कुछ कहना चाहते हैं अपने लोग

  • 2014-10-18 04:11:54.0
  • डॉ. दीपक आचार्य
कुछ कहना चाहते हैं अपने लोग

आजकल अपने लोगों को अपनी बातें कहने के लिए अपने लोग नाकाफी या नाकाबिल दिखने लगे हैं। हम न अपने लोगों के पास रहना चाहते हैं, न अपने लोगों को सुनना चाहते हैं। जो अपने हैं उनके सुख-दुःखों में न हिस्सा बँटाना चाहते हैं, न किसी के काम ही आना चाहते हैं।


हमें न अपने लोगों की पड़ी है, न अपने लोगों की कोई चिंता। वो जमाना बीत गया जब हम अपने आस-पास के लोगों के चेहरों को देख कर उनकी मानसिक अवस्था का अंदाज लगा लिया करते थे और उनके कष्टाें के निवारण के लिए जी जान एक कर दिया करते थे।


आजकल हमें यह तक नहीं पता कि जिन लोगों को हम अपने कहते या मानते हैं वे किस हालात में हैं, उन्हें क्या दुःख या जरूरत है, उनकी पीड़ाएं, वेदनाएं और व्यथाएं क्या-क्या हैं, वे किन मानसिक अवसादों या शारीरिक कष्टों में दिन गुजार रहे हैं और उन्हें हम किस प्रकार संबल दे सकते हैं।


हम सारे के सारे लोग मानवीय संवेदनाओं को भुलाते जा रहे हैं। कुछ लोग आज भी ऎसे जरूर हैं जिन्हें मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं का पर्याय या प्रतीक कहा जा सकता है लेकिन हम जैसे अधिकांश लोगों की स्थितियां कमोबेश एक जैसी ही हैं। मानवीय संवेदनाओं, पीड़िता मानवता की सेवा, परोपकार से लेकर सारे आदर्शों की थोथी बातें कहने में हम कभी पीछे नहीं रहते।


इसी तरह सेवा और मानवता या श्रेय पाने के कामों में हम दिखावा करने में इतने अधिक माहिर हो गए हैं जितने की प्रोफेशनल नौटंकीबाज भी नहीं होंगे। सिर्फ दिखावा ही दिखावा करने में हम आगे रहते हैं, वास्तविक सेवा या परोपकार अथवा पीड़ित मानवों की भलाई की बातों में हम फिसड्डी ही हैं।


आजकल हमारी सेवा नाम और यश पाने तक ही सीमित रह गई है। हम जो कुछ करते हैं उसका मूल उद्देश्य और लक्ष्य सिर्फ लोक दिखावन और पब्लिसिटी प्राप्ति से कहीं कुछ अधिक नहीं है। हम अपने घर-परिवार वालों, नाते-रिश्तेदारों और पड़ोसियों या अपने इलाके के लोगों के लिए जो कुछ कर रहे हैं उसमें भी पूरी और पक्की औपचारिकता के सिवा कुछ नहीं है। इनमें न पुण्य या परोपकार की कोई गंध है, न सामाजिक और वैयक्तिक उत्तरदायित्वों का भान।


हम जो कुछ करते हैं वह मन से नहीं बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि सब करना पड़ता है, और न करें तो जमाना हमारे बारे में चर्चाएं कर सकता है, इसका भय हमारे दिमाग में घुसा हुआ है।  कोई नहीं देख रहा हो, तो हम न सेवा करें, न परोपकार।


हममें से कितने लोग ऎसे हैं जो अपनी सेवा या परोपकार वृत्तियों को गोपनीय तरीके से पूरी करते हैं, इसका उत्तर मानवता और हमें लज्जित करने को काफी है। हम कुछ भी करते हैं उसके पहले कैमरों और मीडिया का प्रबन्ध करते हैं और तभी कुछ सेवा कार्य करते हैं जबकि पब्लिसिटी की भरपूर संभावनाएं बनती दिखाई दें।


बाहरी चकाचौंध के महा आकर्षण फोबिया से घिरे हम लोगों ने लोकेषणा के फेर में अपने उन लोगों को उपेक्षित कर रखा है जो दिन-रात हमारे आस-पास या साथ रहते हैं और जिन्हें हमसे आत्मीयता की अपेक्षा है, वे चाहते हैं कि अपने मन की बात खुलकर हमारे सामने कहें, दुःख-दर्द बयाँ करें और अपने अनुभव हमसे साझा करें।


