हैरान क्यों हैं शैतान कहने पर?

  • 2014-11-04 03:52:25.0
  • उगता भारत ब्यूरो
हैरान क्यों हैं शैतान कहने पर?

विष्‍णु गुप्‍त


किया की विपरीत प्रतिक्रिया होती है। हिंसा के विरोध में प्रतिहिंसा भी होती है। दुनिया में कोई सर्वशक्तिमान नहीं होता है? सर्वशक्तिमान समझने वाली शक्ति को भी चुनौती मिलती है। अराजक और अनियत्रित शक्ति, समूह और व्यवस्था की मानसिकता का दमन होता है, पतन भी होता है। यह सब हम बार-बार देखते हैं। यह देखिये दुनिया को अपनी हिंसक, अराजक, अनियंत्रित अनुदारवादी मानसिकता और आतंकवाद से तबाह करने पर तुली मुस्लिम आबादी को मिली चुनौती और जैसा को तैसा की भाषा में मिलां जवाव।


मुस्लिम आबादी एकात्मक मजहबवाद से ग्रसित दूसरे धर्म समूहों को काफिर कहने और दूसरे धर्म के प्रतीक चिन्हों के साथ हस्यास्पद, घृणात्मक, हिंसात्मक खेल-खेलने से नहीं चुकती है और इन पर यह असर भी नहीं होता कि इससे दूसरे धर्म समूहों की धार्मिक भावनाएं आहत होगी। ‘इनोसेंट आॅफ मुस्लिमस‘ नामक फिल्म जिसकों लेकर दुनिया भर में मुस्लिम आबादी हिंसक राजनीतिक और हिंसा की अग्निनल जला रखी है, मुस्लिम आबादी की हिंसा में लीबिया स्थित अमेरिकी राजदूत तक जल गये, अफगानिस्तान में नाटो सैनिको के ठिकाने पर हमला कर कई सैनिको को मौत का घाट उतार दिया गया, कथितरूप से उदार समझेजाने वाले मिश्र, तुर्क, और अफ्रीकी मुस्लिम देशो में ‘मुस्लिमस बदरहुड‘ जैसी हिंसक और एकात्मक मजहबी मानसिकता से ग्रसित शक्ति ने हिंसा की ऐसी आग जलायी जिससे देख कर दुनिया की जनमत हैरान-परेशान हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या सिर्फ मुस्लिम आबादी और मुस्लिम हिंसात्मक, घृणात्मक,हास्यास्पद मानसिकता के पोषक के लिए ही है? इनोसेंट ऑफ मुस्लिमस‘ फिल्म भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की परिधि में आती है?


इनोसेंट ऑफ मुस्लिमस फिल्म सिर्फ इस्लाम के विरोध मे ही नहीं है बल्कि दुनिया को संदेश भी देती है। मुस्लिम आबादी की काफिरवाद की धृणा से, बालात मतातंतर-धर्मातंरण से, आतंकवादी मानसिकता के वीजारोपन से, उटंग पैयजामा, घुटने के नीचे तक कुर्ता और छेदा टोपी-अधकटी-अर्धबढ़ी दाढी की संस्कृति से अगाह करती है और आईना दिखाती है कि किस प्रकार अमेरिका, यूरोप और गैर मुस्लिम दुनिया खतरनाक स्थिति में पहुंच चुकी है। यह सब हमारे देश में भी घट रहा है। मुबंई में घट रहा है, मुलायम के राज में घट रहा है, राजस्थान में घट रहा है, बिहार में घट रहा है? कश्मीर से हिन्दू खदेड दिये गये, केरल से हिन्दू खदेड़े जा रहे हैं, असम-कोकराझार की कहानी आपको मालूम ही है।


