प्रधानमंत्री कम, प्रचारमंत्री ज्यादा !

  • 2015-05-27 03:51:48.0
  • डॉ0 वेद प्रताप वैदिक

modi teaनरेंद्र मोदी जितने स्पष्ट बहुमत से प्रधानमंत्री बने, उतने बहुमत से कोई भी पिछले तीस साल में नहीं बना। इसलिए उनसे आशाएं भी गगनचुंबी हो गई थीं। उन्होंने चुनाव अभियान के लिए जितनी सभाएं की और देश के कोने-कोने में जितना घूमे, प्रधानमंत्री का कोई उम्मीदवार नहीं घूमा। इसी तरह उन्होंने हर सभा में जितने वादे किए, अच्छे दिनों के जितने मनमोहक चित्र खींचे और जितने सपने दिखाए, शायद किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं दिखाए।



भारत के आम मतदाता ने मोदी की कही हर बात पर विश्वास किया। उनके पास मोदी की योग्यता, मोदी के अनुभव और मोदी की दृष्टि को देखने-परखने का समय नहीं था। वह तो सोनिया-मनमोहन सरकार के भ्रष्टाचार से इतना तंग आ चुका था कि उसे एक ऐसे नायक की तलाश थी, जो उस सरकार को कूड़ेदान में बिठा सके। यदि मोदी की जगह कोई एकदम नौसिखिया भी जनमत की लगाम थाम लेता तो वह भी प्रधानमंत्री बन जाता। मोदी मुकद्दर के सिकंदर निकले। लगाम उनके हाथ लग गई। दिसंबर 2012 में ज्यों ही मोदी ने तीसरी बार गुजरात का चुनाव जीता, मैंने लेख लिखा “प्रधानमंत्री के द्वार पर मोदी की दस्तक।”



ऐसा नहीं है कि मोदी की योग्यता के बारे में मैं बेखबर था। लेकिन मुझे भविष्य की राजनीति फिल्म की तरह दिखाई पड़ रही थी। भाजपा और संघ मोदी को लेकर बिल्कुल भी उत्साहित नहीं थे लेकिन मैंने न सिर्फ अपना मंतव्य अखबारों और चैनलों में खुलकर प्रकट किया बल्कि संघ और भाजपा के शीर्ष नेताओं से अनवरत संवाद भी किया।



बाबा रामदेव और मैंने अपनी सभाओं में तत्कालीन सरकार को निकाल फेंकने का प्रचंड शंखनाद भी किया। बाबा रामदेव का तो ऐसा बयान भी आ गया कि यदि भाजपा मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार नहीं बनाएगी तो सारे देश में हम 500 उम्मीदवार खड़े कर देंगे। जिस दिन चुनाव-परिणाम आने थे, विभिन्न टीवी चैनलों पर मैँ अकेला ऐसा व्यक्ति था, जो बार-बार कह रहा था कि मोदी को पौने तीन सौ से तीन सौ सीटें मिलेंगी। हमारा अनुमान सच निकला। मोदी प्रधानमंत्री बन गए। हम से ज्यादा खुश कौन होगा?



लेकिन पिछले एक साल में क्या हुआ? मोदी से लोग निराश हुए। इस निराशा को दूर करने के लिए अब मोदी सरकार 200 बड़ी रैलियां, 200 पत्रकार-परिषद और 5000 जनसभाएं करेगी और सरकारी विभाग बड़े पैमाने पर पोस्टर अभियान और पत्र-पत्रिका अभियान चलाएंगे। किसी सरकार या पार्टी ने अपनी सफाई पेश करने के लिए इतना बड़ा अभियान कभी चलाया हो, मुझे याद नहीं पड़ता। इस तरह का प्रचंड अभियान तो आपातकाल में इंदिरा गांधी ने भी नहीं चलाया था। इस अभियान में चुनाव जितना खर्च तो नहीं होगा लेकिन इसका बजट करोड़ों-अरबों तक जरूर जाएगा। मुख्य प्रश्न यह है कि इस अभियान की जरूरत क्यों पड़ गई?



मुझे लगता है कि जन-संपर्क ही मोदी का प्राणाधार है। जैसा चुनाव-अभियान चला था, वैसा ही प्रचार अभियान पिछले साल से भी चल रहा है। मोदी कहते हैं कि मैं प्रधानमंत्री नहीं, प्रधान सेवक हूं। प्रधान-सेवक वे हैं या नहीं, यह तो पांच साल बाद पता चलेगा लेकिन अभी तो वे प्रधानमंत्री कम, प्रचार मंत्री ज्यादा दिखाई पड़ रहे हैं। वे जीवन भर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे, अब वे भारत संघ (यूनियन ऑफ इंडिया) के प्रचारक हैं।



