‘‘उच्चाधिकार समिति’’ का गठन किया जाएः वसुंधरा

  • 2015-02-09 05:42:42.0
  • अमन आर्य
‘‘उच्चाधिकार समिति’’ का गठन किया जाएः  वसुंधरा

नई दिल्ली में प्रधानमंत्राी की अध्यक्षता में नीति आयोग की शासकीय परिषद की पहली बैठक

केन्द्र एवं राज्यों के मसलों के समाधान के लिए ‘‘उच्चाधिकार समिति’’ का गठन किया जाएः

-मुख्यमंत्राी श्रीमती वसुंधरा राजे 


नई दिल्ली, 08 फरवरी। राजस्थान की मुख्यमंत्राी श्रीमती वसुन्धरा राजे ने सुझाव दिया कि केन्द्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों द्वारा चलाई जा रही परियोजनाओं एवं राज्यों की परियोजनाओं के बीच सामंजस्य एवं विभिन्न मुद्दों के समाधान के लिए नीति आयोग के अंतर्गत एक ‘‘उच्चाधिकार प्राप्त समिति’’ का गठन किया जाना चाहिए, ताकि विकास परियोजनाओं को गति मिल सके।

श्रीमती राजे ने रविवार को नई दिल्ली में प्रधानमंत्राी निवास सात रेस कोर्स पर नीति आयोग की शासकीय परिषद की पहली बैठक में राज्य का पक्ष रखते हुए यह बात कही। बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्राी श्री नरेंद्र मोदी ने की। बैठक में राज्यों के मुख्यमंत्रियों और केन्द्र शासित राज्यों के उपराज्यपालों आदि ने भाग लिया।

श्रीमती राजे ने सुझाव दिया कि राज्यों को अपनी क्षेत्राीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप योजनाओं के निर्माण और क्रियान्विती की अनुमति प्रदान करते हुए इसके लिए  केंद्रीय मदद उपलब्ध करवाई जानी चाहिए। उन्होंने केंद्र प्रवर्तित योजनाओं की संख्या दस से अधिक नहीं रखने और शेष राशि को राज्यों को निर्बन्ध राशि के रूप में उपलब्ध करवाने का सुझाव भी दिया।

श्रीमती राजे ने विकास के सभी मुद्दों पर केन्द्र राज्यों के बीच बेहतर तालमेल का सुझाव देते हुए कहा कि विकास के लिए योजना बनाने का कार्य राज्यों पर छोड़ दिया जाना चाहिए, जिससे राज्य अपनी सभी क्षेत्राीय आकांक्षाओं एवं जरूरतों को प्राथमिकता प्रदान कर सके। उन्होनंे योजना एवं गैर योजना मदों के दिखावटी भेद को खत्म करने का सुझाव भी दिया। उन्होंने कहा कि ‘समग्र योजना’ के अनुमोदन की जरूरत नहीं होनी चाहिए। साथ ही राज्यों को योजना दृष्टिकोण की तैयारी के लिए विशेषज्ञों की सहायता भी आयोग द्वारा प्रदान करवायी जानी चाहिए।

श्रीमती राजे ने कहा कि केन्द्र सरकार द्वारा प्रदान की जानी वाली केन्द्रीय सहायता का अधिकतर हिस्सा केन्द्र प्रायोजित स्कीमों के कार्यान्वयन में ही व्यय हो जाता है जिससे राज्यों की योजनाओं के लिए धन की भारी कमी का सामना करना पड़ता है। राजस्थान में वर्ष 2014-2015 के दौरान शिक्षा से जुड़ी केन्द्रीय योजनाओं पर केन्द्रीय सहायता का 97.5 प्रतिशत खर्च किया जाना है। शेष 2.5 प्रतिशत धन ही राज्य विशेष योजनाओं के लिए बचेगा, जो लगभग नगण्य है। ऐसी विभिन्न वित्तीय समस्याओं के समाधान का सुझाव देते हुए श्रीमती राजे ने कहा कि केन्द्र प्रायोजित योजनाओं की संख्या दस से ज्यादा नहीं होनी चाहिए तथा इन योजनाओं का क्षेत्रा केन्द्रीय एवं समवर्ती सूची के विषयों तक ही सीमित होना चाहिए।

