न मोदी नेपोलियन हैं और न दिल्ली वाटरलू

  • 2015-02-14 04:46:22.0
  • उगता भारत ब्यूरो
न मोदी नेपोलियन हैं और न दिल्ली वाटरलू

ब्रजकिशोर सिंह


 मित्रों,10 फरवरी को दिल्ली में भाजपा को मिला करारी हार के बाद से ही मीडिया का एक हिस्सा दिल्ली को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए वाटरलू बताने में जुटा हुआ है जबकि वास्तविकता ऐसी है नहीं। नेपोलियन तलवार और बंदूकों के बल पर यूरोप को जीतना चाहता था जबकि नरेंद्र मोदी अपने अच्छे कामों से भारतीयों का दिल जीतना चाहते हैं। यहाँ संघर्ष जमीन जीतने के लिए नहीं बल्कि दिल जीतने के लिए हो रहा था और वास्तव में दिल्ली की हार मोदी की हार नहीं बल्कि खुद भारतीयों की हार है।


मित्रों,दिल्ली के चुनाव परिणामों का अगर हम विश्लेषण करें तो आसानी से यह समझ सकते हैं कि कैसे मुट्ठीभर अंग्रेजों ने विशालकाय भारत पर कब्जा कर लिया था। इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों ने दक्षिण में निजाम और मराठों को बारी-बारी से लालच देकर आपस में ही लड़वाया और वे अंग्रेजों की चाल को समझ ही नहीं सके। इसी तरह अंग्रेजों ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला,बंगाल के सेनापति मीरजाफर को भी लालच देकर अपना उल्लू सीधा किया और जब मतलब निकल गया तब दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया। कभी निजाम का पक्ष लेकर मराठों को हराया तो कभी मराठों को साथ में लेकर निजाम को। इसी तरह इतिहास बताता है कि जब ग्वालियर के किले में रहकर रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लोहा ले रही थी तब उनके किले के किसी द्वारपाल ने सिर्फ एक सोने की ईट के बदले 16-17 जून 1858 की आधी रात को किले के द्वार को खोल दिया था फिर अंजाम जो हुआ उसे सारी दुनिया जानती है।


मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है लालच हम भारतीयों के खून में है और उसी गंदे खून का दुष्परिणाम है दिल्ली का चुनाव-परिणाम। किसी ने एक लैपटॉप,एक साईकिल या एक मिक्सी दे दिया तो हम बिना यह देखे-परखे कि वह कैसा आदमी है उसे अपना राज्य अपना सबकुछ सौंप देते हैं। दिल्ली में भी वही हुआ जो अब तक यूपी,बिहार और तमिलनाडु में होता आ रहा था। दिल्ली में हमने यह नहीं देखा कि 40 हजार करोड़ रुपये के बजट वाली दिल्ली के लिए कोई व्यक्ति या पार्टी कैसे 15 लाख करोड़ रुपये के वादे कर रहा है? हमने यह भी नहीं देखा कि पिछली बार उस व्यक्ति या पार्टी ने कितने वादों को पूरा किया था?


मित्रों,अभी तो दिल्ली में मुख्यमंत्री का शपथ-ग्रहण भी नहीं हुआ है और स्वंघोषित एकमात्र सत्यवादी जी की पार्टी ने गीता,बाईबिल और कुरान से भी ज्यादा पवित्र अपने घोषणा-पत्र से पलटना शुरू भी कर दिया है। उसने घोषित कर दिया है कि दिल्ली में सिर्फ सार्वजनिक स्थलों पर ही मुफ्त वाई-फाई की सुविधा मिलेगी। वो भी सिर्फ आधे घंटे के लिए और उसमें भी फेसबुक आदि सोशल वेबसाईटों पर प्रतिबंध रहेगा। लो कल्लो बात। फिर फ्री के वाई-फाई का हम क्या अँचार डालेंगे? इतना ही नहीं कथित आम आदमियों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि हम वादों को तभी पूरा कर सकेंगे जब केंद्र सरकार हमें पर्याप्त आर्थिक सहायता देगी। तो फिर इन लोगों ने घोषणा-पत्र में इस बात की घोषणा क्यों नहीं की कि हम वर्णित घोषणाओं और वादों को तभी पूरा करेंगे जब केंद्र सरकार पैसे देगी? घोषणा-पत्र में अगर यह लिखा गया था कि मुफ्त वाई-फाई,मुफ्त पानी,झुग्गी के स्थान पर मकान और सस्ती बिजली में नियम और शर्तें लागू होंगी तो फिर अखबारों में क्यों नहीं वादों के साथ-साथ उन नियमों और शर्तों को प्रमुखता से छपवाया गया? क्यों नियमों और शर्तों को जनता से छिपाया गया? अभी एक और खबर आई है कि सस्ती बिजली और फ्री में पानी देने के लिए नई सरकार के पास विकास की राशि को सब्सिडी के रूप में बर्बाद करने के अलावा और कोई उपाय नहीं है। अगर हर राज्य में इसी तरह होता रहा और हो भी रहा है तो फिर कहाँ से आएगी विकास के लिए राशि और कैसे होगा देश का विकास?