वे भारत के सर्वश्रेष्ठ और अपूर्व जन-संपर्क अधिकारी हैं। इस मामले में मोदी ने देश के सभी प्रधानमंत्रियों को मात कर दिया है। चुनाव-अभियान के दौरान देसी और विदेशी विशेषज्ञों ने उन्हें जन-संपर्क की जो पट्टी पढ़ाई, उसे वे अब बराबर अमल में ला रहे हैं। उन्होंने जन-संपर्क के इस कौशल को ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया है कि विदेशी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ही नहीं, वहां की सजग पत्रिकाएं भी हमारे प्रधानमंत्री को मुखपृष्ठ पर जगह दे रही है। जिन्होंने उन्हें जन-संपर्क के गुर सिखाए, अब वे उन्हें उनकी कला उनसे बेहतर सिखा सकते हैँ।



गुरु गुड़ रह गए और चेला शक्कर ! दिन में कई बार अपना पहनावा (परिधान) बदलना, हमेशा चकाचक दिखना, विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को उनके पहले नाम से बुलाना, टेली–प्राम्पटर देख-देखकर अंग्रेजी में ऐसे भाषण देना, जैसे कि वे मोदी नहीं, डॉ.राधाकृष्णन हों, युवा लड़के-लड़कियों और नेताओं के साथ ‘सेल्फी’ खींचना- आदि जन-संपर्क के चमत्कारी काम हैं, जो मोदी के अलावा कौन प्रधानमंत्री कर सकता था।



फिलीपीन्स के राष्ट्रपति की पत्नी इमेल्डा मारकोस जब अपने महल से भागीं तो उनके शू केस में से चार हजार जूतियां निकली थीं। हमारे प्रधानमंत्री जी के वार्डरॉब में से अब दस लाख रू का सूट तो नीलाम हो गया है लेकिन चार हजार न सही, कम-से-कम 400 बंडियां तो जरूरी निकलेंगी। नरेंद्र भाई को कुछ लोग‘बंड़ी मास्टर’ कहने लगे हैं और कुछ लोग परिधान मंत्री। परिधान अर्थात् कपड़े। हिंदी के शब्द ‘प्रधान’ को जो लोग हिंदी नहीं जानते, सिर्फ उर्दू या सिर्फ फारसी-अरबी जानते हैँ, ‘पिरधान’ या‘परिधान’ ही बोलते हैँ।



यदि हम मोदी का मुहावरा ही इस्तेमाल करें तो कहेंगे कि वे देश के ‘परिधान सेवक’ हैं। क्या यह सच नहीं है? आजकल भाजपा के कई मुख्यमंत्री और नेतागण एक से एक फूहड़ रंगों की बंडियां पहने रहते हैं। वे समझते हैं कि उनकी बंडी देखकर लोग उन्हें छोटा या मोटा नरेंद्र मोदी मान लेंगे जैसे कि गांधी टोपी लगाकर अन्ना हजारे और उनके अनुयायी उन्हें छोटा-मोटा गांधी मानने लगे थे।



चाहे जो हो, मोदी ने कुर्त्ते-पाजामे और बंडी को जो इज्जत बख्शी है, वह मनमोहन सिंह और राजीव गांधी भी नहीं बख्श सके हैं- लेकिन असली सवाल यह है कि हमेशा फैन्सी ड्रेस प्रतियोगिता का हीरो बने रहना, क्या किसी व्यक्ति को देश का चहेता नेता बना सकता है? ऐसा व्यक्ति एक शानदार अभिनेता तो बन सकता है लेकिन देश के लगभग 100 करोड़ लोग, जिन्हें न्यूनतम रोटी, कपड़ा और मकान भी हासिल नहीं है, वे उसके बारे में क्या सोचेंगे? मोदी कोई साधारण नागरिक होते तो उन पर उंगली उठाने का किसी को कोई अधिकार नहीं होता लेकिन वे प्रधानमंत्री हैं, परिधान मंत्री नहीं।



लोग उनके भाषणों और शब्दों पर जरूर ध्यान देते हैँ, लेकिन कथनी से ज्यादा महत्व करनी का होता है। लोग उनका आचरण देखते हैं तो वे अचंभे में पड़ जाते हैं। यह ठीक है कि मोदी का बाल्यकाल गरीबी में बीता है। वे चाय बेचते थे। अब वे प्रधानमंत्री हैं, यह गर्व की बात है। उनमें असाधारण गुण हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन ऐसा लगता है कि हीनता-ग्रंथि उनका पिंड नहीं छोड़ रही है। इसी का परिणाम है- लाखों रू़ का सूट, चमकदार बंडियां, मंहगे पेन और चश्मे। अब साल भर हो गया। सब शौक पूरे हो लिये।



