मोदी और भारत की बदनामी

  • 2015-05-01 03:24:44.0
  • डॉ0 वेद प्रताप वैदिक

PM-Modi-19राज्यसभा में सारे विरोधी एक हो गए। क्यों हो गए ? इसलिए कि प्रधानमंत्री ने अपने विदेश दौरे के दौरान जो जन-सभाएँ आयोजित कीं, उसमें उन्होंने देश की आंतरिक राजनीति को भी घसीटा। उन्होंने देश की बदनामी की। उन्होंने प्रधानमंत्री पद की गरिमा घटाई । वे भारत के प्रधानमंत्री नहीं, नरेन्द्र मोदी की तरह बोल रहे थे, उस नरेन्द्र मोदी की तरह जो भाजपा का नेता है या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक है। जो पार्टियाँ और जो नेता एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने और एक-दूसरे की खिचाई करने के लिए कुख्यात हो चुके हैं, वे भी नरेन्द्र मोदी के खिलाफ एकजुट हो चुके हैं । वे मोदी से गरिमा और मर्यादा की मांग कर रहे हैं ।


हम पहले यह देखें कि मोदी ने वहाँ कहा क्या था? मोदी ने विदेशों में रहने वाले प्रवासी भारतीयों की सभा में कहा था कि भारत ‘स्केम इंडिया’ के नाम से जाना जाने लगा था । अब वे उसे ‘स्किल इंडिया’ के नाम से विख्यात करेंगे। विरोधियों का कहना है कि भारत को धान्धलों और धान्धलों को भारत का पर्याय कहना गलत है और यह कहना तो और भी गलत है कि पिछले साठ साल में फैली गंदगी को अब मोदी हटाएँगे। विरोधियों का गुस्सा स्वाभाविक है। उन्हें पूरा अधिकार है कि वे संसद में उसे प्रकट करें। वे विरोधी हैं । विरोध करना उनका कर्त्तव्य है लेकिन यहाँ तीन-चार बातों पर उन्हें अवश्य ध्यान देना चाहिए ।


पहला, मोदी ने ये बातें विदेशियों की सभा में नही कहीं । उनका उद्देश्य भारत को बदनाम करना नही था। उन्होंने ये बातें भारतीयों की सभा में कहीं और हिंदी में कही। विदेशी मीडिया और लोगों तक ये बातें लगभग पहुँची ही नही। दूसरा,  क्या प्रवासी भारतीयों के सामने उन्होंने कोई नया रहस्योद्घाटन किया? क्या उन प्रवासी भारतीयों को हमारे नेताओं के धान्धलों के बारे में सारी बातें पहले से पता नहीं थीं ? वे पहले से बदनाम नहीं होते तो उनकी सीटें इतनी कम क्यों हो गई ? मोदी ने किसकी बदनामी की ? उनकी बदनामी को दोहराया, जिनके कारनामों से भारत बदनाम हुआ था।  तीसरा   जिन सैकड़ों-हजारों प्रवासियों को मोदी साक्षात संबोधित करते हैं, उनके बहाने उसी संबोधन को करोड़ों भारतीय भी टीवी चैनलों पर देखते-सुनते हैं। इसलिए मोदी या मोदी की जगह जो भी होगा, वह आंतरिक मामलों को जरूर उठाएगा। जब श्रोता आंतरिक होंगें तो मामले भी आंतरिक होंगे। चौथा , इस इंटरनेट और टीवी के जमाने में जगह की कैद ख़त्म हो चुकी है । अन्दर- बाहर का फर्क ख़त्म हो गया है। इसलिए यह कहना कि भारत के बाहर जाकर भारत के बारे में कोई क्या बोल रहा है, यह बेमतलब  है।  इन तर्कों के बावजूद मैं यह मानता हूँ कि मोदी को अब चुनाव–अभियान के ‘मोड़’ (मुद्रा) से बाहर निकल आना चाहिए । कहना बहुत हो लिया। अब कुछ करके दिखाना चाहिए।