विकास की अंधी दौड से, प्रकृति का नाश संभव

  • 2015-05-29 04:23:52.0
  • उगता भारत ब्यूरो

polluted-riverओम प्रकाश 


प्रकृति के अवरोध कुछ तत्वों के अपनी मौलिक अवस्था में न रहने और विकृत हो जाने से प्रकट होता है। इन तत्वों में प्रमुख हैं जल, वायु, मिट्टी आदि है। पर्यावरणीय समस्याओं से मनुष्य और अन्य जीवधारियों को अपना सामान्य जीवन जीने में कठिनाई होनी है और कई बार जीवन-मरण का सवाल पैदा हो जाता है। प्रदूषण भी एक पर्यावरणीय समस्या है जो एक विश्वव्यापी समस्या बन गई है। पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और इंसान सब उसकी चपेट में हैं। औद्योगिक गतिविधियों से क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) नामक मानव-निर्मित गैस का उत्सर्जन होता है जो उच्च वायुमंडल के ओजोन परत को नुकसान पहुंचाती है। यह परत सूर्य के खतरनाक पराबैंगनी विकिरणों से हमें बचाती है। सीएफसी हरितगृह प्रभाव में भी योगदान करते हैं। पृथ्वी के वायुमंडल का तापमान लगातार बढ़ रहा है। साथ ही समुद्र का तापमान भी बढ़ने लगा है। पिछले सौ सालों में वायुमंडल का तापमान 3 से 6 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। लगातार बढ़ते तापमान से दोनों ध्रुवों पर बर्फ गलने लगेगी। इससे समुद्र का जल एक से तीन मिमी प्रतिवर्ष की दर से बढ़ेगा। समुद्र का जलस्तर दो मीटर बढ़ गया तो निचाई वाले देश डूब जाएंगे। इसके अलावा मौसम में भी बदलाव आ सकता है। मनुष्य और जीवधारियों में अनेक जानलेवा बीमारियों का कारण बन सकती हैं।


कई बार उद्योगों का रासायनिक कचरा और प्रदूषित पानी तथा शहरी कूड़ा-करकट नदियों में छोड़ दिया जाता है। इससे नदियां अत्यधिक प्रदूषित होने लगी हैं। जिनका जल अब अशुद्ध हो गया है। पानी में कार्बनिक पदार्थों (मुख्यतः मल-मूत्र) के सड़ने से अमोनिया और हाइड्रोजन सलफाइड जैसी गैसें उत्सर्जित होती हैं और जल में घुली आक्सीजन कम हो जाती है, जिससे मछलियां मरने लगती हैं। जो मानव एवं पशु के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा हैं। दूषित पानी पीने से ब्लड कैंसर, जिगर कैंसर, त्वचा कैंसर, हड्डी-रोग, हृदय एवं गुर्दों की तकलीफें और पेट की अनेक बीमारियां हो सकती हैं, जिनसे हमारे देश में हजारों लोग हर साल मरते हैं। विश्व में प्रति वर्ष 1.1 करोड़ हेक्टेयर वन काटा जाता है। वनों के क्षेत्रफल में लगातार होती कमी के कारण भूमि का कटाव और रेगिस्तान का फैलाव बढ़े पैमाने पर होने लगा है। अधिक मात्रा में उपयोग से ये ही कीटनाशक अब जमीन के जैविक चक्र और मनुष्य के स्वास्थ्य को क्षति पहुंचा रहे हैं। हानिकारक कीटों के साथ मकड़ी, केंचुए, मधुमक्खी आदि फसल के लिए उपयोगी कीट भी उनसे मर जाते हैं। इससे भी अधिक चिंतनीय बात यह है कि फल, सब्जी और अनाज में कीटनाशकों का जहर लगा रह जाता है, और मनुष्य और पशु द्वारा इन खाद्य पदार्थों के खाए जाने पर ये कीटनाशक उनके लिए अत्यंत हानिकारक सिद्ध होते हैं।