यह हीनता-ग्रंथि यदि नहीं खुली तो इसके राजनीतिक परिणाम काफी दुखदायी भी हो सकते हैँ। लाखों-करोड़ों की चीजों का इस्तेमाल तो मामूली हीनता है लेकिन मानसिक हीनता बड़े गहरे में नीचे ले जाती है। वह किसी भी ऐसे व्यक्ति को आपके पास नहीं आने देती है, जो किसी भी मामले में आपसे श्रेष्ठ हो। आपके चरित्र का सबसे प्रमुख लक्षण—ईर्ष्या– इतनी सूक्ष्म होती है कि परमाणु भी उसके आगे क्या सूक्ष्म होगा? इसी ईर्ष्या के चलते क्या लालकृष्ण आडवाणी जैसे तपस्वी नेता और डॉ. मुरली मनोहर जोशी जैसे अनुभवी विद्वान को आपने ताक पर नहीं बिठा दिया है,मार्गदर्शक मंडल की ताक पर। ऐसा मंडल जो बिलकुल बंडल बन गया है। मार्गदर्शक मंडल की ताक पर बैठे-बैठे ये नेता मोदी की सवारियों को ताकते रहते हैं।



इसी हीनता-ग्रंथि का परिणाम है कि मोदी के मंत्रिमंडल में कोई भी ऐसा आदमी नहीं है, जो मोदी के बराबर दिखता है। मोदी ने ब्रिटिश संविधान की इस कहावत को उलट दिया है कि“प्रधानमंत्री अपने बराबर के लोगों में प्रथम’ (प्राइमस इन्टरपेयर्स) होता है। जो लोग मोदी से भी ज्यादा अनुभवी हैं और जिनके नाम मोदी से अधिक विख्यात थे, ऐसे दो मंत्री- सुषमा स्वराज और राजनाथ सिंह का क्या हाल है? जिन दो मंत्रियों का बहुत बोलबाला है, वे दोनों लोकसभा का चुनाव बुरी तरह से हारे हुए हैं और उन्होंने अपने जीवन में कभी नगरपालिका का चुनाव भी नहीं जीता है। सभी मंत्री और पार्टी के अधिकारी बेनामी संपत्ति की तरह अदृश्य से दिखाई पड़ते हैं। “सिर्फ मैं और मेरा भाय। बस पीते हैं, चाय।।” नरेंद्र मोदी और अमित शाह! ये ही सरकार है और ये ही पार्टी है। आम कार्यकर्ता शीर्ष नेतृत्व से बिल्कुल कटता जा रहा है। पार्टी की सदस्य संख्या चाहे करोड़ों में हो जाए, उसका महत्व क्या है? जैसे धक्के में वे सदस्य बने हैँ, वैसे ही धक्के में वे बाहर हो जाएंगे।



पार्टी कार्यकर्ताओं की बात तो बहुत दूर है, पार्टी के नेताओं और मंत्रियों का ही ‘हाथीदांत के महल’ तक पहुंचना मुश्किल है। इंदिरा गांधी जैसी महाप्रतापी प्रधानमंत्री,नरसिंहराव जैसा महापंडित प्रधानमंत्री और अटलबिहारी वाजपेयी जैसा विलक्षण व्यक्तित्व का धनी प्रधानमंत्री देश के विशेषज्ञों को आग्रहपूर्वक बुला-बुलाकर सलाह-मश्विरा करता था। इन प्रधानमंत्रियों का जनता से, कार्यकर्ताओं से और अपने नेताओं से सीधा संवाद था, क्योंकि वे हीनता-ग्रंथि से ग्रस्त नहीं थे। वे अचानक मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री नहीं बने थे। उन्होंने लंबे समय तक राजनीति की ऊंच-नीच को भुगता था। साल भर तो हो गया। अब देखना है कि यह हीनता-ग्रंथि कब भंग होती है।



इस हीनता-ग्रंथि ने खबरपालिका को भी नाराज कर रखा है। मोदी का विरोध करना सब पत्रकारों ने अपना धर्म बना लिया था। इसके बावजूद वे जीते तो मरगिल्ले पत्रकारों ने पल्टी खाई और वे ही मोदी के कसीदे काढ़ने लगे लेकिन मोदी चूक गए। उन्हें इसका फायदा उठाना नहीं आया। पत्रकार-जगत से मोदी का संबंध अब भी विरल है। उन्होंने विदेश यात्राओं में तो पत्रकारों को ले जाने की परंपरा भंग कर दी है लेकिन वे कम-से-कम महिने में एक पत्रकार-परिषद तो बुलाते?



