तोप की आवाज़ आने तक प्राण नहीं निकलेंगे !!

  • 2014-07-08 09:26:47.0
  • उगता भारत ब्यूरो

baji prabhu desh pandey

विशाल गोलानी

मित्रों यह अनुपम कथा उस पराक्रमी योद्धा की है, जिसने हिन्दू स्वराज के सूर्य छत्रपति शिवाजी महाराज की रक्षा में अपने प्राणों की बाज़ी लगा दी | केवल 300 जवानों के साथ उसने 10 गुना फ़ौज को रोके रखा,जब तक शिवाजी राजे सुरक्षित स्थान पर नहीं पहुँच गए |उस वीरवर का नाम था "बाज़ी प्रभु देशपांडे" और गजापुर की घाटी में उसने त्याग और बलिदान, शौर्य और पराक्रम की अदभुत गाथा लिखी|
स्वराज-संस्थापन के पवित्र कार्य में लगे शिवाजी महाराज बीजापुर के एक बाद दूसरा किला जीतते जा रहें थे| अदिल शाह ने क्रूर अफज़ल खां को शिवाजी के खिलाफ भेजा तो प्रतापगढ़ के नीचे महाराज शिवाजी महाराज ने बघनखे से उसका पेट फाड़ दिया | इसके बाद बीजापुर की सेना पस्त हो गई | अफज़ल खां के वध के बाद केवल 18 दिनों में स्वराज की सेना ने 21 किलों पर भगवा फेहरा दिया| आखिर लम्बे सोच विचार के बाद सुल्तान ने खूंखार सिद्धि जोहर को शिवाजी को मारने का जिम्मा सोंपा|
30 हज़ार की विशाल सेना लेकर सिद्धि जौहर शिवाजी महाराज को जिंदा पकड़ने के उद्देश्य से निकला | शिवाजी को उसकी प्रत्येक गतिविधी की सूचना मिल रही थी | उसने पन्हालगढ़ के दुर्ग में मोर्चेबंदी कर ली| सिद्धि ने पन्हालगढ़ का घेरा डाल दिया,ऐसा मजबूत घेरा कि न कोई किले से बहार आ सके और न ही कोई किले में जा सके |बीजापुर सुल्तान अदिल शाह की सेना ने कई बार किले पर हमला भी किया पर मावले सैनिको की मार खाकर सेना वापस लौट आई | सिद्धि ने अब सिर्फ घेरा डालकर पड़े रहने की रणनीति अपनाई|
पन्हालगढ़ के घेरे को चार महीने हो गए|इस बीच स्वराज के सेनानी पालकर ने सिद्धि जौहर पर हमला भी किया लेकिन वे सिद्धि की घेराबंदी को तोड़ नहीं पाए|अब महाराज ने किले से बहार निकलने की योजना बनाई |
12 जुलाई 1660 के दिन किले का दरवाजा खुला और उसमे से शिवाजी के दूत गंगाधर पन्त निकले | वे सीधे सिद्धि जौहर से मिले और महाराज का एक पत्र उसे दिया|पत्र में लिखा था-शिवाजी महाराज कल शाम सिद्धि के सामने आत्मसमर्पण कर देंगे |पत्र में अपनी सुरक्षा का वचन भी महाराज ने माँगा था | सिद्धि फूला नहीं समां रहा था उसने तुरंत हामी भर दी | शीघ्र ही यह समाचार पूरी छावनी में फ़ैल गया| परिणाम यह हुआ की घेरा कुछ ढीला पड़ गया | पन्हालगढ़ के पीछे की ओर बहार निकालनेका एक बड़ा कठिन रास्ता था |
सीधी उतराई थी,ज़रा पैर फिसला नहीं की गिरे सीधे खाई में,महाराज ने उसी रात उस रस्ते से बहार निकलने का निश्चय किया|बाजीप्रभु देशपाण्डेय की अगुवाई में 600 देशभक्ति मावलो के साथ महाराज किले से बहार निकले |साथ में दो पालकियां भी थी| आसमान में बदल गरज रहें थे कभी बूंदा बंदी होती थी तो कभी रुक जाती थी | बहार निकलने के रस्ते में फिसलन हो गई |लेकिन वर्षा से सिद्धि का घेरा भी कुछ और ढीला पड़ गया |