उन्होंने सुझाव दिया कि इस निर्धारित सीमा के बाद जो धन राज्यों के हिस्सों के रूप में बच जाता है उसे राज्यों को निर्बन्ध राशि के रूप में प्रदान किया जाना चाहिए। श्रीमती राजे ने कहा कि इस निर्बन्ध राशि के मिलने से राज्यों की वित्तीय स्थिति मजबूत होगी तथा राजस्थान में क्षेत्राीय विशेषताओं पर आधारित डॉंग, मगरा, मेवात, देवनारायण एवं पेयजल की परियोजनाओं को बेहतर रूप से कार्यान्वित किया जा सकेगा।

श्रीमती राजे ने सुझाव दिया कि केन्द्र प्रायोजित योजनाओं के प्रावधानों की संयुक्त समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि राज्यों की विशिष्ट समस्याओं को चिन्हित एवं उनका सामाधान किया जा सकें। उन्होने विशेष रूप से केन्द्र प्रायोजित नरेगा, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना एन.डी.आर.एफ. आदि के प्रावधानों की समीक्षा पर जोर देते हुए कहा कि राजस्थान में सूखे एवं अकाल की अविरल समस्या के मद्देनजर गौशालाओं में चारा एवं वित्तीय सहायता की 90 दिनांे के बाद भी जरूरत बनी रहती हैं। अतः एन.डी.आर.एफ के प्रावधानों में तुरंत संशोधित किया जाना उचित होगा।

श्रीमती राजे ने नीति आयोग को ‘‘सहकारी संघवाद’’ की परिकल्पना का आधार बताते हुए सुझाव दिया कि नीति आयोग के माध्यम से केन्द्र एवं राज्यांे के मध्य पारस्परिक विचार विमर्श आधारित संरचनात्मक ढांचे के विकास को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जहाँ सभी राज्य अपनी जरूरतों के अनुसार सभी मुद्दों पर स्वतंत्रा रूप से अपना पक्ष रख सके। उन्होंने केंद्रीय वस्तुकर (जी.एस.टी.) पर सर्वसम्मति बनाने के लिए गठित राज्यों के वित्त मंत्रियों  एम्पावर्ड कमेटी के कार्यो की सराहना करते हुए कहा कि हमें नीति आयोग के अन्तर्गत भी इस तरह की व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए तथा ‘‘रीजनल’’ और ‘‘सेक्टोरियल समूहों’’ का गठन कर उनमें राज्यों के मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों को शामिल करना चाहिए।

उन्होने कहा कि नीति आयोग एक ‘ज्ञान भंडार’’ के तरह काम कर सकता है। जहां बड़ी मात्रा में उपलब्ध आकड़ों, विश्लेषणों एवं उत्कृष्ट कार्यो का तुलनात्मक अध्ययन का संग्रह राज्यों के लिए उपलब्ध होना चाहिए। जिस के माध्यम से हम राज्यों के बीच सकारात्मक प्रतिस्पर्धा की भावना को भी बढ़ावा दे सकते है।

श्रीमती राजे ने जोर देते हुए कहा कि यदि केन्द्र द्वारा कोई ‘हकदारी आधारित अधिनियम’ बनाया जाता हैं तो उसके क्रियान्वयन की लागत केन्द्र सरकार द्वारा प्रदान की जानी चाहिए, ताकि राज्येां के वित्तीय भार को संभाला जा सके।

श्रीमती राजे ने विश्वास दिलवाया कि राज्य केंद्र सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को पूरी मजबूती के साथ अपना समर्थन प्रदान करेगा। उन्होने सुझाव दिया कि विकास और केंद्रीय योजनाओं के मार्ग में आने वाली अड़चनों को दूर करने के लिए केंद्र के विभिन्न मंत्रालयों एवं राज्यों के मुख्य सचिवों के मध्य समूहों का गठन कर योजनाओं को गति प्रदान करने की दिशा में पहल करनी चाहिए। इसी प्रकार नीति आयोग के अधीन राज्यों की विशिष्ट योजनाओं, केंद्र एवं राज्य सम्बंधी मामलों और अन्तर्राज्यीय मसलों का त्वरित हल निकालने के लिए भी इसी प्रकार समूह गठित किए जाने चाहिए।