कांग्रेस में नेता बदलें या नीति?

  • 2014-10-29 07:11:29.0
  • डॉ0 वेद प्रताप वैदिक
कांग्रेस में नेता बदलें या नीति?

पी चिदंबरम ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया। उन्होंने कह दिया कि कांगेस में से माँ-बेटा राज खत्म भी हो सकता है। उनके इस दुस्साहिसक बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देखी जा रही है। क्यों नहीं देखी जा रही है? क्योंकि सभी कांग्रेसी मजबूर हैं। वे क्या करें? उन्हें पता है कि सोनिया और राहुल के बिना उनका काम एक दिन भी नहीं चल सकता। यह वैसा ही है जैसा कि किसी लकवाग्रस्त यात्रियों की बस की भयंकर दुर्घटना हो जाए और उनमें से एक यात्री यह इच्छा व्यक्त करने लगे कि इस बस के ड्राइवर और कंडक्टर को बदल दिया जाए। उस पूरी बस में सभी लकवे के मरीज है, सिर्फ ड्राइवर और कंडक्टर के अलावा! यदि आप दोनों को बदल दें तो बदल दें लेकिन फिर असली सवाल यह है कि उस बस को चलाएगा कौन? क्या लकवाग्रस्त यात्रियों में से कोई यात्री उसे चला सकता है? क्या किसी भी एक यात्री को आप ड्राइवर की सीट पर बिठा सकते है? नहीं! तो फिर बेचारे कांग्रेसियों को क्यों दोष दे रहे हैं कि वे कुछ करते क्यों नहीं?

सारे कांग्रेसी उस तथ्य को बखूबी जानते हैं, जिसे सारा देश जानता है। वे उस तथ्य को देश से भी ज्यादा जानते है, क्योंकि वे भुक्तभोगी हैं। देश सिर्फ दूर से जानता है। दूर से दर्शन करता है। लेकिन कांग्रेसी कार्यकर्ता तो अपने भौंदू बाबा की कलाकारी नजदीक से रोज देखते हैं। वे सब सत्ता प्रेमी है। वे सत्ता का सुख भोगते रहें, बस उनकी मनोकामना इतनी ही है। उनका नेता भौंदू है, मसखरा है, अधकचरा है, लल्लू है, तो क्या हुआ? सबको आदत पड़ गई है उसे दंडवत करने की। जी हुजूरी करने की, खुशामद करने की, नवनीत-लेपन की। अब सत्ता चली गई और चलती जा रही है, खिसक रही है तो भी कार्यकर्ता क्या करें? वे अपनी पुरानी आदत के गुलाम हो गए हैं। वे अपनी ही आदत के खिलाफ बगावत नहीं कर सकते। नेता के खिलाफ बगावत करने का तो सवाल ही नहीं उठता।

मानो यह लेख पढ़कर उनका अंतःकरण जाग जाए और वे बगावत कर ही दें तो क्या होगा? वे एक-दूसरे की टांग खीचेंगे और कांग्रेस पार्टी के हजार टुकड़े हो जाएंगे। ऐसा होना देश का दुर्भाग्य होगा। हमारा लौकतंत्र डूबतखाते लग जाएगा। तो क्या किया जाए? नेता बदलने की बजाए नीति बदलें। कांग्रेस को सिर्फ सत्ता के काम में नहीं, सेवा और परिवर्तत के काम में लगाएं। गांधी, नेहरू और लोहिया के कार्यक्रमों में जुटाएं। पार्टी तो जिंदा हो ही जाएगी, यह सड़ा-गला नेतृत्व ही चमक उठेगा। कांग्रेस जिंदा पार्टी बनी नहीं कि उसका लकवा खत्म हो जाएगा। संघर्षां की खुराक पर पलने वाली पार्टी लकवाग्रस्त रह ही नहीं सकती। देश का लोकतंत्र भी सुरक्षित हो जाएगा।