यह कौटुम्बिक प्रेमभाव और गहन आत्मीयता भुलाकर हम बाहरी संबंधों की मृगमतृष्णा में ऎसे भटकने लगे हैं जहाँ न शाश्वत संबंधों का पानी है, न कोई ऎसी डगर जिसे लक्ष्य मानकर सुकून का अहसास हो। हर डगर आरंभ में लगती है कि हमारा सुकूनदायी साधन हो सकती है लेकिन कुछ समय बाद ही हमारा भ्रम टूटने लगता है। हम थोड़े समय खिन्नमना रहकर फिर नई डगर की तलाश करते हैं और इस तरह डगर-दर-डगर मृगमरीचिका में भटकते हुए हम अपने उन आत्मीय संबंधों के तमाम स्रोतों को उपेक्षित करते हुए भुला डालते हैं जो हृदय में हमें चाहते हैं, हमारे लिए जीना, और हम पर मरना चाहते भी हैं, जानते भी।


आजकल तकरीबन सभी लोगों की यही स्थिति सामने आ रही है। दूर के ढोल अच्छे और पहाड़ सभी के सुहावने लगते हैं मगर पास जाकर देखें तो पता चलता है कि ढोल दूसरी ओर से पोलमपोल है और पहाड़ों पर बिखरी हरियाली कृत्रिम।


यही कारण है कि हम सुकून की तलाश में अपने आस-पास देखते हैं और जब महसूस करते हैं कि सारी खिड़कियाँ और दरवाजे बंद हैं तब हमारी तलाश दूर-दूर होने लगती है और हम जो भी कुछ अच्छा दिखता है, उस तरफ आकर्षित होकर अपने मन की बात कहने को उतावले होने लगते हैं।


ईश्वरीय अनुकंपा हो तब इनमें भी हमें अपार सुकून मिलने लगता है और ऎसा आनंद प्राप्त हो जाता है जिसकी कल्पना हमने कभी नहीं की हुई होती है। कई बार ऎसा प्रोत्साहन, संबल और मार्गदर्शन प्राप्त हो जाता है जो हम कई जन्मों में भी प्राप्त कर पाने की आशा नहीं रख सकते हैं और ऎसे में दिल इतना खुला हो जाता है कि भीतर कुछ रहता ही नहीं।


ज्यों-ज्यों चित्त खाली होता जाता है, खालीपन आता जाता है, त्यो-त्यों दिव्य और दैवीय तत्वों का प्रवेश हमारे चित्त में होने लगता है। लेकिन सभी के साथ ऎसा हो ही, यह जरूरी नहीं है। इसलिए संबंधों के मामले में हमेशा ईश्वर को हाजिर-नाजिर मानें और उन्हीं के भरोसे संबंधों की नदी का अवगाहन करें।


ऎसा होने पर जिन लोगों से हमें कुछ पाना होता है, जो शुचितापूर्ण और सात्ति्वक होते हैं, हमारे लिए कल्याणकारी होते हैं वे ही हमारे पास रह पाते हैंं। कुटिल और लोभी-लालची मनोवृत्ति वाले स्वार्थी लोग अपने पास आकर भी निकट नहीं रह पाते हैं। ईश्वर ऎसे लोगों को सायास, किसी न किसी बहाने हमसे दूर कर ही देता है।


लेकिन ऎसी स्थिति आए ही क्यों कि अपने लोगों को अपनी मन की बात कहने और दिल हल्का करने के लिए बाहरी तलाश करनी पड़े। अपने स्वभाव को बदलें तथा जिन्हें हम अपना मानते हैं, जो लोग हमें अपना मानते हैं उनके लिए हमेशा समय निकालें, उन्हें इस सीमा तक तसल्ली के साथ सुनें कि वे मन की पूरी बात हमारे समक्ष उण्डेल दें और फिर उन लोगों को यथोचित राय, प्रोत्साहन और संबल दें और इस  भावना के साथ मददगार बनें कि ये हमारे अपने हैं और उनकी तरक्की हमारी खुशहाली है। वे जितने आगे बढ़ेंगे, जितनी उपलब्धियां पाएंगे, उतनी हमें ही प्रसन्नता होगी। क्योंकि हैं तो वे आखिर अपने ही। ऎसा स्वभाव हमने पाल लिया तो फिर स्वर्ग यहीं पर महसूस होने लगेगा। न कोई दुःखी रहेगा, न आप्त। सब लोग भीतर से इतने खाली होंगे कि दिव्यता के ताजे कतरे हमेशा  आनंद के गीत सुनाते प्रतीत होंगे।


 इसका यह आशय कदापि नहीं है कि हम अपनों ही अपनों के लिए काम आएं। जो इंसान एक बार प्रेम, आत्मीयता और मानवीय संवेदनाओं को अंगीकार कर लेता है, फिर उसके लिए कोई दूसरा नहीं रह जाता, वह सभी के प्रति एकात्मता, समरसता, करुणामूलक प्रेम, दिली संवेदनाएं और सहयोगी भावना रखता है। समाज में आज इन्हीं सकारात्मक कौटुम्बिक भावनाआेंं के प्रसार की आवश्यकता है।