भारत महाशक्ति कैसे बने ?

  • 2015-04-28 02:05:07.0
  • डॉ0 वेद प्रताप वैदिक

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इक्कीसवीं सदी में भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि भारत सच्चे अर्थों में महाशक्ति कैसे बने ? बीसवीं सदी में कुल पाँच महाशक्तियाँ हुईं| अमेरिका, सोवियत संघ, बि्रटेन, फ्राँस और चीन ! पाँच 'बड़ों' की इस सूची में क्या कोई छठा नाम भी जुड़ेगा ? क्या इक्कीसवीं सदी में भारत छठी महाशक्ति बनेगा ? क्या ये पाँच 'बड़े' उसे अपनी महफिल में बैठने देंगे ? क्या सुरक्षा परिषद्र में भारत को स्थायी सदस्यता मिलेगी?


इन प्रश्नों के जवाब हम बाद में ढूँढेंगे लेकिन पहले हमें इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि मई 1998 के परमाणु विस्फोट ने भारत को वास्तविक महाशक्ति के महापथ का पार्थक बना दिया है| 1947 यदि भारत की पूर्ण स्वाधीनता का वर्ष था तो 1998 भारत की पूर्ण सम्प्रभुता का वर्ष है| परमाणु बम के बिना भारत की सम्प्रभुता अधूरी थी| भारत ने जब अपनी सम्प्रभुता का शंखनाद किया तो सारी दुनिया में हलचल मची| निन्दा और आलोचना के अनेक स्वर उठे लेकिन भारत का कोई बाल भी बाँका नहीं कर सका| सारे भारत-विरोधी अभियान ठप्प हो गए| जिन देशों ने भारत के विरूद्घ सबसे अधिक चिल्लपों मचाई -- अमेरिका और जापान-- उन्हीं के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्र्ी भारत आकर हमारे कानों में मिस्री घोल गए| लेकिन इसके बावजूद दुनिया की पाँच महाशक्तियों में से एक भी ऐसी नहीं है, जो भारत को औपचारिक तौर पर महाशक्ति का दर्जा दिलाने को तैयार हो| औपचारिक दर्जे का मतलब क्या है ? मतलब सीधा-साधा है| भारत को सुरक्षा परिषद्र में स्थायी सीट मिले याने 'वीटो' का अधिकार मिले| परमाणु अप्रसार सन्धि (एन0पी0टी0) और समग्र परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि (सी0टी0बी0टी0) पर भारत हस्ताक्षर करे लेकिन परमाणु शक्ति की हैसियत से करे| उस हैसियत से नहीं, जो मई 1998 के पहले थी| ये दो शर्तें पूरी हो जाएँ तो भारत को औपचारिक तौर पर महाशक्ति का दर्जा अपने आप मिल जाएगा| लेकिन इन दो शर्तों को पाँचों महाशक्तियाँ पूरा क्यों करें ? उन पर ऐसी क्या आन पड़ी है कि वे भारत के सिर पर महाशक्ति का मुकुट धरने के लिए बेताब हो जाएँ ? उनकी ऐसी कौन-सी मजबूरी है कि द्वितीय महायुद्घ के बाद खिंची विश्व-राजनीति की लक्ष्मण-रेखाओं को वे तहस-नहस कर डालें ? और अगर करें तो सिर्फ भारत के लिए ही क्यों ? जर्मनी, जापान, इस्राइल, इण्डोनेशिया, ब्राजील और पाकिस्तान आदि के लिए भी क्यों नहीं ? 21 वीं सदी में कई महाशक्तियाँ उभर सकती हैं| लेकिन भारत के बिना नई सदी की महाशक्तियों का मानचित्र् पूरा ही नहीं हो सकता | महाशक्ति के रूप में भारत का उभरना उतना ही सुनिश्चित है, जितना कि कल सुबह सूर्य का उगना है|


