भारतीय सिनेमा व तुष्‍टीकरण की राजनीति

  • 2015-01-07 02:57:14.0
  • उगता भारत ब्यूरो
भारतीय सिनेमा व तुष्‍टीकरण की राजनीति

डॉ0  सूर्य प्रकाश  अग्रवाल  


वर्श 2014 के अंत में जिस प्रकार प्रसिद्ध अभिनेता आमीर खान के द्वारा अभिनीत व हिरानी जैसे कुशल निर्देशक के द्वारा निर्देषित फिल्म पीके रिलीज हुई और फिल्म ने देखते ही देखते प्रदर्षन के मात्र पहले तीन सप्ताह में ही तीन सौ करोड रुपये का व्यवसाय दिला कर सफलता के झांडे गाडने का दम दिखा कर लोकप्रियता का प्रदर्षन किया वहीं कुछ हिन्दूवादी संगठनों ने फिल्म का यह कहते हुए विरोध किया कि फिल्म में हिन्दू देवी व देवताओं का उपहास उडाया गया है जिस पर द्यदम् धर्मनिरपेक्षतावादी राजनेताओं ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर फिल्म के विरोध को नकारते हुए हिन्दूवादी संगठनों की आलोचना की। आग पर घी तब पड गया जबकि कुछ राज्य सरकारों ने उस पर अपने अपने राज्यों में मनोरंजन कर समाप्त कर दिया तथा यह कहा कि देष के गरीबों को भी यह फिल्म देखने का मौका मिलना चाहिए। चूंकि फिल्म में हिन्दु देवी व देवताओं का मजाक बनाया गया था तो कर की माफी के कृत्य से एक समुदाय को प्रसन्न करना ही उनका एक मात्र उद्देष्य था। यदि इसके विपरीत फिल्म में अल्लाह, खुदा, यीषू अथवा अन्य किसी धर्म पर किसी भी तरह का कोई वाक्य कहा जाता तो फिल्म पर राज्यों में पाबंदी लगाना लाजिम था क्योंकि ऐसे राजनेता धर्म निरपेक्ष जो ठहरे।


फिल्म पीके का विरोध देशव्यापी हो रहा है। उत्तरप्रदेष, बिहार, उडीसा, असम, जम्मू व कष्मीर, हिमाचल प्रदेष, महाराश्ट्र, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात आदि राज्यों में सिनेमा घरों के बाहर षिवसेना, बजंरग दल, हिन्दु जागरण मंच, विष्व हिन्दु परिशद्, आदि के कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्षन कर फिल्म से जुडे लोगों के पुतले फंूके। प्रदर्षनकारी तत्काल प्रभाव से फिल्म पर पाबंदी की मांग कर रहे है। प्रदर्षनकारियों का कहना है कि फिल्म के कुछ दृष्य हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले लोगों की भावनाओं से ख्लिवाड कर रहे है सो फिल्म के अभिनेता, अभिनेत्री, निर्देषक व निर्माता के विरुद्ध फौजदारी का मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए। वरिश्ठ भाजपा नेता डॅा. सुब्रहमण्यम स्वामी तो फिल्म से जुडे लोगों के विरुद्ध मनी लांड्रिग के तहत मुकदमा दर्ज कराने की सोच रहे है। वैसे अधिकारिक रुप से भाजपा ने इस फिल्म के प्रति अपना कोई विरोध नहीं दिखया है।


फिल्म पीके के निर्देषक राजकुमार हिरानी (52) जो परिपक्वय विचारों के एक सफल निर्देशक है, ने सभी आरोपों को खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि फिल्म में मानवता का पाठ पढाया गया है तथा महात्मा गांधी, संत कबीर व अन्य संतों के आदर्ष प्रदर्षित किये गये है। उनका हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने का कोई इरादा नहीं था व धर्म के नाम पर आडम्बरों को खारिज कर धर्म की सच्ची तस्वीर पेष करना उनका उद्देष्य था। वह सभी धर्मों की इज्जत करते है व उनकी अद्वैत और सभी इंसानों को समान समझने में अटूट आस्था है तथा हिन्दुत्व, इस्लाम, ईसाई तथा अन्य सभी धर्म भाई-चारे और प्रेम का पाठ पढाते है।


कांग्रेस के राश्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा कि फिल्म किसी भी तरह से हिन्दू धर्म की आस्था को चोट नहीं पंहुचाती है। योगगुरु बाबा रामदेव का कहना है कि लोगों की भावनाओं और परम्पराओं के साथ खिलवाड नहीं किया जाना चाहिए। भाजपा की नेत्री साध्वी प्राची ने कहा कि आमीर तथा षाहरुख खान को यदि हिन्दू व हिन्दुस्थान पंसद नहीं है तो उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए। अखिल भारतीय हिन्दू षक्ति दल ने मुजफ्फरनगर में 30 दिसम्बर 2014 को कोतवाली में तहरीर देकर फिल्म निर्माता, कलाकरों और उससे जुडे व्यक्तिओं पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की है तथा दल के राश्ट्रीय महासचिव संजय अरोरा ने कहा कि है कि फिल्म के एक नहीं कई दृष्यों से हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत पहुंचाया गया है। भारतीय जनता युवा मोर्चा की बैठक में भी पीके फिल्म पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने की मांग उठाई है तथा कहा है कि फिल्म से बहुसंख्यक वर्ग की भावनाऐं आहत हुई है व हिन्दु धर्म का मखौल उडाया गया है।


