ओबामा की भारत-यात्रा

  • 2015-01-26 08:30:20.0
  • डॉ0 वेद प्रताप वैदिक
ओबामा की भारत-यात्रा

ओबामा के लिए भारत का महत्व कितना है, इसका अंदाज उनके अभिभाषण से लगता है, जो उन्होंने अपनी कांग्रेस (संसद) को दिया है। उसमें दुनिया के लगभग दर्जन भर देशों का संदर्भ आया है लेकिन उसमें से भारत नदारत है। वे भारत आ रहे हैं, इसे हमारी सरकार अभूतपूर्व और ऐतिहासिक बता रही है, जो है भी, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या स्वयं ओबामा और उनके सलाहकार उनकी इस यात्रा को वैसा ही समझ रहे हैं, जैसा कि हम समझ रहे हैं?


कुछ अमेरिकी विद्वानों का कहना है कि ओबामा और मिशेल तो ताजमहल देखने भारत जा रहे हैं। अगर कुछ समझौते इस बीच हो जाएं तो गनीमत है। वे यह सवाल भी उठा रहे हैं कि सिर्फ भारत जाने के लिए ओबामा अपने बहुमूल्य चार दिन क्यों खराब कर रहे हैं?


जाहिर है कि इस तरह की अटपटी बातें वे ही कर रहे हैं, जो ओबामा के व्यावसायिक निंदक हैं लेकिन मुझे डर यही है कि ओबामा की यह दूसरी यात्रा कहीं चीनी राष्ट्रपति की भारत-यात्रा और हमारे प्रधानमंत्री की जापान, अमेरिका और नेपाल-यात्राओं की तरह कोरा झुनझुना बनकर नहीं रह जाए। यह ठीक है कि ओबामा अब अपने कार्यकाल में आखिरी दौर में हैं और अमेरिकी लोग इसे चलाचली की वेला ही मानते हैं, फिर भी ओबामा चाहें तो भारत-अमेरिका संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जा सकते हैं। दूरगामी दृष्टि से यह तय कर सकते हैं कि एशिया की राजनीति में वे कहां तक चीन के साथ जाएंगे और कहां तक भारत के साथ? दक्षिण एशिया में वे भारत की भूमिका के बारे में क्या सोचते हैं? अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी के बाद वहां भारत की भूमिका क्या होगी? भारत-पाक संबंधों के बारे में क्या अमेरिका कोई दो-टूक रवैया अपनाएगा? आतंकवाद को लेकर उसके ताज़ा तेवर सराहनीय है लेकिन क्या वे उसे अंजाम तक पहुंचाएंगे?


इसके अलावा भारत-अमेरिकी परमाणु सौदा अभी तक अधर में लटका हुआ है। क्या दुर्घटना-जवाबदेही के बारे में भारतीय शर्तें मानने को ओबामा-प्रशासन तैयार है? मोदी-सरकार ने तो अमेरिकी पूंजी को खुली दावत दे दी है लेकिन अभी भी वह इतनी क्यों ठिठक रही है? अमेरिकी कंपनियां केवल शस्त्र-निर्यात करने की बजाय भारत में ही शस्त्र-निर्माण क्यों नहीं करतीं? अमेरिका क्यों नहीं, भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने की वकालत करता? ओबामा यद्यपि अपने आखिरी दौर में हैं लेकिन जाते-जाते वे द्विपक्षीय संबंधों की ऐसी मजबूत आधारशिला रख सकते हैं कि 21 वीं सदी का एशिया यूरोप की तरह शांति और संपन्नता का महाद्वीप बन जाए।