सबसे पहला प्रश्न तो यही है कि महाशक्ति की कसौटी क्या है ? किस राष्ट्र को हम महाशक्ति कहें और किसे नहीं? जैसे शास्त्रें में महापुरूषों के लक्षण बताए जाते हैं, क्या महाशक्तियेां के भी कुछ लक्षण बताए जा सकते हैं ? जरूर बताए जा सकते हैं लेकिन किन्हीं एक-दो लक्षणों के आधार पर किसी राष्ट्र को महाशक्ति कहना कठिन हो जाता है| कभी-कभी सभी लक्षण होने के बावजूद कुछ राष्ट्रों को महाशक्ति का दर्जा नहीं मिल पाता| इसका उल्लेखनीय उदाहरण जर्मनी है| द्वितीय महायुद्घ के बाद विजेता राष्ट्रों ने अपने-अपने माथे पर अपने ही हाथों तिलक लगा लिया| अगर ताइवान, बि्रटेन और फा्रँस को महाशक्ति का दर्जा मिल सकता था, अगर उन्हें सुरक्षा परिषद्र में स्थायी सीट मिल सकती थी तो जर्मनी को क्यों नहीं मिल सकती थी ? सिर्फ इसीलिए न कि वह पराजित राष्ट्र था ? हिटलर अगर जीत गया होता तो दुनिया की शक्ल ही कुछ दूसरी होती | महाशक्तियों में जर्मनी, इटली, जापान और उन राष्ट्रों की गणना होती, जिन्होंने हिटलर का साथ दिया था| उन्हीं राष्ट्रों को सुरक्षा परिषद्र में स्थायी सीटें मिलतीं और जिन्हें हम अभी महाशक्तियाँ कह रहे हैं, उनके पंख कतर दिए जाते| अच्छा हुआ कि ऐसा नहीं हुआ लेकिन जो कुछ हुआ, उसका सबक तो स्पष्ट ही है| सबक यह है कि किसी भी राष्ट्र को महाशक्ति का दर्जा मिलना, इस बात पर भी निर्भर है कि समय के उस दौर में विश्व-राजनीति के सूत्र्धार कौन हैं| कल्पना कीजिए कि द्वितीय महायुद्घ के दौरान अगर भारत स्वतंत्र राष्ट्र होता और वह मित्र राष्ट्रों का सहयोगी होता तो क्या उसे अबसे 55 साल पहले ही महाशक्ति का दर्जा नहीं मिल जाता ? यों भी जब सेनफ्रांसिस्को में संयुक्तराष्ट्र संघ का घोषणा-पत्र् लिखा जा रहा था तब कनाडा, यूगोस्लाविया और आस्ट्रेलिया ने माँग की थी कि भारत को सुरक्षा परिषद्र का स्थायी सदस्य बनाया जाए| सन 1950 के आस-पास यदि भारत अमेरिकी अनुरोध मान लेता तो सुरक्षा परिषद् में चीन की सीट उसे मिल सकती थी| साम्यवादी चीन को नीचा दिखाने के लिए अमेरिका किसी भी हद तक जाने को तैयार था| लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने धैर्य और दूरदर्शिता का परिचय दिया| यदि भारत अमेरिका के झाँसे में आ जाता तो एक तो वह शीत युद्घ के खेमे में फँस जाता और दूसरा जब ताइवान को हटाकर साम्यवादी चीन को, जो कि उस सीट का असली हकदार था, सुरक्षा परिषद्र में बिठाया जाता तो भारत को हटना पड़ता| तब क्या, अब भी भारत को औपचारिक तौर पर महाशक्ति का दर्जा कौन दे रहा है ? उससे कहा जा रहा है कि वह परमाणु अप्रसार संधि याने एन0पी0टी0 और सी0टी0बी0टी0 पर हस्ताक्षर करे ? कोई यह नहीं बताता कि वह परमाणु-शक्ति के तौर पर हस्ताक्षर करे या गैर-परमाणु शक्ति के तौर पर करे ? भारत के पास परमाणु बम है, इसके बावजूद महाशक्ति का दर्जा नहीं हैं | आखिर यह दर्जा मिलता कैसे है ? इसके आधार क्या हैं?


अगर जनसंख्या आधार है तो चीन के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा राष्ट्र है| चीन की जनसंख्या अगर सवा अरब है तो भारत की एक अरब है| छह-छह करोड़ के फा्रँस और बि्रटेन, 15 करोड़ के रूस और 27 करोड़ के अमेरिका को सुरक्षा परिषद् में स्थायी सीट मिल सकती है तो भारत को क्यों नहीं मिल सकती ? इन चारों महाशक्तियों की कुल जनसंख्या 54 करोड़ बनती है जबकि भारत की 100 करोड़ है| यदि जनसंख्या एक मात्र आधार हो तो भारत के बाद 20 करोड़ की जनसंख्यावाले इण्डोनेशिया और 17 करोड़वाले ब्राजील का नम्बर आता है| 12 से 13 करोड़ की श्रेणी में पाकिस्तान, बांग्लादेश, नाइजीरिया, जापान आदि कई देश आ जाते हैं| स्पष्ट है कि महाशक्ति बनने के लिए सिर्फ जनसंख्या ही आधार नहीं हो सकती| और अगर होती तो बि्रटेन और फा्रँस तो अगले सौ वर्ष में भी वह दर्जा नहीं पा सकते | जबकि भारत तो अब से पचास साल पहले ही महाशक्ति बन गया होता| तब न बना, न सही| अब तो वह बनकर रहेगा|


यदि सिर्फ जनसंख्या नहीं तो क्या सिर्फ क्षेत्रफल किसी राष्ट्र को महाशक्ति बना सकता है ? यदि यह सत्य होता तो कनाडा और ब्राजील बहुत पहले ही महाशक्ति बन गए होते| दोनों का क्षेत्र्फल अमेरिका और चीन के बराबर है| उनका क्षेत्र्फल भारत से तीन गुना है और जर्मनी, फ्राँस और बि्रटेन से 20-30 गुना है| यह ठीक है कि बचे-खुचे रूस का क्षेत्र्फल अमेरिका और चीन से लगभग दुगुना है लेकिन उसकी हैसियत आज क्या रह गई है ? जहाँ तक भारत का सवाल है, उसका क्षेत्र्फल फ्राँस से छह गुना, जर्मनी से दस गुना और बि्रटेन से लगभग बारह गुना है| स्पष्ट है कि महाशक्ति का एक मात्र आधार क्षेत्र्फल नहीं हो सकता लेकिन अगर हो तो भारत का दावा फ्राँस, बि्रटेन और जर्मनी और जापान जैसे राष्ट्रों से कहीं अधिक मजबूत ही होगा |