फिल्म निर्माता का अभिशप्त अनुभव


इनोसेंट ऑफ मुस्लिमस‘ फिल्म के निर्माता ‘नकौला वसीली‘ हैं। नाकौला वसीली कभी मिश्रवासी थे। मिश्र से भागकर अमेरिका पहुंचकर उन्होंने अमेरिकी नागरिकता स्वीकार कर ली थी। नाकौला वसीली ईसाई हैं। नकौला वसीली ने मिश्र में जो कुछ भुगता और जो कुछ देखा वह न केवल खतरनाक, डरावना था बल्कि इस्लाम किस प्रकार से मानवता का दुश्मन के रूप में सामने खड़ा है, इसका भी वह एक गवाह के रूप में दुनिया के सामने मौजूद है। मिश्र की सम्यता कभी दुनिया में चिर्चित थी। अरब से जैसे ही इस्लाम मिश्र में पहुंचा वैसे ही मिश्र की चर्चित सभ्यता का पतन हो गया। इस्लाम के पहुंचते ही गैर इस्लामिक धार्मिक समूहों को जबरन इस्लाम स्वीकार करने के लिए हिंसा, दबाव, शोषण और उपेक्षा की प्रक्रियाएं चलायी गयी। जिस प्रकार से हमारे देश में ‘लव जेहाद‘ मुस्लिम आबादी का चल रही है उसी तरह मिश्र में लव जेहाद जारी है। हाल के वर्षो तक मिश्र की आबादी में ईसाई आबादी अच्छी-खासी संख्या में थी पर अब ईसाई आबादी की संख्या आश्चर्यरूप से घटी है। बड़ी संख्या में ईसाई अपना जीवन बचाने के लिए इस्लाम स्वीकार करने के लिए बाध्य हुए हैं और जो संपन्न थे वे अमेरिका-यूरोप चले गये। इन्ही अनुभवों पर नकौला वसीली ने एक पुस्तक लिखी थी जिस पर उन्होंने ‘इनोसेंट आफ मुस्लिमस नामक फिल्म बना डाली।


फिल्म का कथानक


फिल्म में दिखाया गया है कि मुसलमानों को नहीं मालूम है कि वे क्या कर रहे हैं, और मुसलमान क्यों हिंसात्मक, घृणात्मक, काफिरात्मक और आतंकी जेहाद चला रहे हैं, उन्हें नहीं मालूम। एक शैतान है जो मुसलमानो से हिंसा कराता है, गैर मुस्लिम आबादी से घृणा कराता है, आतंकी हिंसा करता है, तेजाबी मानसिकता के जकड़न में मानवता को कैद कराता है? वह शैतान कौन है? फिल्म में वह शैतान और कोई नहीं बल्कि हजरत मुहम्मद है। वह शैतान हिंसा फैलाता, दंगा कराता है अमेरिकी वल्र्ड टेड सेटर पर हमला कराता है चैचन्या के स्कूल में सैकड़ों अबोध बालकों की हत्या करता है। इस्लाम के नाम दूसरे धर्म के लोगों पर अत्याचार करने वाले, हिंसा करने वाले, आतंक फैलाने वाले और जबरन इस्लाम स्वीकार करान वालों को पुरस्कार देता है,जन्नत में भेजने और मनोरंजन-उपभोग के लिए छोटी-छोटी बच्चियां और हुर यानी लड़के दिलाने का भरोसा,वही शैतान देता है। हजरत मुहम्मद खुद बुढ़ापी में मात्र ग्यारह साल की अपनी भतीजी से शादी की थी और सैक्सतृष्णा को तृप्त किया था। फिल्म में यह दिखाया गया है कि मक्का में जिस पत्थर का मुसलमान पूजा करते हैं वह पत्थर मुसलमानों के पाप और हिंसा से भरा हुआ है। मक्का का वह पत्थर अब काला हो रहा है और जिस दिन मक्का का वह पत्थर पूरी तरह से काला हो जायेंगा उस दिन मुसलमानों का अंत हो जायेगा। फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि मक्का का वह पत्थर आडम को ईश्वर ने उपर से भेजा था जिसे मक्का में कैद कर रखा गया है। कयामत उस दिन जरूर आ जायेगी जिस दिन मक्का का वह ईश्वरीय पत्थर मुसलमानों के पाप से पूरी तरह काला हो जायेगा, पूरा मक्का कीचड़ और मलवों के ढेर में तब्दील हो जायेगा?