उत्तरप्रदेष में समाजवादी पार्टी की अखिलेष सरकार व नितीष कुमार की सिफारिष पर बिहार में मांझी सरकार ने ऐसा संदेष देने वाली फिल्म पीके को प्रोत्साहित करने के लिए अपने अपने राज्यों में मनोरंजन कर से मुक्त कर दिय। उनका यह फैसला देष के विभिन्न प्रदेषों में फैले फिल्म के विरोध को देखते हुए आलोचना का विशय बन गया है तथा यह स्वाभाविक रुप से समझा जा सकता है कि ऐसे फैसले इस धारणा को और गहरा कर देते है कि हमारे धर्मनिरपेक्षतावादी राजनेता अक्सर उन बातों के प्रति पर्याप्त संवेदनषील नहीं होते जिनका संबंध हिन्दू धर्म से होता है तथा हिन्दू संगठनों के द्वारा विरोध किया जाता है। सरकार ने कटाक्ष करते हुए कहा गया कि फिल्म को इसलिए टैक्स फ्री किया गया है कि जो लोग फिल्म का विरोध कर रहे है वे भी उसे आसानी से देख सकें। सरकार के इस संदेष से तो विरोध और बढ सकता है। सरकार ने इस मामले को भी तुश्टीकरण की राजनीति के चष्में से ही देखा है। क्या यही एक मात्र अच्छी फिल्म है जिसे उत्तरप्रदेष में मनोरंजन कर से मुक्त किये जाने की जरुरत पड गई।? हो सकता है कि सरकारों के इस फैसले से फिल्म की मुष्किलें आने वाले समय बढ जायें।


फिल्म का विरोध अहिसंक तरीके से किया जा सकता है जिस किसी समुदाय व धर्मावलम्बी को इस फिल्म की विशय वस्तु से आपत्ति है उसे उसका विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है लेकिन इस फिल्म में देवी देवताओं के उपहास उडाने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माना जा रहा है। तो फिर विरोध को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माना जाना चाहिए तथा इस अधिकार का प्रदर्षन लोकतांत्रिक सीमाओं में ही किया जा सकता है। हमारे देष में आध्यात्मिक गुरुओं की जो आदर्ष परम्परा रही है उसका भी कुछ गुरुओं ने खूब दुरुपयोग किया है।


सरकार ने अधिकार सम्पन्न एक सैंसर बोर्ड बना रखा है जो कि प्रत्येक फिल्म को अपना प्रमाण पत्र देता है फिर फिल्म को प्रदर्षित किया जाता है परन्तु फिल्म के पक्ष व विपक्ष में माहौल बनाने की राजनीतिक कुचेश्टता समाज के लिए हानिकारक ही कही जा सकती है। यदि फिल्म यह कहती है कि ईष्वर की खोज आत्मिक षक्ति के माध्यम से बिना किसी आडंम्बर के होनी चाहिए तो क्या कोई इससे इंकार कर सकता है।? परन्तु यह बात सभी धर्मेां पर हमारे जैसे धर्मनिरपेक्षतावादी देष में लागू होनी चाहिए। मात्र हिन्दू धर्म को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराना गलत होगा। विष्व में किसी देष में मात्र कार्टून बना देने पर, कोई विषेश टोपी पहना देने पर, तीन तलाक कहने मात्र से इत्यादि षब्दों पर भारत में बखेडा खडा करने पर फिल्म में तत्काल प्रभाव से बदलाव किये जा सकते है तो फिर इस फिल्म पीके में पर्याप्त बदलाव बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को देखते हुए कर देने चाहिए। ऐसा पूर्व में भी कई फिल्मों में हुआ है कि किसी की भावनाओं को सम्मानित करते हुए फिल्म में पर्याप्त कांट छांट की गई है। यदि देष में तुश्टीकरण की राजनीति चली तो संवैधानिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरा पैदा हो जायेगा।


अंत में प्रसिद्ध लेखिका तस्लीमा नसरीन के इस वाक्य से सहमत हुआ जा सकता कि हिन्दुत्व इतना कमजोर नहीं है कि मात्र एक फिल्म उसे नुकसान पंहुचा सके। ईस्लाम आठ सौ सालों से भी अधिक समय से हिन्दुत्व पर हमले कर इसे खत्म नहीं कर पाया है। अंत में यह कहा जा सकता है कि हिन्दुत्व को तैमूर, खिलजी, गजनवी व औंरगजेब जैसे कटटरपंथी षासक कमजोर नहीं कर पाये तो फिर वर्तमान द्यद्म धर्मनिरपेक्षतावादी हिन्दू राजनेता तथा उनकी राजनीति क्या कमजोर कर पायेगें।? भारत में आम आदमी में मात्र यही संदेष जाता है कि धर्मनिरपेक्षतावादी विषेश कर हिन्दू राजनेता तथा उनकी राजनीति हिन्दू धर्म के अलावा षेश सभी धर्मों की रक्षा के लिए ही काम करती है।