जनसंख्या और क्षेत्र्फल, दोनों को अगर मिलाकर देखें तो भारत वर्तमान चार महाशक्तियों -- अमेरिका, बि्रटेन, फ्रँास और रूस -- से आगे हैं| इस मामले में वह सिर्फ चीन से पीछे है लेकिन 21 वीं सदी में लोकतंत्र् को भी मानदण्ड बना लिया जाए तो इन तीन संयुक्त आधारों पर महाशक्ति पद के लिए भारत का नम्बर सर्वप्रथम हो जाएगा| इसके अलावा भारत की प्राचीन संस्कृति, वर्तमान समाज-व्यवस्था और आर्थिक स्थिरता भी उसकी टोपी में टँके हुए सुनहरे पंखों की तरह है|


जनसंख्या और क्षेत्र्फल की दृष्टि से तो भारत महाशक्ति है ही, वह सैन्य-शक्ति की दृष्टि से भी काफी आगे है| निश्चय ही जनसंख्या और क्षेत्र्फल के मुकाबले सैन्य शक्ति का पलड़ा भारी होता है| यदि कोई राष्ट्र छोटा हो और उसकी जनसंख्या भी कम हो लेकिन उसकी सैन्य-शक्ति प्रचण्ड हो तो भी वह महाशक्ति बन सकता है| हाथी और ऊँट विशालकाय होते हैं लेकिन जंगल का राजा तो शेर ही होता है| यह संयोग की बात है कि भारत में हाथी और शेर, दोनों के ही गुण हैं| दुनिया की सारी फौजों में भारत का स्थान तीसरा है| सिर्फ जवानों की संख्या की बात हो तो चीन का पहला, अमेरिका का दूसरा और भारत का तीसरा स्थान है| चीन की सेना लगभग 24 लाख है, अमेरिका की 13 लाख है और भारत की 12 लाख ! रूस की 10 लाख, फ्रांस और जर्मनी की लगभग तीन लाख और बि्रटेन की दो लाख है| भारत से पहले चीन और अमेरिका का स्थान है| इन देशों के मुकाबले भारत मंे जवानों की संख्या कम है लेकिन यहाँ न तो फौजी भर्ती में किसी प्रकार की जोर-जबर्दस्ती होती है और न ही नागरिक समाज का फौजीकरण हुआ है| अन्य राष्ट्रों के मुकाबले भारत का प्रति-व्यक्ति फौजी खर्च भी काफी कम है| अमेरिका का फौजी बजट 270 अरब डॉलर का है, फ्राँस, जर्मनी और बि्रटेन का लगभग 30 अरब डॉलर है और चीन का 12 अरब डॉलर है| जबकि भारत का केवल 10 अरब डॉलर है| इतने कम खर्च के बावजूद भारत की फौज अपने युद्घ-कौशल और साहस का सिक्का सारी दुनिया में जमा चुकी है| पड़ौसी देशों द्वारा थोपे गए पाँच युद्घ लड़ने के साथ-साथ भारत की फौजों ने बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव आदि देशों में चमत्कारी कारनामे कर दिखाए हैं| संयुक्तराष्ट्र संघ के तत्वावधान में भारत की फौजें दुनिया के लगभग 20 देशों में तैनात की गई हैं| दुनिया के किसी भी देश की फौज इतनी ऊँचाइयों पर कभी नहीं लड़ीं, जितनी पर भारतीय फौजें लड़ी हैं| इसमें शक नहीं कि ताज़ातरीन शस्त्रस्त्रें के लिए भारत को अब भी रूस, बि्रटेन, फ्राँस, और जर्मनी जैसे देशों पर निर्भर रहना प़ड़ता है लेकिन चीन के अलावा तीसरी दुनिया का कौन-सा ऐसा देश है, जो भारत की तरह बन्दूकें, तोपें, टैंक, हवाई जहाज, प्रक्षेपास्त्र्, उपग्रह आदि बना रहा हो ? इस समय दुनिया के दर्जनों देशों को भारत अपना सैनिक साजो-सामान बेचता है| लगभग 60 देशों के सैनिक भारतीय सैन्य-प्रशिक्षण से लाभान्वित होते हैं| दुनिया की सबसे लम्बी समुद्री-सीमाओं वाले देशों में भारत अग्रगण्य है| हिन्द महासागर का लगभग 20 लाख वर्ग कि0मी0 का क्षेत्र् भारत का 'अनन्य आर्थिक क्षेत्र्' (ई ई जे़ड) माना गया है| दक्षिण एशिया में भारत लगभग उसी तरह शक्तिशाली राष्ट्र की तरह देखा जाता है, जिस तरह पिछली सदी में लातीनी अमेरिका में संयुक्तराष्ट्र अमेरिका को देखा जाता था| यह ठीक है कि भारत को पाकिस्तान सैन्य चुनौती देता रहता है लेकिन 21 वीं सदी के पहले दो-ढाई दशकों में भारत सैनिक दृष्टि से इतना मजबूत हो जाएगा और पाकिस्तान आर्थिक-राजनीतिक दृष्टि से इतना कमजोर पड़ जाएगा कि परमाणु शक्ति होने के बावजूद वह भारत के लिए उसी तरह की कोई चुनौती नहीं रह जाएगा, जैसे कि अमेरिका के लिए अब रूस नहीं रह गया है| यदि अगले कुछ वर्षों में अफगानिस्तान में शान्ति स्थापित हो गई तो पाकिस्तान चाहेगा कि वह मध्य एशिया और भारत के बीच समृद्घि का सेतु बने और अपनी उद्दण्ड सैन्य-राजनीतिक भूमिका पर पुनर्विचार करे| इस बदले हुए सैन्य परिदृश्य में भारत को महाशक्ति के तौर पर उभरने से कौन रोक सकता है ?