मित्रों,ठगों को तो ठगी करनी ही थी अगर उन्होंने ठगी की तो इसमें उनका क्या दोष? दोष तो उनका है जिनका कबीर के इस 600 साल पुराने दोहे में आज भी अटूट विश्वास है कि कबिरा आप ठगाईए और न ठगिए कोए। आप ठगे सुख उपजै और ठगे दुःख होए।। तो ठगाते रहिए और सदियों तक लंगोट में फाग खेलकर चरम सुख का अनुभव करते रहिए। आप यकीनन देश के दुश्मनों द्वारा अभी दिल्ली में ठगे गए हैं,कल बिहार,परसों पश्चिम बंगाल और तरसों उत्तर प्रदेश में ठगे जाएंगे और इस तरह लगातार अपने लिए सुख उपजाते रहेंगे। मेरा यह पूरा आलेख विशेष तौर पर भारत के हिन्दुओं के लिए है। मुसलमानों का तो फिक्स है कि वे किसको वोट करेंगे फिर चाहे कोई कितने भी लैपटॉप,साईकिल क्यों न दे दे लेकिन दुनिया के सबसे पुराने धर्म के अनुयायियों का कोई ईमान-धर्म है क्या? फिर कोई दल या नेता क्यों इनके हित की बात करेगा,क्यों इनकी भलाई के लिए लड़ेगा?


मित्रों,शपथ-ग्रहण से पहले ही कथित आम आदमी कहने लगे हैं कि सोशल-साईट्सविहीन आधे घंटे के फ्री वाई-फाई के आने में कम-से-कम 6 महीने लग जाएंगे तो क्या नरेंद्र मोदी स्विटजरलैंड या जर्मनी के बाप लगते हैं जो उनके एकबार फोन घुमाते ही 10 दिन के भीतर ही सारा-का-सारा कालाधन देश में वापस आ जाएगा। मोदी को तो वह कोट जिसका मूल्य भले ही कितना भी हो उपहार में मिला था और मोदी हर साल जुलाई में उपहार में मिली वस्तुओं को नीलाम करके प्राप्त राशि को सरकारी खजाने में जमा करवा देते हैं। बाँकी के नेताओं में क्या कोई एक भी ऐसा है जो ऐसा करता हो? बाँकी के नेता तो जब सरकारी आवास को खाली करते हैं तो बल्ब और कुर्सियाँ तक उठाकर ऐसे ले जाते हैं जैसे उनके बाप का माल हो। अभी हाल ही में हमारी पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने जब अपना कार्यकाल पूरा किया तब अपने साथ देश-विदेश में मिले कीमती उपहारों को भी साथ ले गईँ जिनको बाद में भारत सरकार को पत्राचार कर वापस मंगवाना पड़ा। और ऐसी लुटेरी पार्टियों के लुटेरे नेता भारत के प्रधानमंत्री के शूट पर सवाल उठा रहे हैं? खुद तो इनलोगों ने 200 रुपये मीटर का कपड़ा पहनकर देश को हजारों करोड़ का चूना लगा दिया और सवाल उठा रहे हैं पीएम के शूट पर?


मित्रों,कल ही बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने स्वीकार किया है कि बिहार में जो पुल बनते हैं उनके पायों के निर्माण पर जितना खर्च होता है उससे कहीं ज्यादा तो कमीशन दे दिया जाता है और वह कमीशन मुख्यमंत्री तक पहुँचता है। उन्होंने यह भी माना है कि पुल 20 करोड़ में बन जाता है लेकिन बिल 200 करोड़ रुपये का बनाया जाता है। और जिस व्यक्ति ने इस सारी कमीशनखोरी पर केंद्र सरकार में पूर्ण विराम लगा दिया उसी से आज बेईमान ईमानदार पार्टियों के लोग शूट का दाम पूछ रहे हैं और जनता भी उनके झाँसे में आ जा रही है! सवा सौ साल पहले भारत-दुर्दशा लिखकर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भारत की अंतरात्मा को जगाने का प्रयास किया था लेकिन भारत की अंतरात्मा तो आज तक भी सोयी हुई ही है। सवा सौ साल पहले की तरह आज भी हमारे लिए हमारी वरीयता सूची में हमारे स्वार्थों का स्थान सबसे ऊपर है और देशहित कहीं नहीं। आज भी हम दस-बीस हजार रुपये के फायदे के लिए अपने राज्य और देश को देश के घोषित-अघोषित दुश्मनों के हाथों में हर पाँच साल पर सहर्ष सौंप देते हैं। वो हमें बार-बार धोखा देते हैं और बार-बार माफी मांगते हैं और हम बार-बार माफ भी कर देते हैं। वो कभी हमें रोटी का लालच देते हैं तो कभी पानी का तो कभी लैपटॉप या साईकिल या मिक्सी का और तब हम भूल जाते हैं कि इनके हाथों में हमारे राज्य या देश का हित सुरक्षित रहेगा या नहीं। हम लालच में आकर अपना वोट बेच देते हैं और उनको मौका दे देते देश को बेचने का। कौन कहता है काठ की हाँड़ी एक बार ही आग पर चढ़ती है?  फिर सवा सौ करोड़ के भारत में एक व्यक्ति के लिए अगर नेशन फर्स्ट और लास्ट है तो होकर भी क्या कर लेगा???