वैदिक सूक्तों के द्रष्टा स्मृतिकार महर्षि पराशर

  • 2016-05-05 07:30:12.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

महर्षि पराशर

वैदिक सूक्तों के द्रष्टा और ग्रंथकार के रूप में प्रसिद्ध गोत्रप्रवर्तक ऋषि पराशर शक्ति मुनि के पुत्र एवं ब्रह्मर्षि वशिष्ठ  के पौत्र थे। इनकी माता का नाम अदृश्यकन्ति था, जो उतथ्यग मुनि की पुत्री थी। कहीं- कहीं इन्हें पाराशर भी कहा गया है।पौराणिक मान्यतानुसार पराशर प्राचीन भारतीय ऋषि मुनि परंपरा की श्रेणी में एक महान ऋषि महर्षि पराशर का जन्मर अपने पिता शक्ति की मृत्यूश के बाद हुआ था, तथापि गर्भावस्थाक में ही इन्हों ने पिता द्वारा कही हुई वेद ऋचायें कंठस्थथ कर ली थी। प्रमुख योग सिद्दियों के द्वारा अनेक महान शक्तियों को प्राप्त करने वाले ऋषि पराशर महान तप और साधना भक्ति द्वारा जीवन के पथ प्रदर्शक के रुप में जाने जाते हैं। वेदव्यास कृष्ण द्वैपायन के पिता महर्षि पराशर जी का दिव्यव जीवन चरित्र अत्येंत अलौकिक व अद्वितीय है, जिन्होंने धर्मशास्त्रि, ज्यो तिष, वास्तुककला, आयुर्वेद, नीतिशास्त्रच, विषयक ज्ञान मानव मात्र को दिया। महर्षि पराशर रचित ग्रन्थ? वृहत्पतराशर होराशास्त्र , लघुपराशरी, वृहत्पसराशरीय धर्म संहिता, पराशर धर्म संहिता, पराशरोदितम, वास्तु्शास्त्र म, पराशर संहिता (आयुर्वेद), पराशर महापुराण, पराशर नीतिशास्त्रस, आदि मानव के लिए कल्यािणार्थ रचित ग्रन्थ  लोकख्यात हैं। प्राचीन काल के शास्त्रियों में प्रसिद्ध पराशर के नाम पर ऋग्वेद के कई सूक्त हैं।

पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार ऋषि पराशर के पिता शक्ति मुनि का देहांत इनके जन्म के पूर्व हो चुका था। अत: इनका पालन पोषण इनके पितामह वसिष्ठ ने किया था। यही ऋषि पराशर वेद व्यास कृष्ण द्वैपायन के पिता थे। अपने पितामह वशिष्ठे के द्वारा पालन -पोषण किये जाने और उनके पास ही रहकर विद्याध्यतयन करने के कारण पराशर वशिष्ठ  को ही अपना पिता समझते थे। एक बार पराशर की माता अदृश्यंती ने पराशर से कहा पुत्र जिन्हें  तुम पिता कहते हो वे वास्त व में तुम्होरे पिता नहीं पितामह हैं। पराशर के पूछने पर माता अदृश्य?न्ती ने समस्तन जानकारी उन्हें  उपलब्ध करा दी कि किस प्रकार तुम्हाारे पिता को राक्षस ने तुम्हाूरे जन्मश से पूर्व ही मार डाला था।महाभारत, आदिपर्व अध्याय 177 से 180 के संक्षेप के अनुसार जब पराशर बड़े हुए तो माता अदृश्यंती से इन्हें अपने पिता की मृत्यु का पता चला कि किस प्रकार राक्षस ने इनके पिता का और परिवार के अन्य जनों का वध किया। यह घटना सुनकर वह बहुत क्रोधित हुए और राक्षसों सहित समस्त लोकों का नाश करने के लिए उद्यत हो उठे। वसिष्ठ ने उन्हें बहुत समझा -बुझाकर शांत किया परन्तु क्रोधाग्नि व्यर्थ नहीं जा सकती थी, अत: समस्त लोकों का पराभव न करके पराशर नेराक्षसों के नाश के निमित्त राक्षस सत्र नामक यज्ञ आरंभ किया। सत्र में प्रज्वलित अग्नि से अनेक निरपराध राक्षस भी नष्ट होने लगे। इस प्रकार इस महाविनाश और दैत्यों के वंश ही समाप्त हो जाने की आशंका को देखकर निर्दोष राक्षसों को बचाने के लिए पुलस्त्य समेत अन्य ऋषियों ने पराशर ऋषि को जाकर समझाया और कहा कि ब्राह्मणों को क्रोध शोभा नहीं देता। शक्ति का नाश भी उसके दिये शाप के फलस्वरूप ही हुआ। हिंसा ब्राह्मण का धर्म नहीं है। इस प्रकार समझा-बुझाकर उन्होंने पराशर का यज्ञ समाप्त करवा दिया तथा संचित अग्नि को उत्तर दिशा में हिमालय के आस- पास वन में छोड़ दिया। वह आज भी वहाँ पर्व के अवसर पर राक्षसों, वृक्षों तथा पत्थरों को जलाती है।