यों भी पाकिस्तान और इस्राइल जैसे राष्ट्रों को महाशक्ति मानने को कौन तैयार होगा ? जनसंख्या और क्षेत्र्फल के हिसाब से तो ये राष्ट्र छोटे हैं ही, अपने कारनामों से भी इन राष्ट्रों ने अपना कद छोटा कर लिया है| इसमें शक नहीं कि इन दोनों राष्ट्रों के पास असाधारण सैन्य शक्ति है लेकिन वह क्षेत्र्ीय दृष्टि से ही असाधारण है, वैश्विक दृष्टि से नहीं| पाकिस्तान का परमाणु शक्ति सम्पन्न होना भी वैसा नहीं है, जैसा कि भारत का है| पाकिस्तान की परमाणु शक्ति उधार की है, चोरी की है, नकल की है| उसके पीछे चीन और कोरिया है और ए0क्यू0 खान के यूरोप से चुराए हुए फार्मूले हैं|



पाकिस्तान के बम गमले के फूल की तरह हैं| पाकिस्तान के पास विज्ञान का वैसा अधिष्ठान नहीं है, जैसा किसी सच्चे परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र के पास होता है या भारत के पास है| इसके अलावा पाकिस्तान अगर मुस्लिम राष्ट्र होने के नाते महाशक्ति बनने का सपना देखेगा तो इस आधार पर इण्डोनेशिया और सउदी अरब का दावा अधिकर वजनदार होगा| इसका मतलब यह नहीं कि सुरक्षा परिषद्र की स्थायी सीटों मंे सिर्फ एक सीट की बढ़ोतरी हो जाए और भारत उस पर कब्जा कर ले| यह न तो सम्भव है और न ही उचित ! जरूरत इस बात की है कि सम्पूर्ण संयुक्तराष्ट्र संघ के मूलभूत ढांचे की पुनर्रचना हो और इस नए ढांचे को द्वितीय महायुद्घ की बन्दर-बांट से मुक्त किया जाए| वैसा होने पर सुरक्षा परिषद्र की स्थायी सदस्यता के लिए सभी महाद्वीपों से सुयोग्य राष्ट्रों को चुना जा सकेगा| उस स्थिति में भारत की उपेक्षा करने का साहस कौन करेगा ?


इसमें सन्देह नहीं कि भारत को महाशक्ति बनने से कोई रोक नहीं सकता लेकिन महाशक्ति का मार्ग कोई गुलाब की पंखुडि़यों से पटा हुआ नहीं है| अगर उस पर कुछ पंखुडि़याँ बिछी हुई हैं तो जगह-जगह उस पर कुछ काँटे भी उगे हुए हैं| महाशक्ति का दर्जा उसे कोई तश्तरी में रखकर पेश करनेवाला नहीं है| जैसा कि मैंने उपर लिखा है, यदि किसी विश्व-युद्घ में भारत विजेता-राष्ट्रों का साथी होता तो वह कभी का महाशक्ति बन गया होता| उसे सेंत-मेत में ही महाशक्ति का दर्जा मिल गया होता| अब किसी विश्व-युद्घ की सम्भावना नहीं है और ऐसे विश्व-युद्घ की सम्भावना तो बिल्कुल नहीं है, जिसमें सारी दुनिया दो खेमों में बँट जाए| अगर दुर्भाग्य से कोई विश्व-युद्घ छिड़ गया तो असली समस्या तो यह होगी कि क्या कोई राष्ट्र जिन्दा भी बचेगा ? दूसरे शब्दों में भारत को महाशक्ति का दर्जा युद्घ की मलाई के तौर पर मिलना असम्भव ही है|


आज की दुनिया में लड़ाई के मोर्चे बदल गए हैं| युद्ध के मैदानों का स्थान संयुक्तराष्ट्र संघ और दुनिया के बाज़ारों ने ले लिया है| संयुक्तराष्ट्र के आचरण को जो प्रभावित या नियामित (नियामित) कर सके तथा विभिन्न राष्ट्रों के बाजारों पर जो छा सके, उसे दुनिया अपने आप महाशक्ति मान सकती है| जाहिर है कि ये दोनों काम करने की क्षमता अभी भारत में नहीं है लेकिन मान लीजिए कि भारत यदि अमेरिका का हमजोली बन जाए और दुनिया के हर मोर्चे पर अमेरिका भारत की वकालत करे तो हो सकता है कि बिना माँगे ही भारत को महाशक्ति का दर्जा मिल जाए| अमेरिका महाशक्ति नहीं है, महत्तम शक्ति (सुपर पॉवर) है और विश्व की एक मात्र् महत्तम शक्ति है| ऐसी एक मात्र् महत्तम शक्ति दुनिया में पहले कभी नहीं रही| ऐसे में अमेरिका का कृपा-पात्र् बनकर महाशक्ति का दर्जा पा जाना भारत के लिए बहुत कठिन नहीं है| लेकिन क्या यही भारत का भवितव्य है ? क्या भीख में मिला ताज़ पहनने से कोई महाराजा बन सकता है?


