मुठभेड़ की बजाय मनमेल की राजनीति

  • 2015-05-13 12:34:01.0
  • डॉ0 वेद प्रताप वैदिक
मुठभेड़ की बजाय मनमेल की राजनीति

बांग्लादेश के साथ सीमा-समझौते पर जो विधेयक हमारी संसद में सर्वसम्मति से पारित हुआ है, वह काफी महत्वपूर्ण घटना है, दोनों दृष्टियों से! राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय दृष्टि से भी। राष्ट्रीय दृष्टि से इसलिए कि पिछले साल भर में यह पहली घटना है, जबकि अपने राजनीतिक दलों ने अपने क्षुद्र स्वार्थों को छोड़कर उच्च आशय का परिचय दिया है। इस संविधान संशोधन को पारित करते समय उन्होंने राजनीति नहीं, राष्ट्रनीति का परिचय दिया है। संयोग है कि यह 100 वां संशोधन है।

 

सबसे पहला साधुवाद तो भाजपा को जाएगा, जिसने डेढ़-दो साल पहले इस समझौते को लेकर हंगामा खड़ा कर दिया था। उसकी असम और पं. बंगाल की शाखाओं ने कांग्रेस सरकार की नाक में दम कर दिया था। उन्होंने बांग्लादेश को 10 हजार एकड़ जमीन तोहफे में भेंट करने वाली सरकार कहा था। संसद में भी भाजपा ने इस समझौते का डटकर विरोध किया था। समझौते पर दस्तखत के लिए दोनों देशों की सरकारें तो तैयार थीं लेकिन कई भारतीय पार्टियों के विरोध के कारण प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ढाका से खाली हाथ ही लौट आए।

 

भाजपा सत्ता में आ गई। उसका रवैया बदल गया। यदि वह अपने दुराग्रह पर अड़ी रहती तो उसको कोई उससे डिगा नहीं सकता था। इस मामले में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने महत्वपूर्ण कोशिश निभाई। कांग्रेस को भी हमें शाबासी देनी होगी कि उसने संयम और गरिमा का परिचय दिया। उसकी परोसी थाली अब जबकि भाजपा जीम रही है, उसने कोई अड़गा नहीं लगाया। असम, पं. बंगाल, मेघालय और त्रिपुरा की सरकारें भी सराहना की पात्र हैं। इस समझौते पर हुई सहमति यदि कई मुद्दों पर सहमति का रास्ता खोल सके तो देश का काफी भला होगा। मुठभेड़ की राजनीति मनमेल की राजनीति में बदल सकती है।

अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से यह समझौता भारत के पड़ौसी राष्ट्रों पर गहरा असर डालेगा। भारत ने उदारता का परिचय देकर यह सिद्ध किया है कि वह दक्षिण एशिया का दादा नहीं, भाईजान है। वास्तव में बांग्लादेश को दिए गए 10 हजार एकड़ के प्रकोष्ठों पर आने जाने का रास्ता ही नहीं था। वे केवल कागज पर भारत के थे। इस कारण दोनों तरफ के नागरिकों को बड़ी असुविधा होती थी और सीमांकन में भी मुश्किलें थीं। अब दोनों देशों को काफी सुभीता हो जाएगा। यदि इसी उदार भावना के साथ अन्य पड़ौसी राष्ट्र और भारत एक-दूसरे के साथ पेश आएं तो हमारे दक्षिण एशियाई महासंघ के सपने को साकार होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।