हम मनमोहन सिंह को दोष देते हैं कि वे ‘मौनी बाबा’ बने रहे लेकिन मोदी क्या हैं? वे ‘मोनोलॉग बाबा’ हैं। वे अपनी-अपनी ही दलते रहते हैं। देश और दुनिया के साथ मोनोलॉग करते रहते हैँ। बस अकेले बोलते रहते हैं। कोई सवाल-जवाब नहीं। संसद में भी ज्यादातर वे अपना संदेश देने के लिए हाजिर रहते हैँ। उनका इन सब प्रवृतियों को देखते हुए कांग्रेसी उन्हें तानाशाही प्रवृत्ति का व्यक्ति बताने लगते हैं। वे यह भी कह देते हैं कि साल भर में मोदी सरकार की उपलब्धियां शून्य है।


साल भर में मोदी सरकार की उपलब्धियों का जहां तक प्रश्न है, मोदी के मंत्रियों या भाजपा नेताओं पर आज तक एक भी आरोप नहीं लगा है। निराधार आरोप भी नहीं। मोदी के मारे भ्रष्टाचार भी डर गया है लेकिन मोदी से उनके मंत्री और पार्टी के लोग ही डरे हुए हैं। आम भ्रष्टाचारियों पर मोदी का रत्ती भर भी असर नहीं है। क्या पुलिस, क्या सरकारी अधिकारी, क्या चपरासी, क्या रेल का टीटी- सभी धड़ल्ले से रिश्वतखोरी में जुटे हुए हैं। इन्हीं लोगों से आम जनता का पाला पड़ता है।



आम जनता के लोगों को मंत्री या नेता लोग तंग थोड़े ही करते हैं। कोयले में,कॉमनवेल्थ गेम्स में, शस्त्र-खरीद में, बोफर्स में जो मोटा पैसा खाया गया, उससे आम आदमी का क्या लेना-देना? उसके लिए तो वह एक खबर भर है। उन खबरों ने उसके दिल में गुस्सा जरूर पैदा किया लेकिन उसका असली गुस्सा भ्रष्टाचार की दैनंदिन चक्की में पिसते रहने का है। पिछले एक साल में इस मुद्दे पर उपलब्धि निश्चय ही शून्य रही यदि एक-दो रिश्वतखोरों को भी पकड़कर लाल-किले पर लटका दिया जाता तो प्रधानमंत्री को अपने प्रचार पर करोड़ो-अरबों रू. खर्च नहीं करने पड़ते। जनता खुद उनका प्रचार करने लगती।



इसी प्रकार सरकार ने जन-धन योजना, स्वच्छता अभियान आदि कई सराहनीय योजनाएं शुरू की हैं और अर्थ-व्यवस्था भी गोते नहीं खा रही है लेकिन उनकी कोई नाटकीय फलश्रुति नहीं हो रही है। मान लिया कि मोदी सिर्फ एक राजनीतिक नेता हैं। उनके पास कोई नैतिक या आध्यात्मिक शक्ति नहीं है। वे बुनियादी समाज-परिवर्तन नहीं कर सकते। वे जात-पांत नहीं मिटा सकते। वे सांप्रदायिकता समाप्त नहीं कर सकते। वे 125 करोड़ लोगों को सत्यवादी नहीं बना सकते लेकिन वे इस देश के सरकारी कर्मचारियों को तो पटरी पर ला सकते हैं। यदि यह भी नहीं कर सकते तो वे काहे के प्रधानमंत्री हैं?



वे सिर्फ सरकारी कर्मचारियों की रिश्वतखोरी बंद करवा दें। सरकारी दफ्तरों से अंग्रेजी को विदा करवा दें। सारे चुने हुए नेताओं और सरकारी कर्मचारियों के लिए यह अनिवार्य कर दें कि उनके बच्चों की पढ़ाई सिर्फ सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में होगी तथा उन सबका इलाज सिर्फ सरकारी अस्पतालों में होगा। ऐसे कई काम हैं, जो उनके बस के हैँ। लेकिन ये सब काम भी कोई तभी कर सकता है, जबकि उसके पास दृष्टि हो।



दृष्टि का अभाव हमारे प्रधानमंत्रियों की विशेषता रही है। दुनिया के अन्य प्रधानमंत्रिगण भी ज्यादातर ऐसे ही होते हैं। वे तात्कालिक समस्याओं से जूझते रहते हैं। वे नोट और वोट पटाने में इतने डूब जाते हैं कि शासन का काम वे नौकरशाहों के हवाले कर देते हैं। नौकरशाह ज्यों ही हावी होते हैं, नेतागण उनकी नौकरी करने लगते हैं। मोदी से आशा है कि वे इसके अपवाद होंगे लेकिन अपने राजनीतिक अभियानों पर खर्च होने वाले करोड़ों-अरबों रुपए का इंतजाम करने वालों को फायदा देने की मजबूरी किस प्रधानमंत्री की नहीं हो जाती। अच्छा हो कि प्रधानमंत्री अब एक साल पूरा होने पर अपना चुनाव-घोषणा-पत्र सामने रखें या विशेषज्ञों से परामर्श करके कुछ बुनियादी कदम उठाएं ताकि अगले साल की 25 मई इस साल जैसी न हो।