भारत की जनसंख्या, उसका क्षेत्र्फल, उसके परमाणु बम, पारम्परिक सैन्य-बल-- ये सब वे लक्षण हैं, जो उसके महाशक्ति बनने का मार्ग प्रशस्त करते हैं लेकिन क्या यह मोर का नाच नहीं है ? मोर के पंख जितने सुन्दर होते हैं, पाँव उतने ही मैले ! नाचता हुआ मोर जितना मनोहारी होता है, जितने सौन्दर्य की सृष्टि करता है, जितने वेग का प्रतिनिधित्व करता है, उसके पाँव उतनी ही जुगुप्सा पैदा करते हैंं| यदि भारत को आज महाशक्ति का दर्जा किसी तरह मिल भी जाए तो उस दर्जे की कीमत क्या है ? भारत के महाशक्ति बनने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा पाकिस्तान है| पाकिस्तान के खतरे के कारण भारत को अपनी सुरक्षा पर अरबों रूपया खर्च करना पड़ता है| यदि दोनों देशों के सम्बन्ध मधुर हो जाएँ तो भारत की विकास-दर दुगुनी हो सकती है और सवा अरब की जनसंख्यावाला सम्पूर्ण दक्षिण एशिया चीन से भी बड़ा बाजार बन सकता है| एक इकाई के तौर पर दक्षिण एशिया दुनिया के सबसे अधिक शक्तिशाली ध्रुवों में से एक हो सकता है| यदि भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर एक मात्र् काँटा है तो उसे उखाड़ने में भारत को एड़ी-चोटी का जोर लगा देना चाहिए| किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहना चाहिए| दुनिया की महाशक्ति बनने के पहले उसे दक्षिण एशिया की एकछत्र् महत्तम शक्ति (सुपर पॉवर) बनना होगा| जिसे मोहल्ले के लोग बड़ा भाई न मानें, उसे शहर के लोग दादा कैसे कहेंगे ? भारत को महाशक्ति का दर्जा दूसरे नहीं देंगे, उसे खुद हासिल करना होगा|


भारत को दुनिया महाशक्ति कहे और उसकी सन्तानें फीजी में गुण्डों के हाथों पिटती रहें, आतंकवादी उसके जहाज का अपहरण कर उसे ब्लेकमेल करें, जब चाहे तब पाकिस्तान उस पर हमला कर दे, उसके चालीस करोड़ लोग निरक्षर हों, उसके पैंतीस करोड़ लोगों को दो जून पेट भर खाना नसीब न होता हो, प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय सम्पदा के हिसाब से दुनिया के राष्ट्रों में उसका स्थान 153 वाँ हो तो क्या सचमुच भारत को महाशक्ति माना जा सकता है? सच्ची महाशक्ति बनने के लिए किसी भी देश के पास बाहरी लक्षण तो होने ही चाहिए, जो कुछ हद तक भारत के पास हैं ही लेकिन अन्दरूनी लक्षणों के बिना वास्तविक महाशक्ति बनना किसी भी देश के लिए असम्भव है|


ये अन्दरूनी लक्षण क्या हैं ? ये हैं -- प्रति व्यक्ति आय, प्रति व्यक्ति रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा आदि क्षेत्रें में जनता की समृद्घि ! जिस देश की जनता कंगाल हो, वह राष्ट्र कभी शक्तिशाली नहीं बन सकता| किसी महत्तम शक्ति के साथ गठबन्धन करके शक्ति अर्जित कर लेना आसान है, व्यापार या विदेशी सहायता के जरिए किसी देश के शासक-वर्ग का मालामाल हो जाना भी कठिन नहीं है, और अपनी फौजी मांसपेशियों को फुलाते रहकर कद्दावर बन जाना भी सम्भव है लेकिन यह शक्ति और समृद्घि न तो लम्बे समय तक टिक पाती है, न ही किसी संकट को झेलने में समर्थ होती है और न ही देश के नागरिकों को सामान्य जीवन जीने देती है| उक्त तीनों प्रवृत्तियों के तीन उदाहरण हमारे सामने हैं| पाकिस्तान, अरब राष्ट्र और सोवियत संघ ! क्या भारत का कल्याण एक नकली महाशक्ति बनने में है ? क्या पाशविक शक्ति, क्या भौतिक शक्ति, क्या सैन्य-शक्ति, क्या भंयकर शक्ति बनना ही भारत का भवितव्य है? भारत को भंयकर शक्ति नहीं, पि्रयंकर शक्ति, सुखंकर शक्ति बनना है| इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए जरूरी है कि भारत की आम जनता खुशहाल हो, आम आदमी बलवान हो, साधारण आदमी आत्म-निर्भर हो| ऐसे नागरिकों से बना राष्ट्र शक्तिशाली तो होगा ही, उसमें भयभीत करने की शक्ति भी होगी लेकिन वह मूलत: कल्याणकारी होगा, अपने नागरिकों के लिए, अपने पड़ौसियों के लिए और सम्पूर्ण विश्व के लिए| ऐसी महाशक्तियाँ मिलकर ही विश्व-शांति, निरस्त्र्ीकरण और नई अर्थ-व्यवस्थावाले समाज का निर्माण कर सकती हैं|


