पाक पर मोदी का हठ त्याग

  • 2015-02-18 04:48:39.0
  • डॉ0 वेद प्रताप वैदिक
पाक पर मोदी का हठ त्याग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के साथ टूटा तार जोड़ने के लिए एक अच्छा बहाना खोज निकाला। हुर्रियत के बहाने जो तार अगस्त 2014 में मोदी ने अचानक तोड़ दिया था, वह अब जुड़़ जाएगा। अब बहाना यह है कि विश्व कप में दक्षेस (सार्क) के देश खेल रहे हैं तो भारत उनसे बातचीत करेगा। क्या बातचीत करेगा? क्या उन्हें क्रिकेट के दांव—पेंच सिखाएगा? भारत जरुर सिखा सकता है, क्योंकि दक्षेस देशों में भारत ही अंग्रेजों का सबसे बड़ा गुलाम था। क्रिकेट और अंग्रेजी की अनिवार्यता—ये ही हमारी गुलामी की दो सबसे बड़ी निशानी रह गई हैं। अपने देश के महान राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री श्री मोदीजी ने इन दोनों गुलामियों को पालने—पोसने और बढ़ाने की जिम्मेदारी ले ली है। उन्हें अंग्रेजी नहीं आती, फिर भी ‘टेलीप्रॉम्पटर’ की सहायता से उन्होंने अंग्रेजी बोलने का अद्भुत नाटक किया। आस्ट्रेलिया की संसद को मंत्रमुग्ध कर दिया। अब वे भी मियां नवाज़ की तरह क्रिकेट खेलने लगें तो हमें आश्चर्य नहीं होगा। खैर!


क्रिकेट के बहाने अब हमारे विदेश सचिव जयशंकर दक्षेश देशों में जाएंगे। क्रिकेट और जयशंकर का क्या संबंध है? हमको पता नहीं, मोदीजी को ज्यादा पता


होगा। जो भी हो, दक्षेस देशों में जाने के बहाने वे पाकिस्तान भी चले जाएंगे।


वास्तव में पाकिस्तान जाने के लिए ही जयशंकर ने क्रिकेट और दक्षेस के बहाने का आविष्कार किया है। इसी बहाने मोदी की रेल फिर पटरी पर आ रही है। देर आयद्, दुरस्त आयद! जयशंकर के विदेश सचिव बनते ही हमने यह भविष्यवाणी की थी। अब पाकिस्तान से विदेश—सचिव स्तर की वार्ता फिर शुरु हो जाएगी। हम मानते हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय की मूढ़ता के कारण जो पिछले छह माह बर्बाद हो गए, उन्हें हम भूल जाएं। अब विपक्ष द्वारा यह कहना कि मोदी की नाक कट गई, बिल्कुल गलत है। इस समय भारत को ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया की जनता को मोदी की पीठ थपथपाना चाहिए कि उन्होंने अपना हठ छोड़ दिया और वे अब नम्रतापूर्वक सही रास्ते पर चल रहे हैं। आश्चर्य नहीं कि यह केजरीवाल की कृपा का फल भी हो सकता है। जो भी हो, यह दुराग्रह त्याग मोदी की निर्गुण, निराकर और बीमार विदेश नीति को कुछ ठोस आयाम प्रदान करेगा। जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं कि यदि अगले पांच वर्षों में मोदी पूरे दक्षिण एशिया में एक साझा बाजार, साझा संसद, साझा रुपया और साझा महासंघ का कोई ढांचा खड़ा कर सकें तो भारत के प्रधानमंत्रियों की पंक्ति में उनका स्थान अग्रगण्य होगा।