अधोसंरचना विकास के पैरों की बेडिय़ां

  • 2016-04-27 09:30:40.0
  • डा. भरत झुनझुनवाला
अधोसंरचना विकास के पैरों की बेडिय़ां

देश की इन्फ्रास्क्चर कंपनियों द्वारा किए जा रहे फर्जीबाड़े के कारण इन्हें घाटा लग रहा है। ऐसे में इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों द्वारा किए जा रहे फर्जीबाड़े पर नियंत्रण किया जाए। इनके खातों का बाहरी आडिट कराया जाए। फर्जी बिल लगाकर इनसे रकम वसूल की जाए। तदानुसार बिजली, एयरपोर्ट की एंट्री फीस तथा हाई-वे के टोल को कम किया जाए। ऐसा करने से भारत में इन्फ्रास्ट्रक्चर की मांग बढ़ेगी और कंपनियां लाभ में आ जाएंगी। तब विदेशी निवेशक स्वयं ही भारत में निवेश को आकर्षित होंगे.

केंद्र सरकार द्वारा बुनियादी संरचना में निवेश बढ़ाने के पुरजोर प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार द्वारा अधोसंरचना में निवेश को नेशनल इन्वेस्टमेंट एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड स्थापित किया गया है। संयुक्त अरब अमीरात ने इस अधोसंरचना फंड में निवेश करना स्वीकार किया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश की संभावनाओं को आस्ट्रेलिया के निवेशकों के सामने प्रस्तुत किया है। पिछले महीने वित्त मंत्री अरुण जेटली और अमरीका के वित्त मंत्री जेकब ल्यू के बीच वार्ता हुई है। सहमति बनी है कि बुनियादी ढांचा के निवेश के रास्ते में आ रही बाधाओं को मिलकर दूर करने का प्रयास किया जाएगा, जिससे अमरीकी कंपनियां भारत में निवेश करें। सरकार के इन प्रयासों का स्वागत है।

इन प्रयासों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारतीय अधोसंरचना में निवेश करना निवेशकों के लिए लाभकारी है या नहीं। निवेशक लाभ कमाने को निवेश करते हैं। भारत की इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों का रिकार्ड अच्छा नहीं है। भारतीय बैंकों द्वारा इन्हें दिए गए तमाम ऋण खटाई में पड़ गए हैं। ऐसे में भारतीय इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश करने का उत्साह नहीं बनता है, जैसे घाटे में चल रही कंपनी में निवेश नहीं किया जाता है। जरूरी है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के घाटे में जाने के कारणों को दूर किया जाए।

इन्फ्रास्ट्रक्चर के घाटे में जाने का मूल कारण मांग में कमी है। जैसे हाई-वे पर ट्रकों की संख्या कम हो, तो टोल की पर्याप्त वसूली नहीं होती है। अथवा बिजली की मांग कम हो तो दाम गिर जाता है। मेट्रो में यात्रियों की संख्या कम हो तो आय कम होती है। ऐसे में इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश घाटे का सौदा हो जाता है। इस समस्या का दूसरा कारण है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर महंगा है। जैसे हाई-वे पर टोल रेट कम हो, तो यात्री कार से यात्रा करेगा। टोल रेट ज्यादा हो तो वह ट्रेन से यात्रा करेगा। अथवा मेट्रो का किराया कम हो तो यात्री मेट्रो से सफर करेगा। किराया ज्यादा हो तो वह बस से सफर करेगा। अथवा बिजली का दाम कम हो तो उपभोक्ता एयर कंडीशनर लगाएगा। बिजली का दाम ज्यादा हो तो वह डेजर्ट कूलर लगाएगा और बिजली की खपत कम करेगा। इन्फ्रास्ट्रक्चर के महंगा होने का कारण इस क्षेत्र में व्याप्त अकुशलता है। इन योजनाओं का कुशल क्रियान्वयन किया जाए तो मूल्य कम हो जाएंगे और डिमांड स्वयं ही उत्पन्न हो जाएगी। ऐसा करने से निवेश भी सफल होगा।