ज़रा हम देखें कि आम आदमी के हिसाब से भारत कहाँ खड़ा है ? भारत महाशक्ति बनना चाहता है लेकिन अन्य महाशक्तियों की तुलना में उसके यहाँ गरीबी का क्या हाल है ? अमेरिका, बि्रटेन, फ्रँास और जर्मनी में एक भी आदमी गरीबी की रेखा के नीचे नहीं है| चीन में मुश्किल से चार-पाँच करोड़ लोग गरीब हैं लेकिन भारत में 35 करोड़ ऐसे हैं जिन्हें रोटी, कपड़ा, मकान, दवा जैसी आवश्यक चीज़ें भी उपलब्ध नहीं हैं| जापान ही नहीं, यूरोप के छोटे-छोटे देशों में भी ऐसे लोग खोजने मुश्किल हैं, जिन्हें पेट भर रोटी नहीं मिलती| इसी प्रकार इन देेशों में एक भी निरक्षर आदमी खोजना असम्भव है जबकि भारत के 40 करोड़ निरक्षरों और लगभग 25 करोड़ अल्प-शिक्षितों को लेकर दर्जनों बौने देश बसाए जा सकते हैं| पश्चिमी देशों में हर दूसरे आदमी के पास फोन है याने हर घर में फोन है जबकि भारत में सौ में से सिर्फ दो के पास फोन है| महाशक्ति राष्ट्रों में हर चौथा-पाँचवा नागरिक अखबार खरीदता है जबकि भारत में 100 में से मुश्किल से पाँच-छह आदमी अखबार खरीद पाते हैं| सकल राष्ट्रीय उत्पाद की दृष्टि से भारत के मुकाबले अमेरिका लगभग बीस गुना, जापान दस गुना, जर्मनी पाँच गुना, फ्राँस और बि्रटेन तिगुने तथा चीन और ब्राजील दुगुने समृद्घ हैं| जिनीवा के 'वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम' ने दुनिया की जिन 49 प्रमुख अर्थ-व्यवस्थाओं का सर्वेक्षण किया है, उनमें भारत का स्थान 45 वाँ है| इस फोरम ने विभिन्न अर्थ-व्यवस्थाओं के मूल्यांकन के लिए जो आठ मानदण्ड बनाए हैं, उनमें भारत का स्थान काफी नीचे है लेकिन निराशा के इन बादलों में आशा की किरण यह है कि आर्थिक विकास के हिसाब से दुनिया में भारत का स्थान ग्यारहवाँ है| याने सिर्फ दस देश ही ऐसे हैं, जो उससे आगे दौड़ रहे हैं| इस समय वह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा बाजार है| कोई आश्चर्य नहीं कि अगले 10 वर्षों में भारत पैंतालीसवें स्थान से कूदकर चौथे स्थान पर पहुँच जाए| यदि आर्थिक दृष्टि से भारत सक्षम हो जाए तो अन्य दृष्टियों से तो वह पहले ही महाशक्ति बना हुआ है|


भारत चाहे तो अगले एक दशक में उस स्तर के निकट पहुँच सकता है जो आज दुनिया के सम्पन्न राष्ट्रों का है| उसकी विकास दर 10 प्रतिशत से भी अधिक हो सकती है| उसकी जनता परिश्रमी और प्रतिभाशाली है| भारत की प्रतिभा के प्रकाश से अमेरिका का सूचना-संसार जगमगा रहा है| भारत की शासन-व्यवस्था जनता के प्रति उत्तरदायी है| उसका विकेन्द्रीकरण और उदारीकरण भी धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है| भारत की राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता तीसरी दुनिया के देशों के लिए उत्तम उदाहरण है| तीसरी दुनिया के अनेक देशों की तरह भारत में फौजी क्रान्तियाँ या खूनी तख्ता-पलट नहीं होते और न ही यहाँ की अर्थ-व्यवस्था अचानक चंग पर चढ़ती है और फिर औंधे मुँह खाई में गिरती है| राष्ट्रों की पंचायत के बीच वह गरिमा और मर्यादा की प्रतिमूर्ति बन गया है| अमेरिका उसे दुनिया के लोकतांत्र्िक राष्ट्रों का नेता मानने को तैयार है| शीतयुद्घ के दौरान भारत गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों का सर्वमान्य नेता रह ही चुका है| सुरक्षा परिषद्र को यदि तीसरी दुनिया से सिर्फ एक ही राष्ट्र चुनना हो तो भारत के अलावा वह राष्ट्र कौनसा हो सकता है ? भारतीय समाज ने पिछली आधी सदी में अपने तनावों और दबावों को कुछ इस तरह समायोजित किया है कि वह न केवल राष्ट्र-राज्य के तौर पर अक्षुण्ण रहा है बल्कि गोवा और सिक्किम जैसे भूभाग उसके क्षेत्र्फल में जुड़े भी हैं| भारत सूचना-संसार की महत्तम शक्तियों (सुपर पॉवर) में गिना जाने लगा है| भारत को महाशक्ति का औपचारिक दर्जा कोई दे या न दे, वह अपने लक्ष्य की तरफ निरन्तर बढ़ता जा रहा है| जैसे आज भारत ने सूचना-महत्तम शक्ति का दर्जा स्वत: हासिल कर लिया है, वैसे ही वह आध्यात्मिक और नैतिक महत्तम शक्ति भी बनता जा रहा है| साम्यवाद की विफलता और पूँजीवाद के अन्तर्विरोध विश्व को विवश करेंगे कि वह वैकल्पिक विचारधारा, वैकल्पिक जीवन-पद्घति और वैकल्पिक मूल्यमानों की खोज करे| इस खोज का अन्त भारत में नहीं होगा तो कहाँ होगा ?


