वैश्विक आतंक ने हिलाया सौम्य यूरोप

  • 2016-04-09 12:30:23.0
  • प्रो. एनके सिंह

वर्ष 2015 आतंकी घटनाओं के लिहाज से बेहद भयावह रहा और वर्ष विश्व भर में करीब 3300 लोगों की जानें आतंकी हमलों में गईं। संयुक्त राष्ट्र में जब मोदी ने विश्व से आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने का आग्रह किया था, तो भारत में बहुत से लोग मान रहे थे कि वह आतंक की समस्या को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं। अब वे सब भी इस समस्या पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं, विशेषकर यूरोप में इसके प्रति संगठित होकर लडऩे की बातें की जा रही हैं। हैरानी यह कि अभी भी इस समस्या का समाधान वैश्विक स्तर पर नहीं, बल्कि यूरोपीय हमलों को ध्यान में रखकर ढूंढा जा रहा है.

आतंकी हमले से ब्रसेल्स बुरी तरह से हिल गया और इसके कारण देश के लोगों का मनोबल काफी गिर गया है। बेल्जियम स्थली से फ्रेंच भाषी बहुल बनने वाला यह बहुसांस्कृतिक शहर नस्लीय समूहों में विविधता का कुटुंब बन चुका है। यहीं पर यूरोपीय संघ का मुख्यालय स्थापित है और यह पाश्चात्य इतिहास व सभ्यता के प्रतीकों का प्रतिनिधित्व करता है। यहां से आप यदि आधे घंटे की यात्रा करेंगे, तो आप वाटरलू पहुंच जाएंगे, जहां नेपोलियन बोनापार्ट ने अपना अंतिम युद्ध लड़ा था। उस युद्ध में अंतत: नेपोलियन को हार का सामना करना पड़ा था और वास्तव में ‘वाटरलू’ वाली जिस कहावत का हम उपयोग करते हैं, उसका जन्म भी यहीं से हुआ था।

युद्ध वाले स्थान पर अब जो स्तूप बचा है, उसकी यात्रा करने पर मुझे काफी हैरानी हुई। वहां आज भी हर चीज नेपोलियन के रंग में रंगी हुई थी, जबकि विजेता यानी वेलिंगटन का कहीं कोई जिक्र नहीं था। वहां मैं एक छोटी सी कलात्मक वस्तुओं की बिक्री वाली दुकान पर गया। उस दुकान से नेपोलियन की पिस्तौल की एक कलाकृति खरीदी जा सकती थी। वह पूरी दुकान नेपोलियन के बुत्त, तलवार आदि गैजेट्स से भरी हुई थी। वाटरलू के ऐतिहासिक युद्ध के विजेता ब्रिटिश जनरल ड्यूक ऑफ वेलिंगटन से जुड़ी कोई वस्तु उस दुकान पर उपलब्ध नहीं थी और ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों उन्हें कोई जानता ही न हो। ब्रसेल्स एक ऐतिहासिक स्थान है और इसके सेंट्रल प्लाजा में प्राचीन ऐतिहासिक राजमहल के दर्शन होते हैं। भारत के बिलकुल विपरीत यह ऐसा मनोरंजन स्थल है, जहां पर्यटकों व नागरिकों का जमावड़ा डार्क या ब्लोंड बीयर का आनंद लेता है, जैसा कि बेल्जियम की बीयर दुनिया भर को काफी पसंद है।वैश्विक आतंक ने हिलाया सौम्य यूरोप

आनंद से सराबोर इस खूबसूरत शहर में आतंकी हमले से मातम छा गया। लेकिन जेहाद के लिए नरमी व दयालुतापूर्ण व्यवहार रखने के लिए बेल्जियम या यूरोपीय निवासियों को इस हमले के लिए दोषी ठहराया जा सकता है। जैसे-जैसे मैं बेल्जियम के अगले हिस्सों की ओर बढ़ता गया, मैंने पाया कि ये इलाके पूरी तरह से जेहादी तत्त्वों से भरे पड़े थे। मैंने उन हालात का विश्लेषण करके काफी समय पहले चेता दिया था कि यह क्षेत्र आतंकवाद का केंद्र बन रहा है। बेल्जियम की ही बात करें, तो यहां एक चौथाई आबादी मुसलमानों की है और इसमें लगातार वृद्धि हो रही है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक यहां 11.25 फीसदी और फ्रांस में 9.6 फीसदी मुस्लिम आबादी है। हमारे कहने का यह मतलब नहीं कि वे सारे लोग जेहादी हैं, लेकिन यहां अल्पसंख्यक भी बहुसंख्यक कुटुंब की छवि और दृष्टिकोण को जबरदस्त तरीके से प्रभावित कर रहे हैं। यह सच है कि आयरलैंड के वासी, यहूदी या अफगान पहले भी आतंकी आंदोलनों को झेल चुके हैं, लेकिन 9/11 के हमले के बाद एक नए इस्लामिक जेहादी आंदोलन की शुरुआत हुई। इसका एकमात्र लक्ष्य उन तमाम लोगों या समुदायों का अंत है, जो इनके पक्ष में नहीं आते। इससे संबंधित मौजूदा एजेंडा बेकसूर लोगों की जान लेना है, जबकि इससे पहले भी ये आजादी या ऐसे ही अन्य मिशनों के जरिए अपने लक्ष्य को हासिल करने में प्रयासरत रहे हैं।

ब्रसेल्स में हुए आतंकी हमले की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने ली है। इस संगठन के पास वर्तमान में 30 हजार से भी ज्यादा लड़ाके हैं और संसाधनों के लिहाज से भी यह काफी संपन्न है। इसका मिशन अपने मजहबी दुश्मनों का नाश है। अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि समस्त पश्चिम आतंकवाद के प्रति सौम्य रुख अपनाता आया है और स्वतंत्रता के नाम पर भटके हुए लोगों की आदतों को बिगाड़ा जा रहा है। 9/11 के आतंकी हमले ने पहली बार इस हकीकत से पर्दा हटाया कि विश्व की सबसे बड़ी शक्ति का खुद की सुरक्षा का आश्वासन भी अब पुख्ता नहीं रह गया है। इसके बाद इसने लादेन के खात्मे की शुरुआत की। यूके में मैट्रो हमला, मुंबई हमला और अब ब्रसेल्स की घटना आतंक के खतरे के खिलाफ एक मंच पर आकर विचार करने को जरूरत को महसूस करवा रही है।

वर्ष 2015 आतंकी घटनाओं के लिहाज से बेहद भयावह रहा और विश्व भर में करीब 3300 लोगों की जानें आतंकी हमलों में गईं। संयुक्त राष्ट्र की सभा में जब मोदी ने विश्व से आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने का आग्रह किया था, तो भारत में बहुत से लोग मान रहे थे कि वह आतंक की समस्या को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं। अब वे सब भी इस समस्या पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं, विशेषकर यूरोप में इसके प्रति संगठित होकर लडऩे की बातें की जा रही हैं। हैरानी यह कि अभी भी इस समस्या का समाधान वैश्विक स्तर पर नहीं, बल्कि यूरोपीय हमलों को ध्यान में रखकर ढूंढा जा रहा है। यूरोपीय समस्या भी मुस्लिम आबादी में वृद्धि से जुड़ी हुई है। यहां तक कि लंदन में भी श्वेत समुदाय अल्पसंख्यक श्रेणी में आ चुका है और कुल आबादी में इसकी हिस्सेदारी 46 फीसदी के स्तर पर आ चुकी है। इसके मूल बाशिंदों के लिए यह एक चिंतनीय संदर्भ है।
-प्रो. एनके सिंह