मोहन भागवत की चेतावनी

  • 2014-10-27 08:44:11.0
  • डॉ0 वेद प्रताप वैदिक
मोहन भागवत की चेतावनी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने लखनऊ में क्या पते की बात कही है। वे संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा ‘जब तक समाज साथ में खड़ा नहीं होता, नेता, नारा, पार्टी, सरकार और चमत्कार से समाज का भला नहीं हो सकता।’ इस कथन का अभिप्राय क्या है? बहुत गहरे अर्थ हैं, इसके! सबसे पहला तो यह कि राज्य के मुकाबले समाज बड़ा है। लोग राज्य की चकाचौंध में ऐसे फंस जाते हैं कि वे समाज को भूल जाते हैं।


समाज तो हिमखंड की तरह होता है। हिमखंड का तीन-चौथाई भाग पानी के अंदर होता है और एक-चौथाई पानी के बाहर! जो बाहर होता है, वह राजनीति है और जो अंदर होता है, वह समाज है। हम राजनीति को इतना अधिक महत्वपूर्ण मानने लगते हैं कि पूरी तरह उस पर निर्भर हो जाते हैं। हम समझते हैं कि समाज की सारी बुराइयां कानून से दूर हो जाएंगी। सरकार चाहेगी तो पृथ्वी पर स्वर्ग उतार लाएगी। प्रधानमंत्री देश का सबसे बड़ा आदमी है। उसकी शक्ति और प्रभाव से सब कुछ बदला जा सकता है। चमत्कार हो सकता है। मोहन भागवत के बयान से यह नादानी दूर होती है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया है कि किसी नेता तो क्या, कोई पार्टी और कोई सरकार भी समाज का भला नहीं कर सकती। समाज का भला करने के लिए समाज को ही जगाना पड़ेगा। यह काम संघ, आर्य समाज, सर्वोदय, रामकृष्ण मिशन जैसी संस्थाएं ही कर सकती हैं।


सरकार और नेतागण सिर्फ परिस्थिति बदलने पर जोर देते हैं जबकि समाज-परिवर्तन के लिए लोगों की मनःस्थिति बदलना जरुरी होता है। मोहन भागवत के इस कथन को चेतावनी की तरह भी समझा जा सकता है। इस समय जबकि सारा मीडिया भाजपा-भाजपा, मोदी-मोदी और अमित शाह-अमित शाह की माला जप रहा है, मोहनजी का कहना है कि ऐ, देश के लोगों तुम इस चमकीले ढक्कन (हिरण्यमयेन पात्रेण) से गुमराह मत हो जाना। ये राजनीति तो सिर्फ ढक्कन है, सत्य का अमृत जिस घड़े में भरा है, उसका नाम समाज है। यहीं बात उन्होंने संघ के बेंगलूर अधिवेशन में कही थी कि ‘नमो-नमो का जाप करना मेरा काम नहीं है।’ संघ का लक्ष्य किसी नेता या पार्टी के प्रति समर्पित होना नहीं है, बल्कि भारतीय समाज को वर्चस्वी और तेजस्वी बनाना है। देश-पूजा सर्वोपरि है, पार्टी-पूजा या नेता पूजा नहीं।