महाशक्ति बनना भारत के भाग्य में लिखा है लेकिन यह लक्ष्य जितना काम्य है, उतना ही कठिन भी है| महाशक्ति-पथ पर चलते हुए उसे सबसे पहले खुद के बारे में सोचना होगा| वह स्वयं क्या है ? उसका गन्तव्य क्या है ? उसका भवितव्य क्या है ? उसकी अस्मिता क्या है ? क्या उसका इतिहास केवल 54 वर्ष का है ? उसकी जड़ें हजारों साल गहरी हैं या नहीं हैं ? क्या वह केवल वही है जो 15 अगस्त 1947 को था या वह है, जो (हिन्दुकुश के पार) वक्षु सरिता से (इंडोनेशिया के निकट) मलक्का की जल-संधि तक फैला हुआ है ? क्या अंग्रेज द्वारा खींची गई लकीरों के बीच का इलाका ही भारत है या वह इलाका भारत है, जो हजारों वर्षों से अनेक जातियों, अनेक मज़हबों, अनेक राजवंशों, अनेक भाषाओं और अनेक लोक-परम्पराओं की लहरों से आलोडि़त जन-समुद्र है और एक ऐसा जन-समुद्र, जिसे राष्ट्र-राज्य की क्यारियों में नहीं बाँधा जा सकता, जो राष्ट्र-राज्य की संकीर्ण सीमाओं के परे है| लेकिन जो मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और आग्नेय एशिया से अलग है| उसकी अपनी एक अलग पहचान है| उसे दक्षिण एशिया कहें, भारतीय प्राय:द्वीप कहें, भारतीय उप-महाद्वीप कहें, बृहद्र भारत कहें, भारत-राष्ट्र कहें, भरतखंड कहें, या राष्ट्रों का भारत-समुच्चय कहें| उसे कुछ भी कहें, वह एक राष्ट्र-राज्य नहीं है, वह अनेक राष्ट्र-राज्यों का समागम है| वह 'बहुराज्यीय राष्ट्र' (मल्टीस्टेट नेशन) है| वह भारत, 1947 का अंग्रेजी भारत नहीं, हजारों वर्षों से चली आ रही सनातन सत्ता का मूर्त्तिमन्त भारत है| हम कौन से भारत को महाशक्ति बनाना चाहते हैं ? क्या 1947 वाले कटे-पिटे भारत को या शताब्दियों से चले आ रहे सनातन भारत को ? इक्कीसवीं सदी की दृष्टि संकीर्ण नहीं हो सकती| उसे विस्तीर्ण होना होगा| सनातन भारत को महाशक्ति बनाना सरल भी है और अल्पसमय-साध्य भी है|


सनातन भारत का अर्थ है, सम्पूर्ण दक्षिण एशिया याने भारत के साथ-साथ अफगानिस्तान, पाकिस्तान, तिब्बत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव तथा सम्पूर्ण हिन्दमहासागर क्षेत्र् ! यदि इस सम्पूर्ण क्षेत्र् को एक इकाई माना जाए, एक परिवार माना जाए, भारत माता की विविध सन्तानें माना जाए तो विदेश नीति का सम्पूर्ण परिदृश्य ही बदल जाएगा| अगर सभी पड़ौसी राष्ट्रों की दृष्टि यही हो तो दक्षिण एशिया का वातावरण क्या वही रहेगा, जो पिछले पचास साल में रहा है ? तनाव, गलतफहमियाँ, छोटे-मोटे झगड़े, मतभेद, मन-मुटाव तो रहेंगे, पड़ौसी राष्ट्रों के बीच लेकिन उन्हें उसी तरह सुलझाया जाएगा, जैसे सभी मामलों को किसी संयुक्त परिवार में निपटाया जाता है| अपने झगड़े सुलझाने के लिए न तो किसी बाहरी शक्ति के हस्तक्षेप की जरूरत होगी और न ही बात-बात में युद्घों के नगाड़े बजेंगे| दक्षिण एशिया के सभी राष्ट्र-राज्यों की बनावट और बुनावट कुछ इस तरह की है कि उनमें एक-दूसरे के धर्मों, भाषाओं, परम्पराओं, नदियों, पर्वतों और यहाँ तक कि लोगों का भी समावेश है| राज्यों के बीच लोहे की दीवारें हैं लेकिन लोगों की बीच झीना पर्दा भी नहीं है| सूचना-क्रांति ने दक्षिण एशिया के इन सवा-अरब लोगों को एक-दूसरे के इतने निकट ला दिया है कि इन देशों के नेताओं और अभिनेताओं, साहित्यकारों और कलाकारों तथा तीर्थों और सैरगाहों को एक-दूसरे से अलग करना मुश्किल हो जाता है| सभी देशों की भाषाएँ अलग-अलग होने के बावजूद आज भी संवेदना की जैसी मूलभूत एकात्मता दक्षिण एशिया में दिखाई देती है, वैसी क्या यूरोप और आग्नेय एशिया में है ? यदि इन दोनों क्षेत्रें में साझा बाजार, मुक्त-यात्र, युद्धविहीन विदेश नीति और संयुक्त विकास नीति चल सकती है तो दक्षिण एशिया में क्यों नहीं चल सकती ? दक्षेस तो दौड़ सकता है और ई0ई0सी0 तथा एसियान से भी आगे निकल सकता है ! इस मामले में सबसे बड़ी जिम्मेदारी भारत की है| दक्षिण एशिया में जो स्थान भारत का है, दुनिया के किसी भी क्षेत्र् में किसी अन्य राष्ट्र का नहीं है| क्या भारत के समान दुनिया में कोई ऐसा राष्ट्र भी है, जो अपने सभी पड़ौसी राष्ट्रों के योग से भी कई गुना बड़ा हो| भारत के सभी पड़ौसियों की जनसंख्या को आपस में जोड़ लें तो भी अकेले भारत की जनसंख्या उन सबसे लगभग चार गुना है| यही बात, कमोबेश, उसकी अर्थ-शक्ति, सैन्य-शक्ति, क्षेत्र्-विस्तार आदि की दृष्टि से भी सही है| भारत और दक्षिण एशिया के सम्बन्धों में एक अन्य विलक्षणता भी है, जो शायद दुनिया के किसी अन्य क्षेत्र् में नहीं है| वह यह है कि इतिहास में दक्षिण एशिया के सभी राज्य या तो कभी भारत के हिस्से रहे हैं या भारत उनका हिस्सा रहा है| दूसरे शब्दों में वर्तमान भारत और उसके पड़ौसी राष्ट्रों के बीच नाभि-नाल सम्बन्ध रहा है| उन्हें अलग हटाकर भारत क्या है, यह समझना कठिन है| इसी प्रकार भारत को अलग हटाकर वे क्या हैं, यह समझना असम्भव है| ऐसी स्थिति में इक्कीसवीं सदी के इन प्रारम्भिक दशकों में भारत का ध्यान सबसे पहले अपने पड़ौसी राष्ट्रों पर केन्दि्रत होना चाहिए| अपने साथ-साथ उन्हें भी समृद्घ और सुरक्षित बनाना भारत का धर्म है|


