दों में कोई बखान नही हो सकता।

यदि अज्ञान अंधकार छाया रहा और हम सबकी प्रवृत्ति यही बनी रही कि बात बनाने को आगे और काम करने को पीछे रहने की दौहरी चाल चलते रहे तो निश्चित तौर पर हमें भविष्य में हर मुद्दे पर असफलता मिलेगी। समाज में मान्यताएं समय के साथ बनती रहती हैं, बिगड़ती रहती हैं। आज के दौर में अधिकतर आदमी बनावटी जीवन जी रहा है। वह यह दिखाने की कोशिश में लगा है कि वह समाज में दूसरों से बड़ी हैसियत रखता है। आज समाज में साधारण जीवन जीने वालों को लोग दरिद्र या कंजूस समझते हैं। जबकि ना सादगी का कभी अपमान हुआ है, ना उसके प्रति किसी में घृणा उत्पन्न हुई है, बल्कि सादगी व कम आवश्यकताओं में ही अपना गुजारा चला लेने वाले व्यक्तियों को भी समाज में असाधारण सम्मान मिला है। जैसे -महात्मा गांधी व लालबहादुर शास्त्री। गांधीजी खद्दर की एक धोती पहनते थे। स्व. लालबहादुर शास्त्री जी का जीवन सादगी की मिसाल है, लेकिन इससे उनके जीवन में कोई कमी नही आयी। बल्कि उस दौर के संपन्न लोग ही नही सर्वसाधारण भी इन्हीं साधनों को अपनाने में गौरव अनुभव करने लगा।

हमें अगर समाज को व देश के आगे बढ़ाना है तो हमें ईमानदारी से एक प्रमाणिक लोकसेवी बनना चाहिए या ईमानदार सामाजिक कार्यकत्र्ता। ईमानदार सामाजिक कार्यकत्र्ता को समाज में सम्मान मिलता है। ईमानदार लोकसेवक के प्रति-जन साधारण की श्रद्घा उमड़ती है, सम्मान बढ़ता है, उसकी प्रशंसा होती है-जैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस समय हम सबकी प्रशंसा के पात्र बन रहे हैं। प्रशंसा भी व्यक्ति की एक संपदा है जो हर किसी के पास नही होती। मनुष्य की छवि उसके व्यवहार पर निर्भर होती है।

व्यक्ति को वेशभूषा आकृति उसके बोलने का ढंग ही प्रथम संपर्क में सामने आता है। मनुष्य के व्यक्तित्व का पहला परिचय उसके व्यवहार से ही मिलता है। व्यवहार ही मनुष्य की आंतरिक स्थिति का विज्ञापन है। कई लोग देखने में बड़े सौम्य दिखाई देते हैं।  उनकी आकृति भी बड़ी शांत व सरल दिखाई देती है लेकिन जैसे ही आपका उनसे संपर्क होता है तो चंद मिनट में ही आपको उनकी वाणी व भाषा से वह सभी बातें व्यक्त हो जाती हैं। जो उनके अंदर के स्वभाव व दुर्गुणों के रूप में शामिल हैं। असंस्कृत मन अशिष्ट और भद्दे व्यवहार के लिए प्रेरित करता है। कुसंस्कारी चित्त उसी प्रकार के व्यवहार माध्यम से अपना परिचय दे देता है और पहले संपर्क की प्रतिक्रिया अंत में अपना प्रभाव कायम रखती है। यहां तक कि वह बाद के सभी अच्छे प्रभावों को भी धूमिल कर देता है। इसलिए लोकसेवी को अपने व्यक्तित्व का गठन करते समय आचरण, रहन सहन स्वभाव को आदर्शरूप में प्रस्तुत करने के साथ-साथ व्यवहार के द्वारा भी अपनी आदर्शवादिता का प्रभाव छोडऩा चाहिए, प्रतिभा शरीर की आकृति पर निर्भर नही है। विद्वत्ता और महानता का संबंध शरीर से नही आत्मा से है।
- रज्जाक अहमद