वर्तमान शिक्षा नीति में बदलाव है समय की आवश्यकता

  • 2016-03-29 09:30:59.0
  • सुरेश हिन्दुस्थानी

वर्तमान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जो चित्र और चरित्र दिखाई दे रहा है, उसमें निश्चित रूप से देश में प्रदान की जा रही शिक्षा का बहुत बड़ा योगदान है। देश में अभी जो शिक्षा प्रदान की जा रही है, वह मानकों के हिसाब से भारतीय नीति के अनुरूप नहीं कही जा सकती। विश्व के प्राय: सभी देशों में जो शिक्षा प्रदान की जाती है, वह उस देश के मूल भाव को संग्रहित करती हुई दिखाई देती है। इसके अलावा वास्तव में शिक्षा का मूल यह होना चाहिए कि उसमें उस देश का मूल संस्कार परिलक्षित हो। हमारे देश में किस प्रकार की शिक्षा प्रदान की जा रही है, इसका अध्ययन करने से पता चलता है कि जिन महापुरुषों ने देश की सुरक्षा को अपने कर्तव्य का मूल समझा था, आज वे महापुरुष राजनीति का शिकार होते जा रहे हैं। हम जानते हैं कि हमारे देश की कुछ किताबों में छत्रपति शिवाजी को आतंकवादी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जब हम भारत की रक्षा करने वाले वीर शिवाजी को आतंकवादी के रूप में पढ़ेंगे तब हमारी युवा पीढ़ी से हम किस प्रकार से यह अपेक्षा करें कि वे राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रति सजग रहें।

वर्तमान शिक्षा नीति

दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय की इस घटना के बाद एक बार फिर से भारतीय शिक्षा नीति के बारे में अध्ययन करने की आवश्यकता है। शिक्षा ग्रहण को प्राय: दो भागों में बांटा जा सकता है। पहली किताबी शिक्षा तो दूसरी व्यावहारिक शिक्षा। किताबी शिक्षा के लिए आज भारत के शिक्षालय समर्पित दिखाई देते हैं।

देश का हर निजी विद्यालय लगभग विदेशी शिक्षा से प्रभावित होकर अपने संस्थान में विदेश से प्रेरित शिक्षा देने का कार्य कर रहे हैं। जिसमें अंगे्रजी भाषा की प्रधानता तो है ही साथ ही अंगे्रजी संस्कारों की भी बहुलता का दर्शन कराया जाता है। कौन नहीं जानता देश के ईसाई शिक्षा संस्थानों को, जिनमें प्राय: बच्चों को भारतीयता से दूर रखने का प्रयास किया जाता है। कई शिक्षा संस्थानों में इस बात के भी प्रमाण मिले हैं कि छात्रों को केवल ईसाई धर्म ही श्रेष्ठ है, इस प्रकार की शिक्षा दी जाती है। इन संस्थानों में प्रमुख पदों पर केवल ईसाई ही रहते हैं। चर्च के रूप में संचालित किए जाने वाले ये ईसाई शिक्षा केन्द्र आज भारत को नकारने जैसे ही कार्य करते दिखाई देते हैं। वहां भारत माता की जय बोलने पर प्रतिबंध है। कई बार छात्रों को भारत माता की जय बोलने पर दण्डित किया जाता है। जिस शिक्षा के संस्थानों में उस देश के संस्कार नहीं होते, उस संस्थान की शिक्षा उस देश के विरोध में की गई कार्यवाही का ही हिस्सा माना जा सकता है।