इस धर्म का पालन आसान नहीं है| बहुत कठिन है| हर पड़ौसी राष्ट्र में कुछ ऐसे प्रभावशाली तत्व सकि्रय हैं, जिनका एक ही काम है - भारत का विरोध करना| वे हर अच्छी और बुरी घटना में भारत का हाथ खोजते हैं| नेपाल के राज-परिवार की हत्या हो, कराची का बम-विस्फोट हो, भूटान में नरेश-विरोधी आन्दोलन हो, बांग्लादेश की किसी नदी में बाढ़ ही आ जाए और चाहे म्यांमार में सू ची की लहर ही उठ रही हो, सर्वत्र् भारत का हाथ दिखाई देने लगता है| उनके बयान और कारस्तानियाँ इतनी उत्तेजक होती हैं कि कोई भी शासक या तो जवाबी कार्रवाई करना चाहेगा या सर्वथा विमुख हो जाएगा| इस स्थायी बाधा के बावजूद भारत को अपना धैर्य नहीं खोना है| पड़ौसी राष्ट्रों को अधिक से अधिक सहायता देनी है, उनके प्रति वही ममता का भाव रखना है जो अपने राज्यों के प्रति होता है| बस इतना ध्यान रखना है कि उनकी सम्प्रभुता और सम्मान को कहीं आँच नहीं आए| इस ममता और उदारता के भाव के बावजूद भारत यह नहीं भूल सकता कि वह क्षेत्र्ीय महाशक्ति है| यदि पड़ौसी राष्ट्रों में कोई जबर्दस्त हलचल मचती है, हिंसा, अव्यवस्था और अस्थिरता फैलती है या बाहरी हमला या हस्तक्षेप होता है तो भारत अपनी आँखें मूँदकर बैठ नहीं सकता| ऐसे में भारतीय हस्तक्षेप विदेश नीति का अपरिहार्य आयाम बन जाता है| वह हस्तक्षेप कश्मीर के महाराजा या हैदराबाद की जनता, नेपाल-नरेश या लंकाई प्रधानमंत्र्ी, पूर्वी पाकिस्तान की जनता या मालदीव के नेता µ किसी के भी आह्रवान पर किया जाए, आवश्यक हो जाता है| अब तक भारत ने हस्तक्षेप तो कई किए हैं, लेकिन उनके पीछे कोई सिद्घांत नहीं रहा है| कोई पूर्व-तैयारी नहीं रही है| इसीलिए फीजी जैसे संकटों में भारत जुबान पर ताला डाले और हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा| अब जरूरी है कि भारत शीघ्रातिशीघ्र हस्तक्षेप-सिद्घान्त का निर्माण करे| कोई आवश्यक नहीं कि वह अमेरिका के 'मुनरो सिद्घांन्त' या ब्रेझनेव के 'सीमित सम्प्रभुता' या 'एशियाई सुरक्षा सिद्घान्त' की कार्बन कॉपी हो| भारत अपनी अनिवार्यताओं और आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही अपना सिद्घांत बनाएगा| इस तरह के सिद्घान्त के बिना कोई राष्ट्र क्षेत्र्ीय महाशक्ति का दायित्व कैसे निभा सकता है ? अफगानिस्तान की अराजकता, पाकिस्तान की अस्थिरता, नेपाल की मधेशियाई गुत्थी, श्रीलंका की सिंहल-तमिल भिड़ंत, म्यांमार में लोकतन्त्र् की लहर आदि कुछ ऐसे प्रपंच हैं, जो कभी भी भूचाल का रूप धारण कर सकते हैं| जैसे खतरे मे