शाबाश, तनवीर शेख!

  • 2014-12-03 02:27:22.0
  • डॉ0 वेद प्रताप वैदिक
शाबाश, तनवीर शेख!

कल आपने आरिफ मजीद के बारे में पढ़ा था। आज उसके दूसरे साथी फहद शेख के बारे में कुछ पता चला है। मुंबई के कल्याण में रहनेवाले फहद के पिता तनवीर शेख ने कहा है कि उनके बेटे फहद ने अगर कोई गैर−कानूनी काम किया है तो उसे उसकी सजा मिलनी चाहिए। उन्हें पता है कि उनका बेटा फहद भी आरिफ की तरह थक−हार कर स्वदेश लौटेगा। हम चाहेंगे कि वह कोई बात छिपाए नहीं। सभी बातें सुरक्षा एजेंसियों को सच−सच बता दे।


फहद ने अपने पिता तनवीर शेख को अगस्त में फोन किया था और उसने भारत लौटने की इच्छा जताई थी। फहद अपने अन्य तीन साथियों−− आरिफ, अम्मान और शाहीन के साथ मई में तीर्थ−यात्रा के बहाने बगदाद गया था। उनके साथ 40 लोग इत्तिहाद की उड़ान से बगदाद पहुंचे थे और वहां से 30 मई को वे टैक्सी से मोसुल पहुंचे और वहां जाकर वे ‘इस्लामी सल्तनत’ की फौज में शामिल हो गए। आरिफ की गिरफ्तारी के बाद उसने स्वीकार किया कि इन भारतीय जवानों से ‘इस्लामी सल्तनत’ के छापामार लोग अपने कमोड साफ करवाया करते थे और उन्हें जिम्मेदारी का कोई भी काम नहीं सौंपा जाता था। इसका मतलब क्या हुआ कि वे जो लड़ाई लड़ रहे हैं, वह इस्लामी जिहाद नहीं है। वह ऐसा विचित्र जिहाद है, जो अरबी मुसलमान और भारतीय मुसलमान में फर्क करता है। भारतीय मुसलमान पर वह रत्ती भर भी विश्वास नहीं करता। तो फिर जिहाद के नाम पर चल रहे इस ढोंग में हमारे भारतीय बच्चे कैसे फंस गए?


इस प्रश्न का जवाब भी आरिफ से की गई पूछताछ में से निकला। आरिफ ने बताया कि उन चारों लड़कों को इंटरनेट से जानकारियां मिलीं। इंटरनेट के जरिए उन्होंने ‘इस्लामी सल्तनत’ के छापामारों से संपर्क स्थापित किया। उन्होंने प्रत्येक नौजवान को 60−60 हजार रु. दिए। फहद के पिता तनवीर शेख ने बताया कि फहद जब भी वहां से फोन करता, उसकी मां और वह, दोनों फोन पर सुबक−सुबककर रोने लगते थे। तनवीर शेख ने यह भी कहा कि मैं उससे ज्यादा बात नहीं करता हूं ।


शेख को शाबाशी मैं उनके इस कथन पर भी देता हूं कि उन्होंने कहा कि ‘मैं देशभक्त नागरिक हूं। मैं या मेरे परिवार का कोई आदमी कभी पुलिस थाने नहीं गया। मेरे लड़के ने मेरी इज्जत पर पानी फेर दिया। उसने अपने भविष्य को चौपट कर लिया। उसने हमारी मुहब्बत का बेजा फायदा उठाया। जब शेख से पूछा गया कि फहद के प्रति आपके परिवार का रवैया अब क्या होगा? शेख ने कहा, ‘बाप का दिल तो पत्थर का हो सकता है, पर आप बताइए कि मां क्या करे?’


जैसा कि मैंने कल भी लिखा था कि मुंबई के ये चारों नौजवान यदि किसी भारत−विरोधी अभियान में शामिल हुए हों तो इन्हें कठोरतम सजा मिलनी चाहिए लेकिन ये अगर मजहबी जूनून और लालच में फंसकर बगदाद चले गए हों तो इनके प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।