महाभारत के ही एक कथा के अनुसार माघ महीने के शुक्ल पक्ष क़ी एकादशी तिथि को एक बार भगवान सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करने वाले थे। उसी दिन महर्षि पाराशर का एकादशी का व्रत था तथा उन्हें मकर संक्रांति का स्नान भी करना था। उस समय महर्षि पराशर प्रभास क्षेत्र में थे और वहाँ से उन्हें यमुना को पार कर के फिर कान्यकुब्ज क़ी सीमा में प्रवेश करना था। वह यमुना के तट पर पहुंचे और उन्होंने मल्लाह को पुकारा। मल्लाह घर पर उस समय नहीं था। उसकी बेटी मत्स्यगंधा घर पर थी। जिसके शरीर से सदा मछली क़ी बदबू आती रहती थी। मल्लाह ने उसे एक मछली के पेट से निकाला था और उसके शरीर से मछली सी गंध आने के कारण उसका नाम मत्स्यगंधा पड़ गया था। उसका वास्तविक नाम मत्स्योदरी था। उसका सत्यवती नाम भी था। मत्स्यगंधा ने बताया कि उसके पिता अभी जंगल में कहीं गये हुए है। महर्षि ने कहा कि उन्हें अतिशीघ्र अभी उस पार जाना है और उसके बाद भी लम्बी दूरी तय करनी पड़ेगी। समझ में नहीं आता कि कैसे उस पार जाया जाय? मत्स्योदरी ने प्रतीक्षा करने के लिए कहा परन्तु  महर्षि ने कहा कि तुम ही नाव चला कर उस पार ले चलो। महर्षि के प्रस्ताव को मत्स्योदरी ने अस्वीकार कर दिया। इस पर महर्षि ने कहा कि यदि उनका व्रत खंड होगा तों उसका पाप तुम्हे ही भुगतना पड़ेगा। यह सुन मत्स्यगंधा भयभीत हो गयी और उसने तत्क्षण नाव खोल कर महर्षि को बिठा नाव लेकर चल पड़ी। जब नाव कुछ दूर चली गयी तों महर्षि का चित्त विचलित होने लगा और उनमे वासना चलायमान हो गयी। महर्षि ने ध्यान लगाया तो भवितव्यता उन्हें दिखाई दे गयी। उन्होंने आँख खोली और फिर मत्स्यगंधा का हाथ पकड़ कर प्रणय के लिये आग्रह करने लगे। महर्षि को काम के वशीभूत देख मत्स्यगंधा बोली कि हे ऋषिवर! आप एक पूज्य एवं अति श्रेष्ठ दिव्य व्यक्तित्व हो। यह व्यवहार आप के लिये शोभा नहीं देता। महर्षि ने कहा कि ऐसा करने पर तुम भी मेरे प्रताप से सामान्य स्त्री नहीं रह जाओगी और जो तुम्हारे शरीर से सड़े मछली क़ी बू आती है उसे मैं अपने तपोबल से दूरकर पुष्पगंधा बना दूँगा। हमारे संपर्क से तुम्हारा कन्याभाव नष्ट न होगा और तुम्हारे शरीर की दुर्गंध दूर होकर एक योजन तक सुंगध फैलने लगेगी, यह वर पराशर ने सत्यवती को दिए। महर्षि ने अपने उद्योग से उसे अति खूबसूरत एवं मनमोहक सुगंध विखेरने वाली युवती बना दिया। जिससे चारों दिशायें भीनी- भीनी मीठी सुगंध से सुगन्धित हो उठीं। इस पर मत्स्यगंधा बोली कि ऐसे खुले आकाश के नीचे यह कार्य निंदनीय है। इस पर महर्षि पराशर ने अपने उद्योग से वहाँ घना कुहरा उत्पन्न किया जिससे चारो तरफ अन्धेरा हो गया। पौराणिक गाथाओं के अनुसार कुहरे का जन्म महर्षि पराशर के द्वारा हुआ था, तभी से कुहरा पडऩा शुरू हो गया। महर्षि के इस चरित्र का सांकेतिक उल्लेख कालिदास ने भी कुमारसम्भवम में किया है। इस प्रकार मत्स्यगंधा एवं महर्षि पराशर के इस संयोग से महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ, जिन्होंने चारो वेद एवं अठारह पुराणों क़ी रचना क़ी। मत्स्यगंधा के पुष्पगन्धा बनने की इस कथा से यह भी स्पष्ट होता है कि महर्षि पराशर एक ज्योतिषाचार्य ही नहीं अपितु एक कुशल एवं उत्कृष्ट चिकित्सा विज्ञान विशेषज्ञ थे।इन्होने स्मृति शास्त्र की भी रचना की, जिसे पाराशर स्मृति के नाम से जाना जाता है।