औरों पर नहीं विश्वास खुद भी होते हैं अविश्वसनीय

  • 2014-11-01 04:21:10.0
  • उगता भारत ब्यूरो
औरों पर नहीं विश्वास  खुद भी होते हैं अविश्वसनीय

        यह दुनिया विश्वास और अविश्वास के ध्रुवों के बीच चलायमान है। इसमें इंसान की स्थिति उस पेण्डुलम की तरह है जिसमें उसे खुद को यह भरोसा नहीं होता कि सही क्या है। किस पर विश्वास करे और किस पर नहीं।


        कुछ लोग विश्वास के सहारे जीते हैं, कुछ इससे भी चार कदम आगे बढ़कर अंधा विश्वास कर लेते हैं, कुछ इनसे दस कदम और आगे बढ़कर अंधविश्वास के जंगल में भटकते रहते हैं। इसी प्रकार आदमियों की एक प्रजाति ऎसी है जो अविश्वास में जीती है।


        इस प्रजाति के लोग विश्वस्त लोग तो हमेशा तलाशते रहते हैं मगर ये किसी पर विश्वास नहीं करते।  जो लोग भ्रमों, आशंकाओं और अनिष्ट की आशंकाओं में जीते हैं वे लोग हमेशा शंकाओं और आशंकाओं के बीच जीते-मरते रहते हैं।


        खूब सारे लोग ऎसे होते हैं जिन्हें हमेशा यह भय सताता रहता है कि कोई उनसे कुछ छीन न ले जाए, इसलिए ये लोग हमेशा किसी अज्ञात भय और आशंका में जीते हुए किसी पर विश्वास नहीं कर पाते। ऎसे अविश्वसनीय लोगों की जमातें आजकल हर तरफ पसरी हुई हैं।


        इंसान में सर्वशक्तिमान ने बुद्धि कौशल और विवेक दिया है इसके बावजूद हम सामने वाले लोगों की पहचान कर पाने में विफल रहें तो यह दोष हमारा अपना ही है, किसी और का नहीं।


        पर बहुधा होता यह है कि हम लोग अपने क्षुद्र और तुच्छ स्वार्थों में ऎसे-ऎसे चश्म चढ़ा लिया करते हैं कि हमें हमेशा यह खतरा सताए रखता है कि कोई हमसे कुछ छीन न ले जाए, किसी की दृष्टि हम पर पड़ नहीं जाए।


        इन सभी से अलग एक प्रजाति और है जिसे किसी पर भरोसा नहीं होता। यह अपने ही अपने स्वार्थों में इतने डूबे रहते हैं कि इन्हें और कुछ दिखता ही नहीं। हर दिन इनके लिए सावन की पूनम होता है और हर क्षेत्र हरा-हरा।


        इन लोगों के लिए जीवन भर धन-सम्पत्ति का भण्डार अपने नाम से जमा करते रहना और जायज-नाजायज सभी रास्तों से आवक को बनाए एवं निरन्तर बढ़ाए रखना ही परम ध्येय बना रहता है और यही कारण है कि ये लोग अपनी कोई बात या विचार किसी  के साथ साझा नहीं कर पाते।


        ये लोग अकेले ही पूरा चबा जाने और डकार जाने के आदी होते हैं और इसलिए शंकाओं और आशंकाओं के मारे ये किसी पर विश्वास नहीं कर पाते हैं। इस किस्म के लोग अव्वल दर्जे के शंकालु भी होते हैं और इनकी जिन्दगी का आधे से ऊपर हिस्सा शंकाओं के मकड़जाल को सुलझाने या उलझाने में ही लग जाता है।


        खूब सारे लोग ऎसे अविश्वासी हैं  कि छोटी से छोटी और अपने लिए नाकारा बातों और कामों पर भी परदा डालने के आदी होते हैं। ऎसे लोग जहां किसी क्षेत्र में काम करते हैं वहाँ किसी पर तनिक भी विश्वास नहीं करते। यहाँ तक कि साझा करने और साथ काम करने वाले लोगों को भी अंधेरे में रखने में इन्हें महारत हासिल होती है।


        ये अविश्वासी लोग अपने आपको शातिर समझने के साथ ही कई बार खुद भी उलझनों के मकड़जाल में ऎसे फंस जाते हैं कि इन्हें कई दिनों तक नींद नहीं आती, कई-कई घण्टों की माथापच्ची के बाद भी ये रास्ता नहीं तलाश पाते हैं।


        अनिद्रा और षड़यंत्रकारी सोच, नकारात्मक विचारों से भरा-पूरा आभामण्डल लिए ये लोग सड़े हुए महूओं की बोरियों की तरह लगते हैं जिनके न नाक-नक्श का कोई आकर्षण है न शरीर का।


        मौजूदा युग में विश्वासहीनता की गाजर घास सर्वत्र इतनी पसरी हुई है कि हर तरफ यही दिखाई देती है। इसके अलावा और कुछ नज़र नहीं आता। सर्वाधिक संकट विश्वास का है। और वह भी इंसान और इंसान के बीच। कलियुग में इससे बड़ी त्रासदी और कुछ नहीं हो सकती।


        खूब सारे ऎसे लोग अपने आपको सिद्ध मानते हुए इतने आगे बढ़ गए हैं कि अब विश्वास का नामोंनिशान तक नहीं रहा। दुर्भाग्यश् यह है कि किसी पर विश्वास न करने वाले लोग  दूसरों से विश्वास तलाशने की इच्छा रखते हैं।


        जो लोग किसी पर विश्वास नहीं  कर सकते,  वे वही लोग होते हैं जिनसे विश्वास की किसी भी परिमाण में उम्मीद नहीं की जानी चाहिए।  ऎसे लोग अव्वल दर्जे के अविश्वासी होने के साथ ही विश्वासघाती और कृतघ्न भी होते हैं। मौका पड़ जाने पर ऎसे लोग अपनी पत्नी, बच्चों, भाई-बहनों, माता-पिता और किसी भी खून के रिश्ते तक को कलंकित कर सकते हैं।


        आज ऎसे अविश्वासी लोगों को जानने की आवश्यकता है ताकि इनकी हरकतों को देख कर यह अच्छी तरह समझा जा सके कि विश्वासहीन और विश्वासघाती लोग अपने स्वार्थ के लिए  किस हद तक नीचे गिर सकते हैं।