इस्लाम की काफिरवादी हिंसा को मिला आधार


इनोसेंट आफ मुस्लिमस फिल्म के कथानक से स्पष्ट होता है कि इस्लाम और मुसलमानों को लेकर कोई नयी प्रस्थापना, कोई नया तर्क, कोई नया खुलासा नही है। इनोसेंट आफ मुस्लिमस के कथानक से दुनिया सिर्फ आज नहीं बल्कि इस्लाम के स्थापना काल से ही अभिशप्त है और भुगत रही है। हजरत मुहम्मद ने तलवार की जोर से इस्लाम फैलाया था? कालांतर में इस्लाम यहूदी और इस्लाम ईसाई संघर्ष भी उल्लेखनीय है। भारत में मुस्लिम आक्रमणकारियो और मुस्लिम सत्ता ने इस्लाम के नाम पर किस तरह से शिक्षा के विश्वप्रसिद्ध स्थल नालंदा, तक्षशिला आदि को जलाया था, नष्ट किया था और हिन्दुओं पर जजिया टैक्स लगायी थी? मुस्लिम देशो में गैर मुस्लिम आबादी को भागने या फिर मुस्लिम बनने मात्र का अवसर दिया जाता है। भारतीय कश्मीर, चैचन्याचीन आदि जहां तर भी मुस्लिम हिंसक आंदोलन चल रहा है वहां पर मुस्लिम आतंकवादियों का तर्क क्या यह नही होता है कि हमें पैगम्बर हजरत मुहम्मद की शिक्षाओं के अनुसार इस्लामिक शासन स्थापित करना है।ं अमेरिकी वल्र्ड टेड सेंटर पर हमला करने वाले आतंकवादी और हमला कराने वाला ओसामा बिन लादेन इस्लाम के दहशतगर्द और पैगम्बर की शिक्षाओं से प्रेरित नहीं थे।


बर्बर हिंसा क्यों?


मुस्लिम आबादी बर्बर होती है। मुस्लिम आबादी अराजक होती है। मुस्लिम आबादी अनियंत्रित होती है। मुस्लिम आबादी के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई मायने नहीं होता है। मुस्लिम आबादी के लिए कानून-संविधान भी कोई मायने नहीं रखता है। वह तो सिर्फ और सिर्फ इस्लाम के कानून और संविधान का आग्रही होती है। यह सब एक बार फिर प्रमाणित हुई है। अगर आप असहमत है तो फिर इनोसेंट आफ मुस्लिमस फिल्म के विरोध में लीबिया में अमेरिकी राजदूत की वीभत्स हत्या, अफगानिस्तान में अमेरिकी ठिकानों पर हिंसक हमला, मिश्र, तुर्की जैसे देशो में मुस्लिम बदरहुट की हिंसा की संस्कृति और प्रक्रिया को देख लीजिये। कुछ समय पहले तक दुनिया भर में मिश्र में मुस्लिम बदरहुड की बहुत तारीफ हुई थी और उसे उदारवाद का प्रतीक बताया जा रहा था। यही मुस्लिम बदरहुड जब इस्लाम और हजरते मुहम्मद की शिक्षाओं की आड मे हिंसा फैलाते हैं तब मुस्लिम बदरहुड और मुस्लिम आबादी विरोध प्रदर्शन करती क्यों नहीं है? इसका जवाब इनोसेंट आफ मुस्लिमस फिल्म के कथानक में ही है।


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षण क्यों नहीं?


अमेरिका ने फिल्म पर प्रतिबध न लगा कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षण देने की अपनी जिम्मेदारी निभायी है और कट्टर, हिंसक मुस्लिम आबादी के सामने झुकने से इनकार कर दिया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मुस्लिम आतंकवाद के दमन के परिपेक्ष्य में यह चाकचैबंद और दूरदर्शी कदम है। पर हमारी मुस्लिम परस्त सरकार ने गूगल को इनोसेंट ऑफ मुस्लिमस फिल्म को प्रतिबधित करने के लिए बाध्य किया है। जबकि भारतीय परिपेक्ष्य में यह फिल्म काफी उल्लेखनीय है और मुबंई, मुलायम राज, राजस्थान, बिहार, केरल जैसी घटनाओं पर आईना दिखाती है। लेकिन हमारी राजनीतिक व्यवस्था को इससे सबक लेने का समय कहां है और न ही विचार है। हम कल मिश्र में ईसाइयों की तरह भारत से भागने या फिर मुस्लिम बनने के लिए बाध्य होंगे।


(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं)