‘आप’ में सिर्फ अहंकारों का द्वंद

  • 2015-03-30 03:22:05.0
  • डॉ0 वेद प्रताप वैदिक
‘आप’ में सिर्फ अहंकारों का द्वंद

स्वतंत्र भारत में कई राजनीतिक पार्टियां पैदा हुईं और उनमें टूट भी हुई, लेकिन आम आदमी पार्टी इस कगार पर इतनी जल्दी पहुंच जाएगी इसकी आशंका किसी को भी नहीं थी। उनको भी नहीं, जो इस पार्टी को सिर्फ नौसिखियों की नौटंकी समझ रहे थे। दिल्ली की प्रचंड विजय के बाद तो ऐसा लगने लगा था कि यदि ‘आप’ ठीक से काम करती रही तो वह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विकल्प बनकर उभर सकती है और अरविंद केजरीवाल तो नरेंद्र मोदी के विकल्प दिखने लग ही गए थे। किंतु सिर मुंडाते ही ओले पड़ने लगे। अभी दिल्ली राज्य में सरकार बने दो माह भी नहीं बीते हैं कि पार्टी के दो बड़े स्तंभ ढह गए। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव! इन दोनों को पार्टी की राजनीतिक समिति से निकाल दिया गया है और अब तैयारी ऐसी है कि उन्हें कार्यसमिति और राष्ट्रीय समिति से भी निकाल दिया जाए।


पार्टी की कार्यसमिति, जिसमें 21 सदस्य होते हैं और राष्ट्रीय समिति जिसमें 320 सदस्य होते हैं,यदि इनमें से भी इन दो लोगों को निकाल दिया गया तो कुछ न कुछ लोग इनका साथ जरूर देंगे यानी पार्टी टूटेगी। कितनी टूटेगी, इसका कुछ पता नहीं। जितनी भी टूटे, लेकिन यह बात निश्चित है कि इन दोनों के निकल जाने से ‘आप’ का कोई खास नुकसान होने वाला नहीं है।‘आप’ के असली नेता केजरीवाल हैं। उनके नाम पर ही ‘आप’ सत्तारूढ़ है। जहां तक प्रशांत और योगेंद्र का प्रश्न है, ये लोग विचारशील हैं, विवेकी हैं, लेकिन उनके पास न तो जनाधार है, न अखबारी लोकप्रियता और न पार्टी के कार्यकर्ता उनके पीछे हैं। जो कार्यकर्ता ‘आप’ में शामिल हुए हैं, वे सब कोरे सिद्धांतवादी और आदर्शवादी नहीं हैं। वे ऐसे लोगों के पीछे क्यों चलेंगे, जो उन्हें सत्ता नहीं दिला सकते? उन्हें वे उपदेश जरूर दे सकते हैं, लेकिन उपदेश ही लेना हो तो ये कार्यकर्ता किसी संन्यास आश्रम में भर्ती क्यों न हो जाएं?


प्रशांत और योगेंद्र ने अपने खुले खत में जो मांगें रखी हैं, वे काफी हद तक ठीक हैं, लेकिन क्या उन्हें पता नहीं है कि वे एक राजनीतिक पार्टी के स्तंभ हैं, किसी वाद-विवाद क्लब के सदस्य नहीं हैं। उनकी यह मांग ठीक हो सकती है कि ‘आप’ को सूचना के अधिकार के तहत लाया जाए,लेकिन जब अन्य सारी पार्टियां राजी नहीं हैं तो ‘आप’ ही इस ओखली में सिर डालने को तैयार क्यों हो? इसी प्रकार प्रांतीय और स्थानीय पार्टी शाखाओं को चुनाव लड़ने या न लड़ने और उम्मीदवार तय करने का अधिकार देना भी अच्छा है, लेकिन यह कहां तक व्यावहारिक मांग है?अभी पार्टी सिर्फ बीज रूप में हैं। उसके अंकुर भी नहीं फूटे हैं। वह शिशु-रूप में है।


उसने चलना भी नहीं सीखा है और आप उसे ‘ओलिम्पिक’ में दौड़ाने के लिए तैयार बैठे हैं। उन्होंने केजरीवाल के एक ‘स्टिंग’ और एक मंत्री की डिग्री की जांच की भी मांग की है। ये मांगें गलत नहीं हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि आप अपने आपको पार्टी का स्तंभ समझते हैं या विपक्ष के नेता? हमारे राजनीतिक दलों का इतिहास जो लोग अच्छी तरह जानते हैं, उन्हें पता है कि जो सवाल ‘आप’ में उठ रहे हैं, वे मूंग के दाने के बराबर भी नहीं हैं। हमारे दलों ने हाथियों से भी बड़े सवाल चुटकियां बजाते हुए हल कर लिए हैं। ‘आप’ में पड़ी फूट की तुलना कम्युनिस्ट पार्टी,समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की फूट से करना बिल्कुल बेमानी है।


‘आप’ का यह संकट सिद्धांतों का बिल्कुल नहीं है। यह संकट व्यक्तियों का है। व्यक्तिगत स्वभावों का है। एक-दूसरे से ताल-मेल नहीं बिठा पाने का है। प्रशांत और योगेंद्र ने अपने खुले पत्र में शिकायत की है कि केजरीवाल को बेंगलुरू से लौटे हुए दस दिन हो गए, लेकिन उसने उन्हें हमें अभी तक मिलने का समय नहीं दिया। यदि इन लोगों में आपस में सद्‌भाव होता तो केजरीवाल खुद इनसे मिलने इनके घर चले जाते, लेकिन इलाज के लिए बेंगलुरू जाने के पहले केजरीवाल ने साफ-साफ कह दिया था कि ये दो लोग अगर पार्टी की राजनीतिक समिति में रहेंगे तो मैं उसमें नहीं रहूंगा। अब तो कई जिम्मेदार पार्टी-साथियों ने आरोप लगाया है कि उक्त दोनों लोग खुले तौर पर तो सिर्फ अपनी मांगें पेश करते हैं, लेकिन दबे-छिपे वे केजरीवाल को पार्टी-संयोजक पद से हटाना चाहते हैं।


दोनों ने पत्रकार-परिषद करके उक्त आरोप का खंडन किया है, लेकिन उनके मुंह से एक बार भी यह नहीं सुना गया कि वे केजरीवाल को पार्टी का या अपना नेता मानते हैं। वे केजरीवाल से बड़े हैं। केजरीवाल के सामने आने के बहुत पहले से वे सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं। वे केजरीवाल को अपना नेता नहीं मानने के लिए बिल्कुल स्वतंत्र हैं, लेकिन यदि उन्हें पार्टी में रहना है तो उन्हें केजरीवाल को पार्टी का नेता तो मानना ही पड़ेगा। अब उनकी छवि पार्टी के नेताओं की नहीं, पार्टी के बागियों की हो गई है। उन पर खुलेआम आरोप लगा है कि दिल्ली के चुनाव में उन्होंने पार्टी के विरुद्ध काम किया ताकि हार का ठीकरा वे केजरीवाल के माथे फोड़ सकें। पिछली बार मुख्यमंत्री पद से हटते ही केजरीवाल को ये पार्टी-संयोजक पद से हटाने में जुट गए थे। दोनों पक्षों में मनमुटाव इस हद तक पहुंच गया है कि पार्टी-प्रवक्ता ने मान लिया है कि दोनों ने कार्यसमिति से भी इस्तीफा दे दिया है, जबकि दोनों कह रहे हैं कि हमने नहीं दिया है।


जो तीर पहले ‘आप’ के नेता अन्य पार्टियों के नेताओं पर चलाते रहते थे, वे ही तीर अब वे एक-दूसरे पर चला रहे हैं। वे एक-दूसरे की बातचीत गुप-चुप ‘रिकॉर्ड’ कर रहे हैं, स्टिंग कर रहे हैं,साजिश के आरोप लगा रहे हैं। उसका परिणाम क्या हो रहा है? इस दंगल को लोग विचार की आजादी नहीं मान रहे हैं। इसे वे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का मल्ल-युद्ध मान रहे हैं। यह अहंकारों का द्वंद्व है। पिछले कुछ हफ्तों में ‘आप’ की सरकार ने कई अच्छे फैसले किए हैं, जिससे दिल्ली के कुछ तबकों को राहत भी मिलनी शुरू हो गई है, लेकिन उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। टीवी चैनलों को अपनी तीतर-बटेर पत्रकारिता चलाए रखने का स्वर्णिम अवसर ‘आप’ की राजनीति दे रही है। कुल-मिलाकर पिछले दस माह में मोदी की जो छवि बनी है, वह ‘आप’ की दो माह में ही बनती नजर आ रही है। सबसे मजे में कांग्रेस है।


भाजपा और ‘आप’ के नेताओं ने कभी सोचा है कि उनके समर्थकों पर क्या गुजर रही है? देश ने भाजपा और दिल्ली ने ‘आप’ को जो प्रचंड बहुमत दिया है, उसकी कितनी अवहेलना हो रही है?कांग्रेस की केंद्र और राज्य सरकारों से निराश होने का दौर कई वर्षों बाद शुरू हुआ था, लेकिन वर्तमान सरकारों और सत्तारूढ़ दलों की यह फिसलन देश के भविष्य पर प्रश्न चिह्न खड़ा कर रही है। यदि इतनी अच्छी पार्टियां और इतने अच्छे नेता सुशासन नहीं दे सकते तो इस देश का तो फिर ईश्वर ही मालिक है।