वर्तमान में हमारे देश के सरकारी शिक्षण संस्थानों की हालत का अध्ययन करने से पता चलता है कि इन संस्थानों में छात्रों की उपस्थिति लगातार गिरती जा रही है। इसके पीछे का मूल कारण हमारी वर्तमान शिक्षा नीति है। उत्तरप्रदेश के एक सरकारी विद्यालय से निजी विद्यालय में प्रवेश लेने वाले एक छात्र का कहना है कि सरकारी विद्यालय में जो गणवेश है वह ठीक नहीं है। खाकी गणवेश पहनना हमें अच्छा नहीं लगता, इसलिए ही हमने अच्छे विद्यालय में प्रवेश लिया है। इसके अलावा सरकारी विद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षक कितने समय उपस्थित रहते हैं, इस बात ने भी सरकारी शिक्षण संस्थानों की साख पर सवाल उपस्थित किए हैं। वास्तव में शिक्षा के स्वरूप में बदलाव की आवश्यकता आज महसूस की जाने लगी है। समूचे देश में शिक्षा का भारतीयकरण होना चाहिए। यह भारत देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि शिक्षा के भारतीयकरण को भगवाकरण का नाम दे दिया जाता है। वास्तव में भारतीयकरण और भगवाकरण में बहुत अंतर है। भारतीयकरण शिक्षा का वास्तविक अर्थ यही है कि भारत से जुड़ी शिक्षा छात्रों को प्रदान की जाए। भारतीय मूल्यों के साथ रोजगार परक शिक्षा सभी को देना होगी, तभी देश से बेरोजगारी जैसी समस्या का भी निर्मूलन हो सकेगा, साथ में अन्य क्षेत्रों में भी विकास तेजी से नजर आएगा। हमें पहले यह समझना होगा कि शिक्षा किसलिए जरूरी है, क्या केवल साक्षर होने या नौकरी के लिए पढ़ाई की जानी चाहिए अथवा इसके और भी गहरे मायने हैं? विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय वह केंद्र होते हैं जहां विद्यार्थी को वैचारिक स्तर पर गढऩे का कार्य किया जाता है। सही बात यही है कि यदि प्रत्येक शिक्षण संस्थान के सभी प्रमुख अंग शिक्षक, शिक्षार्थी और गैर शैक्षणिक कर्मचारी अपने दायित्वों का निर्वहन सही तरीके से ईमानदार होकर करने लगें, तो भारत में शिक्षा की साख पर उत्पन्न होते खतरे से आसानी से निपटा जा सकता है। इन तीनों का संपूर्ण समर्पण समाज और सरकार दोनों को प्रेरित करने के साथ जहां जरूरत होगी, वहां बाध्य भी करेगा कि क्यों न इस बदहाल तस्वीर को बदला जाए, जितना संभव हो उतना अधिक आर्थिक व अन्य सहयोग देश की शिक्षण संस्थाओं को दिया जाए। अगर सही शिक्षा नीति अमल में लाई गई तो सरकारी और निजी संस्थानों के बीच की दूरी कम होगी। विद्यार्थी सरकारी तंत्र की व्यवस्था में ही विश्व स्तर की शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे। पुरातन कालीन भारत देश में शिक्षा के स्तर की बात की जाए तो प्राय: यह चित्र दिखाई देता है कि भारत वर्ष की शिक्षा के प्रति विश्व के सभी देशों में एक आदर भाव था। विश्व के कई देशों के नागरिक भारत के शिक्षालयों में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। लेकिन आज के भारत के युवा विदेश में पढ़ाई करने के लिए उतावले होते जा रहे हैं, इसे हमारी शिक्षा नीति का दुष्परिणाम ही कहा जाएगा। इस सब का परिणाम यह है कि भारतीय छात्रों का उत्तम किस्म की उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेशों के प्रति आकर्षण निरंतर बढ़ता जा रहा है। विदेशी विश्वविद्यालयों में पढऩे के लिए हर साल तकरीबन 15 अरब डॉलर की भारी भरकम राशि खर्च की जा रही है। सही बात यही है कि ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था समय की मांग है, और जो इस मांग को पूरा करेगा, जिसके पास अर्थ शक्ति होगी या जो आवश्यक धन की पूर्ति किसी तरह कर सकते हैं वे उसी तरफ दौड़ लगाएंगे, जहां कम समय में पर्याप्त जानकारियां प्राप्त हो सके। आज जो स्कूल पढ़ाई करने वालों का ग्राफ है, वह इन्हीं सब कारणों से निरंतर कई वर्षों के प्रयासों के बाद भी नकारात्मक बना हुआ है। दुनिया के देशों के बीच आज भी भारत में उच्च शिक्षा में सबसे कम जनसंख्यात्मक अनुपात के हिसाब से प्रवेश होते हैं। उच्च शिक्षा की स्थिति बेहतर बनाने के लिए किए जा रहे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा राज्यों के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा लाख प्रयास किए जाने के बाद भी स्थिति में अभी तक बहुत सुधार नहीं आ पाया है।  देखा यही जा रहा है कि योजना बनाने वाले उस पर आने वाले खर्च का सही अंदाजा तक नहीं लगा पा रहे हैं। यही कारण है कि भले ही भारत की उच्चतर शिक्षा व्यवस्था अमेरिका और चीन के बाद तीसरे नंबर पर आती हो, लेकिन श्रेष्ठ 100 विश्वविद्यालयों की सूची में भारत का एक भी नाम शामिल नहीं हो सका है। समय के साथ-साथ शिक्षा नीति में भी बदलाव आवश्यक है। हम ऐसी शिक्षा पद्धति तैयार करें कि अन्य देशों के लोग भी भारत में शिक्षा ग्रहण करने आएं।शिक्षा के प्रवत्र्तन से ही देश को बदला जा सकता है और इससे ही नकारात्मक सोच भी समाप्त होगा। उन्होंने शिक्षालय को भोजनालय से दूर रखने पर बल दिया तथा विद्यालयों में गुणवत्ता के साथ-साथ चरित्रवान शिक्षकों की नियुक्ति पर बल दिया।

शिक्षा में सुधार की जिम्मेवारी केवल सरकार ही नहीं, बल्कि समाज की भी है। समाज यदि शिक्षकों को सम्मान देगा तो निश्चित रूप से बच्चे संस्कारित होंगे। इसके अलावा भारत के शिक्षकों से भी इसी प्रकार की अपेक्षा की जाती रही है कि वे भी भारत के भविष्य को सुंदर और सुखमय बनाने के नजरिए से ही शिक्षा प्रदान करने की ओर प्रवृत हों। हमारे देश में शिक्षकों के बारे में बहुत ही सुंदर अवधारणा है कि शिक्षक ही संस्कारित और सभ्य समाज का निर्माण कर सकता है। इसलिए शिक्षकों को अपनी भूमिका में सुधार करना होगा और भारत के उत्थान के रास्ते पर छात्रों को लक जाने का मार्ग तैयार करना होगा।
-सुरेश हिंदुस्थानी