बाबा रामदेव का अलंकरण-त्याग

  • 2015-02-04 01:56:45.0
  • डॉ0 वेद प्रताप वैदिक
बाबा रामदेव का अलंकरण-त्याग

बाबा रामदेव ने पद्म-विभूषण अलंकरण को अस्वीकार करके भारत के संन्यासियों के लिए सही परंपरा स्थापित की है। उन्होंने न तो इस अलंकरण को नीचा दिखाया है और न ही मोदी सरकार का अपमान किया है। उन्होंने जिस भाषा में अलंकरण अस्वीकार किया है, उसमें एक सच्चे संन्यासी की गरिमा और विनम्रता है। उन्होंने उन्हें अलंकृत करने के इरादे का सम्मान किया है, सरकार का आभार माना है लेकिन यह भी कहा है कि एक संन्यासी तिरस्कार या पुरस्कार की परवाह किए बिना अपना कर्म निष्काम भाव से करता जाता है। इस अलंकरण-त्याग ने स्वामी रामदेवजी की छवि में चार चांद लगा दिए हैं।


रामदेवजी का यह अलंकरण-त्याग कुछ अन्य संन्यासियों के लिए दुविधा उत्पन्न कर सकता है, क्योंकि इन सरकारी सम्मानों के लिए उनके नाम भी चैनलों और अखबारों में उछले हैं। इसमें शक नहीं कि इन संन्यासियों का जीवन और आचरण देश और संपूर्ण मानवता के लिए बहुत उपकारी रहा है लेकिन किसी संन्यासी को इस तरह के औपचारिक सम्मान और पुरस्कार स्वीकार करना चाहिए या नहीं, यह एक बड़ा प्रश्न है?


यह प्रश्न मैंने क्यों उठाया? इसके कई कारण है। पहला, ये सम्मान देने वाले कौन है? नेता लोग हैं। उनकी नैतिक हैसियत क्या है? शून्य! वे कौन होते हैं, किसी संन्यासी को ऊंचा उठाने वाले? दूसरा, इस तरह के सम्मानों के लिए देश के अनेक महान कलाकारों, विद्वानों और साहित्यकारों को मैंने नेताओं के चरणों में मत्था टेकते हुए देखा है। उन्हें देखकर मुझे बहुत तरस आता रहा है। अगर हमारे संन्यासी इन सम्मानों को स्वीकार करेंगे तो लोगों को उन पर भी शक होगा कि उन्होंने पता नहीं कहां-कहां नाक रगड़ी होगी?


तीसरा, ये सम्मान यों तो काफी योग्य लोगों को दिए जाते रहे हैं लेकिन कुछ अंधों ने अपनों को काफी रेवड़ियां भी बांटी हैं। भारत रत्न भी इससे अछूता नहीं रहा है। संन्यासी अपने आप को किसी भी सरकार से नत्थी क्यों करे? वह तो पहले से विश्व की सबसे शक्तिशाली सत्ता (परमात्मा) से नत्थी हो चुका है। चौथा, संन्यासियों का निष्पक्ष और निर्भय रहना इसलिए भी जरूरी है कि आज नेताओं से देश की जनता का मोहभंग होता जा रहा है। ऐसे में जो लोग सचमुच संन्यासी हैं (सिर्फ भगवाधारी नहीं), वे ही देश की रक्षा कर सकते हैं और रास्ता भटकी हुई राजनीति को पटरी पर ला सकते हैं। गुरू गोलवलकर, लोहिया और जयप्रकाश को मैं इसी श्रेणी में रखता हूं। मुझे खुशी है कि रामदेवजी ने इसी श्रेष्ठ मार्ग को पकड़ा है और उनका अनुकरण रविशंकर भी कर रहे हैं। दोनों को बधाई!