पर्यावरणीय समस्याएं विश्व के सामने मुंह खोले खड़ी हैं। विकास की अंधी दौड़ के पीछे मानव प्रकृति का नाश करने लगा है। सब कुछ पाने की लालसा में वह प्रकृति के नियमों को तोड़ रहा है। प्रकृति तभी तक साथ देती है, जब तक उसके नियमों के मुताबिक उससे लिया जाए। मनुष्य भाग्यशाली हैं कि हमें इतनी तरह की पर्वतमालाएं, पहाडि़यां और पठारों का उपहार प्रकृति से मिला है। ये पहाडि़यां और पर्वतमालाएं न सिर्फ दर्शनीय होती हैं, बल्कि ये भूमि को उपजाऊ बनाने में भी मुख्य भूमिका निभाती हैं। अगर हमें इन पहाडि़यों और पर्वतमालाओं का उपहार न मिला होता तो हमारी समतली भूमि कृषि योग्य न रहकर, साइबेरिया के रेगिस्तान की तरह रेतीली और बंजर बन गई होती। हम प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करें ताकि प्रकृति का उपहार मिल सकें। जलवायु और बरसात के अलावा हम और किन चीजों के लिए हिमालय के कर्जदार हैं। हम हिमालय के आभारी हैं उन विशाल नदियों के लिए जो हिमालय के नीचे की चैड़ी, समतली भूमि को उर्वर और कृषि योग्य बनाती हैं। हिमालय की ऊपरी सतह पर जमी बर्फ की मोटी परत लगातार पिघलती रहती है और हिमालय की तराई से निकलने वाली नदियों को हर वक्त पानी से लबालब भरे रखती है। बरसाती नदियां (कृष्णा और गोदावरी को छोड़कर) या तो सूख जाती हैं या बरसात खत्म होते ही पतले नाले में बदल जाती हैं। गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र सहित सारी नदियां, जिनकी उत्पत्ति हिमालय से होती है, अपने छोटे-छोटे नालों, झरनों समेत साल भर पानी से भरी बहती रहती हैं।


                मनुष्य की मानसिकता के साथ पर्यावरण का एक नजदीकी रिश्ता है। प्राचीन समय की सभ्यताओं में प्रकृति को सम्मान के भाव से देखा गया है - पहाड़, नदियां, वृक्ष, सूर्य, चँद्र...। जब हम प्रकृति और अपनी आत्मा के साथ अपने संबंध से दूर जाने लगते हैं, तब हम पर्यावरण को प्रदूषित करने लगते हैं और पर्यावरण का नाश करने लगते हैं। हमे उस प्राचीन व्यवस्था को पुनर्जीवित करना होगा जिससे की प्रकृति के साथ हमारा संबध सुदृढ़ बनता है। कुछ ऐसे कई व्यक्ति हैं जो कि लालचवश, जल्द मुनाफा और जल्द नतीजे प्राप्त करना चाहते हैं। उनके कृत्य जगत के पर्यावरण को नुक्सान पँहुचाते हैं। केवल बाहरी पर्यावरण ही नहीं, वे सूक्ष्म रूप से अपने भीतर और अपने आस पास के लोगों में नकरात्मक भावनाओं का प्रदूषण भी फैलाते हैं। ये नकरात्मक भावनायें फैलते फैलते जगत में हिंसा और दुख का कारण बनती हैं। ज्यादातर युद्ध और संघर्ष इन्हीं भावनाओं से ही शुरु होते हैं। जिसके परिणाम में पर्यावरण को नुक्सान होता है, और उसे स्वस्थ करने में बहुत समय लगता है। हमें मनुष्य के मानसिकता पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यह मानसिकता ही प्रदूषण की जड़ है - स्थूल तथा भावनात्मक। हमारे भीतर करुणा और परवाह जग जाते हैं, तो वे आधार बनते हैं प्राचीन समय में अगर एक व्यक्ति एक वृक्ष काटता था तो साथ ही 5 नये वृक्ष लगाता था। प्राचीन समय में लोग पवित्र नदियों में कपड़े नहीं धोते थे। केवल शरीर के अग्नि-संस्कार के बाद बची हुई राख को नदी में बहाते थे ताकि सब कुछ प्रकृति में वापिस लय हो जाये। हमें प्रकृति और पर्यावरण को सम्मान और सुरक्षा के भाव से देखने वाली प्राचीन प्रणालियों को पुनर्जीवित करना चाहिए।


प्रकृति के पास संतुलन बनाये रखने के अपने तरीके हैं। प्रकृति को ध्यान से देखें तो हम पायेंगे कि जो पंचतत्व इसका आधार हैं, उनका मूल स्वभाव एक दूसरे के विरोधात्मक है। जल अग्नि का नाश करता है। अग्नि वायु का नाश करती है...। और प्रकृति में कई प्रजातियां हैं - पक्षी, सरीसृप, स्तनधारी...। भिन्न प्रजातियां एक दूसरे से वैर रखती हैं, फिर भी प्रकृति एक संतुलन बना कर रखती है। प्रकृति से हमे ये सीखने की आवश्यकता है। हमारा मन तनाव मुक्त हो और हम इस खुले मन से प्रकृति का अनुभव करें। ऐसी स्थिति से हम इस सुंदर पृथ्वी का संरक्षण करने के उपाय बना सकेंगे। प्रकृति से जुड़ाव का एहसास होने लगेगा, अपने असल स्वभाव के साथ परिचित होने पर नकारात्मक भावनायें मिट जायेंगी।