जैसे दुकानदार द्वारा माल सस्ता उपलब्ध कराया जाए तो कस्टमर लाइन लगाकर खरीदता है और निवेशक दिल से निवेश करते हैं। भारतीय इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों की अकुशलता का कारण भारत सरकार की आतुरता है। कंपनियां मुनाफाखोरी न करें, इसलिए हाई-वे का टोल, एयरपोर्ट की एन्ट्री फीस एवं बिजली के दाम नियामक आयोगों द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। आयोग द्वारा कितना मूल्य निर्धारित किया जाएगा, इसकी अनिश्चितता बनी रहती है। जैसे किसी कंपनी ने हाई-वे बनाने में निवेश किया। लाभ कमाने के लिए कंपनी ट्रक से 500 रुपए का टोल वसूल करना चाहती है, लेकिन सरकारी नियंत्रक ने टोल का रेट 400 रुपए निर्धारित कर दिया। ऐसे में कंपनी अनायास घाटा खाती है। यही हाल बिजली कंपनियों का है। नियामक आयोग द्वारा उचित दाम न दिए जाने के कारण उत्पादन कंपनियां घाटे में आ जाती हैं। एक ओर कुआं है, तो दूसरी तरफ  खाई। कंपनियों को मूल्य निर्धारण की छूट दी जाए तो वे मुनाफाखोरी करती हैं। दूसरी ओर नियामक द्वारा मूल्य निर्धारण में अनिश्चितता बनी रहती है। आयोग ने दाम कम निर्धारित किए तो कंपनी घाटे में आ जाती है। इस समस्या का हल निकाला गया है कि आयोग द्वारा दाम इस प्रकार निर्धारित किए जाएं कि कंपनियां लाभ कमा सकें।

नियामक आयोग द्वारा मूल्य निर्धारण की दो व्यवस्थाएं हैं। एक व्यवस्था प्रतिस्पर्धा की है। जैसे बंगलूर और चेन्नई के  बीच हाई-वे बनाना है। जो कंपनी सबसे कम टोल पर इसे बनाने को तैयार हो, उसे ठेका दिया जाए। लेकिन हर परियोजना के लिए इस प्रकार की प्रतिस्पर्धा सही नहीं होती है। कई परियोजनाओं के लिए एक भी कंपनी आगे नहीं आती है। ऐसे में सरकार ने ‘कास्ट प्लस’ का फार्मूला निकाला है। तय किया गया कि कंपनी द्वारा जो निवेश किया जाएगा, उसके अनुसार मूल्य निर्धारित किए जाएंगे। जैसे हाई-वे 1000 करोड़ रुपए में बना तो टोल 100 रुपए और 2000 करोड़ में बना तो टोल 200 रुपए वसूल करने की छूट होगी। यह व्यवस्था कंपनियों के लिए  लाभकारी सिद्ध हुई। उन्हें गारंटी मिल गई कि नियामक आयोग द्वारा निर्धारित मूल्य पर उनका निवेश सफल होगा।यह व्यवस्था सही रही। इन्फ्रास्ट्रक्चर में निजी निवेश आया, लेकिन समस्या दूसरे स्तर पर उत्पन्न हो गई। कंपनियों ने अपने खातों में फर्जीबाड़ा शुरू कर दिया। मसलन किसी विद्युत परियोजना के निर्माण में वास्तविक निवेश 1,000 करोड़ हुआ, लेकिन कंपनी ने फर्जी बिल लगाकर निवेश को 2,000 करोड़ दिखा दिया। नियामक आयोग ने 2,000 करोड़ की लागत मानकर बिजली का दाम 8 रुपए प्रति यूनिट निर्धारित कर दिया। कंपनी को भारी मुनाफा हुआ। चार रुपए के उचित दाम के स्थान पर उसे अनायास ही आठ रुपए का दाम मिला। उपभोक्ता को घाटा लगा। बिजली महंगी होने से उसने एयरकंडीशनर नहीं लगाए। बिजली की मांग कम हो गई। मांग कम होने से कंपनी को फिर भी घाटा लगा।

मूल बात यह है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के द्वारा फर्जी बिल लगाकर सुविधाओं के दाम ऊंचे वसूले जा रहे हैं। इससे मांग कम हो रही है और फिर भी इन्हें घाटा लग रहा है। जैसे सब्जी महंगी बेचने वाले का माल नहीं बिकता है और वह घाटा खाता है। देश की इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों द्वारा किए जा रहे फर्जीबाड़े के कारण इन्हें घाटा लग रहा है। ऐसे में इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों द्वारा किए जा रहे फर्जीबाड़े पर नियंत्रण किया जाए। इनके खातों का बाहरी आडिट कराया जाए। फर्जी बिल लगाकर इनसे रकम वसूल की जाए। तदानुसार बिजली, एयरपोर्ट की एंट्री फीस तथा हाई-वे के टोल को कम किया जाए। ऐसा करने से भारत में इन्फ्रास्ट्रक्चर की मांग बढ़ेगी और कंपनियां लाभ में आ जाएंगी। तब विदेशी निवेशक स्वयं ही भारत में निवेश को आकर्षित होंगे। वित्त मंत्री की मंशा फलीभूत होगी।
-डा. भरत झुनझुनवाला