स्वतंत्र पत्रकारिता के जनक व ब्रहमसमाज संस्थापक राज राममोहन राय

  • 2015-05-23 10:10:45.0
  • उगता भारत ब्यूरो
स्वतंत्र पत्रकारिता के जनक व ब्रहमसमाज संस्थापक राज राममोहन राय

मृत्युंजय दीक्षित


भारत में स्वतंत्र पत्रकारिता के जनक व समाजसेवी ब्रहमसमाज के संस्थापक राजाराममोहन राय का जन्म 22 मई सन् 1772 ई में बंगाल के एक धार्मिक ब्राहमण परिवार में हुआ था। राममोहन जी के पूर्वजों ने बंगाल के नवाबों के यहां उच्चपद पर कार्य किया किन्तु उनके अभद्र व्यवहार के कारण पद छोड़ दिया।वे लोग वैष्णव सम्प्रदाय के थे। माता षैवमत की थीं। राममोहन राय बचपन से ही कुषाग्र बुद्धि के थे। आपकी प्रारम्भिक षिक्षा बांग्ला भाषा में हुई । आपके पिता फारसी भाषा के विद्वान थे। अतः फारसी का ज्ञान अपने पिता के माध्यम से प्राप्त किया। साथ ही अरबी व अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान प्राप्त किया। मां के अनुरोध पर संस्कृत सीखी। इस प्रकार लगभग सात प्रकार देषी व विदेषी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया।



बीस वर्ष की आयु में पूरे देष का भ्रमण किया तथा जानकारी व ज्ञान में वृद्धि की। इस प्रकार अध्ययन कार्य पूर्ण करने के पष्चात अपनी योग्यता के बल पर ष्षासकीय जनसेवा के उच्चपइद पर पहुंचे।सन् 1803 में पिता की मृत्यु के पष्चात 12 वर्ष केबाद ही नौकरी से मुक्त हो गये। इसके बाद का ष्षेष जीवन कलकत्ते में ही व्यतीत किया तथा पूरा जीवन समाजसेवा को अर्पित कर दिया। सन 1816 में उनके परिवार में एक अत्यंत पीड़ादायक घटना घटी। बड़ें भाई की मृत्यु हुई अतः भाई की चिता के साथ ही उनकीपत्नी को चिता पर बैठा दिया गया।इस घटना का उनके मन मस्तिष्क पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि 18185 में सती प्रथा के विरोध में प्रथम धार्मिक लेख लिखा। एक प्रकार से भारतीय समाज में आचार- विचार को स्वतंत्रता का श्रीगणेष यहीं से प्रारम्भ हुआ। यहीं से समाज सुधार की प्रवृत्ति प्रारम्भ हुई। सती प्रथा के सम्बंध में यह उनका प्रथम प्रयास था।



स्माज सुधार तथा धर्मसुधार एक दूसरे सें अलग नहीं किये जा सकते तथा एक में सुधार करने करने के लिए दूसरे में सुधार अपेक्षित है। इस बात का सर्वप्रथम प्रतिपादन राजामोहन राय ने किया। उन्होनें समस्त धार्मिक परिषीलन करते हुए कहाकि ईष्वर ही एकमात्र सत्य है और यह ईष्वररूपी सत्य सभी धर्माें का मत है अतः
इसी विचारधारा के प्रचार- प्रसार के लिए ब्रहम समाज की स्थापना की। ब्रहमसाज 1828 में स्थापित हुआ। राजा राममोहन राय ने भारतीय जनमत में परिवर्तन लाने के लिए अंग्रेजी षिक्षा को उपयुक्त एवं आवष्यक बताया। सन्1827 में हिन्दू कालेज की स्थापना हुई जो बाद में प्रेसीडेंसी कालेज के रूप में विख्यात हुआ। सन्1830 में एक अंग्रेज यात्री अलेक्जेण्डा उफकों ने अंग्रेजी स्कूल खोलने मंे सहायता की।



राजाराममोहन राय ऐसे पहले भारतीय थे जिन्होनंे समाचार पत्रों की स्थापना संपादन तथा प्रकाषन का कार्य किया।राय ने अंग्रेजी, बांग्ला तथा उर्दू में अखबार निकाले। राजाराममोहन राय को स्वतंत्र पत्रकारिता का जनक भी कहा गया है। प्रेस की स्वतंत्रता के लिए उन्होनें कठिन संघर्ष किया। राजाराममोहन राय ने धार्मिक एवं सामाजिक विचारों के प्रसार के लिए 20 अगस्त सन् 1828 ईसा में कलकत्ता में ब्रहम समाज की स्थापना की।ब्रहम समाज के सिद्धान्तों में कोई जटिलता नहीं है । प्रमुख सिद्धान्त इस प्रकार हैं-



1 परमात्मा कभी जन्म नहीं लेता। 2 वह सम्पूर्ण गुणों का भंडार है। 3 परमात्मा प्रार्थना सुनता तथा स्वीकार करता है। 4 सभी जाति के मनुष्यों को ईष्वर पूजा का अधिकार प्राप्त है। 5 पूजा मन से होती है । 6 पापकर्म का त्याग करना तथा उसके लिए प्रायष्चित करना मोक्ष का साधन है।7 संसार में सभी धर्म ग्रंथ अधूरे हैं।
ब्रहम समााज की स्थापना से भारतीय सभ्यता में नवप्रभात का आगमन हुआ। इस समाज ने प्रायष्चित को मोक्षप्राप्ति का मार्ग बताया जिसका तात्पर्य यह था कि मनुष्य पाप करने में सहज रूप में प्रवृत्त हो जाता है।अतएव उसे सामाजिक कठोर दंड न देकर उसे फिर से अच्छा जीवन व्यतीत करने का अवसर देना चाहिये। ब्रहमसामज ने एक प्रकार से हिन्दुओं के धार्मिक एवं सामाजिक क्रान्ति का सूत्रपात किया।



राजाराममोहन राय ने नारी समाज के उद्धार के लिये अनेक प्रयास किये। उनके व्यक्तित्व को महत्व देने के लिये उनके सहयोगियों ने सती होने की अमानुषिक प्रथा को कानून से रोकने का आंदोलन प्रारम्भ किया। यह उनके ही प्रयास का परिणाम था कि 1828 में सतीप्रथा को समाप्त करने का कानून बनाया गया। उन्होनें विधवा विवाह का भी समर्थन किया था।उनके व्यक्तित्व दृष्टिकोण एवं विचार पर गहन दृष्टि डालने से यह स्पष्ट हो रहा है कि उनके विचारों पर पाष्चात्य सभ्यता का प्रभाव था। उन्होनें एकेष्वरवाद का प्रसार किया तथा मूर्तिपूजा, बलिप्रथा, भेदभाव, छुआछूत, बहुविवाह एवं सतीप्रथा का विरोध किया। वे सभी संस्कृतियों में समन्वय में विष्वास रखते थे।वे धर्मसहिष्णु थे। अपने जीवन केे अंतिम दिनों में हिन्दुआंे के सामने नया उदाहरण रखते हुये इंग्लैंड गये जहां इन्होनंे भारत के निस्तेज एवं षक्तिहीन बादषाह का प्रतिनिधित्व किया और भारत सरकार में सुधार करने की अनुषंसाओं से युक्त एक प्रतिवेदन किया। सन् 1883 में इंग्लैंड केे ब्रिस्टल नगर में राय की मृत्यु हो गयी।