घोषणाओं में उलझती बेरोजगारों की आवाज़

  • 2015-10-18 11:54:17.0
  • अश्वनी कुमार

अश्वनी कुमार

जैसे ही सत्ता बदलती है, बेरोजग़ारों की उम्मीदें उस वक्त आसमान छू रही होती है। देश का बेरोजग़ार युवा वर्ग अखबारों में त्रष्ठक्क के आंकड़े देखकर खुश हो जाता है की चलो अब देश तो तरक्की कर रहा है और वो इसी तरक्की वाले आकड़ों के दम पर नौकरी पाने के सपने पाल बैठता है। अक्सर नेताओं के भाषणों में बेरोजग़ारी को दूर करने की महत्वाकांक्षा लाखों युवाओं में जोश भर देती है। ऐसा दिखाया जाता है की वे ही उनके पालनहार है, वे सभी को चुटकियों में नौकरी दे देंगे। बस कमी यही है की लोग सत्ता में बैठे निकम्मों की जगह उन्हें दे दें। देश का मतदाता जिसे चाहे उसे वोट दे, लेकिन वोट डालने के बाद अंधभक्त होने के बजाय उनके प्रति सख्त रवैया दिखाए। कभी कोई सरकारें जनता को ये क्यों नहीं बताती की उसने अपने कार्यकाल में कितनी रिक्तियाँ निकली, कितनों को नौकरियां दी और उन नौकरी पाने वालों में नेताओं के कितने भाई-भतीजे थे? अगर ऐसा होता तो रोजग़ार के नाम पर बेरोजग़ार युवाओं को इतनी आसानी से नहीं ठगा जाता, जितनी आसानी से अबतक ठग लिया गया है।

लोग आसानी से तुलना कर पाते की मनमोहन सरकार ने कितनी नौकरियाँ दी, मोदी ने कितनी दी और विकास पुरुष नीतीश कुमार ने कितनी नौकरियां विकसित की।

कहती है नौकरियां देने से हमारी विकास की रफ़्तार कम हो जायेगी, इसलिए एक साल तक वैकेंसी बंद कर दी। सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई केश लेने से इंकार करती है की उनके पास चपरासी से लेकर अफसर तक की कमी है। पुलिस स्टेशन से लेकर सरकारी विभाग, अस्पतालों तक में कर्मचारियों की कमी का रोना रोया जाता है। निगम लोगों से टैक्स नहीं वसूल पाती क्योंकि उसके पास आदमियों की कमी है। न्याय नहीं मिल रहा क्योकि जजों की कमी है। लोगों के काम जहाँ के तहाँ अटके पड़े हैं। किसके कारण? सरकार बेरोजग़ारी पैदा करने की मशीन बन चुकी है। अखबारों में भारत के परमाणु बम-मिसाइलों की गाथा सुनकर चीन-पाकिस्तान पर हमले कर देने की सलाह देता युवावर्ग के पास हीरो-हीरोइन, सिनेमा और इंटरनेट के आलावा सवाल पूछने का वक्त ही कहाँ है? रैलियों में खम्भों पर चढक़र मोदी-मोदी के नारे लगाने वाले उनके सामने एकजुटता से ये सवाल क्यों नहीं करते? देश का एक बड़ा वर्ग बेरोजग़ारों की फ़ौज़ बनकर नौकरी पाने के सपने देख रही है, लेकिन कब तक? कई लोग कहते है की नौकरी का असली फायदा आरक्षण वाले उठाते हैं। बेशक, लेकिन आरक्षण का लाभ भी तो तभी मिलेगा जब नौकरियां मिलेगी रिक्तियां निकलेगी। क्या ये बेरोजग़ार सरकार पर दबाव नहीं दाल सकता? कर्मचारियों की कमी से जहाँ समूचा देश प्रभावित हो रहा है, वहां ये युवा संगठित होकर सरकार की चूजें हिला सकता है। मान लीजिये अगर सारे बेरोजग़ार संगठित हो गए, तब क्या होगा? सारी पार्टियाँ उनका समर्थन पाने के लिए उनकी पूजा करने लगेगी और ये सब बस चुनावों तक ही। लेकिन ये सभी अपना हक़ पाने के लिए उग्र हो गए तो हमारी जेहन में मिस्त्र के काहिरा चौक की तस्वीरें ताज़ा हो जायेगी इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता।

सबसे अहम सवाल है की ये बेरोजग़ार हैं कौन? ये कोई डुप्लेक्स बंगले में रहने वाले अरबपति के बेटे नहीं हैं। इनका बाप न ही किसी फैक्ट्री का मालिक है और न ही ये किसी सांसद या विधायक के सगे संबंधी होते हैं। ये सरकार द्वारा आंकड़ों में उलझाया व टोयोटो से चलने की सपने देखता युवा होता है। 5ङ्ग8 के कमरे में रहने वाला, मकान मालिक द्वारा सताया और कई बार भूखे सो जाने वाला छात्र होता है, जिसे हम भारत का भविष्य कहते हैं।

कभी नीतीश कुमार या नरेंद्र मोदी मिलें तो उनसे पूछियेगा की विकास का मतलब क्या होता है? (ये मैं बिहार चुनाव के नज़रिये से कह रहा हूँ।) अक्सर ये अपने भाषणों में सडक़ें बनवा देना, बिजली मुहैया करा देना व दो-तीन कल कारखाने लगा देने को ही विकास कहते हैं। लेकिन ये सब तो बुनियादी सुविधाएं हैं। उनसे पूछिये की बिहार की प्रति व्यक्ति आय की राष्ट्रीय आय की तुलना में कितना विकास हुआ?

रहन-सहन का स्तर कितना ऊपर उठा? क्या राज्य से पलायन रुक गया? शिक्षा-स्वास्थ के मामले में स्कूल और अस्पताल बनवा देने को विकास नहीं कहा जा सकता? मतलब, स्कूलों में प्रति बच्चे पर कितने शिक्षक हैं, जनजाति को कुपोषण से दूर रखने के लिए क्या कदम उठाये गए? ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को विटामिन-न्यूट्रिटियन्स युक्त भोजन उपलब्ध है भी या नहीं?

विकास के दावे किये जाते हैं लेकिन खोखले हैं। विकास से बेरोजग़ारी को जोडक़र देखने की कोशिश भी मत कीजियेगा नहीं तो आपको इतनी उपलब्धियाँ बतायी जाएंगी की आप त्रष्ठक्क और रुपये की भांति ऊपर निचे होते रह जायेंगें।