छः सौ मावले शिवाजी को पालकी में बैठाये बड़ी सावधानी से चल रहें थे | धीरे धीरे घेरा पार हो गया,लेकिन घेरे से बहार गश्त लगाती एक बीजापुर की टुकड़ी को पता चल गया | उन्होंने तुरंत छावनी में जाकर सिद्धि को जगाया और शिवाजी के निकलने की सुचना दी| सिद्धि के हाथो के तोते उड़ गए | घबराहट में उसने मसूद से कहा - दौड़ो तीन हज़ार सिपाही साथ लो और शिवाजी को पकड़ लाओ ! मसूद फ़ौरन तीन हज़ार सैनिको को लेकर शिवाजी का पीछा करने लगा !!
उधर मावलो को भी शक हो गया,कि उनका निकलना गुप्त नहीं रहा | तुरत फुरत एक मावला शिवाजी महाराज के वस्त्र पहनकर दूसरी पालकी में बैठ गया और दस बारह मावले उस पालकी को उठाकर दुसरे रस्ते से चल पड़े |

मसूद को छावनी से निकले काफी समय हो गया था अचानक उसने मशालों की रौशनी में देखा कुछ मावले पालकी उठाये तेज़ी से चल रहें हैं | उसने समझा की वही शिवाजी हैं , उसके तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गई | पालकी को घेरे में ले छावनी की ओर चल पड़ा | वहां पहुच कर मसूद को पता चला की उस रात शिवाजी ने उसे दूसरा करार झटका दिया है |मन ही मन गालियाँ देता वह फिर छावनी से सनके साथ निकला |
तब तक सुबह होने लगी थी | घोड़े दौड़ता वह काफी दूर निकला तो सुबह के प्रकाश में उसने बहुत से पैरों के निशान देखे | वह उनका पीछा करने लगा |

पन्हालगढ़ के पास का विशालगढ अभी कोई 10 कि.मी. दूर था|दौड़ते भागते मावले गजापुर की घाटी तक जा पहुंचे , वहां से उन्हें दूर बीजापुर की फ़ौज आती दिखाई दी| बाजिप्रभू ने आनन् फानन में फैसला कर लिया वह तीन सौ साथियों के साथ मसूद को घाटी में रोकेगा बाकी तीन सौ मावलों के साथ शिवाजी विशालगढ चल पड़ेंगे |उन्होंने अपनी योजना महाराज को बताई तो शिवाजी महाराज सोच में पड़ गए |बाजीप्रभु ने शीघ्रता से कहा - महाराज आप विचार न करें , आप नहीं रहें तो स्वराज का सूरज डूब जायेगा और यदि बाजीप्रभु नहीं रहा तो शिवाजी पचासों और बाजीप्रभु तैयार कर लेंगे इसलिए आप आगे बढ़े |विशालगढ पहुंचकर तोप दाग दें |जब तक तोप की आवाज़ नहीं आयेगी बीजापुर की फ़ौज यहाँ से आगे नहीं बढ़ पायेगी |
शिवाजी वहां से निकल पड़े|इधर बाजीप्रभु ने 300 सैनिको के साथ गजापुर घाटी के मुहाने पर मोर्चा जमा लिया और जोर से "हर-हर महादेव" की गर्जना की | मसूद अब नजदीक आ गया था उसके सैनिको ने भी अल्लाह-हो-अकबर का नारा लगया | अब क्या था लोहे से लोहा बजने लगा , घाटी मुहाना संकड़ा था , बीजापुर की टुकडियां एक एक कर आने लगी और घाटी में घुसने के प्रयत्न में खुदा को प्यारी होने लगी |
भीषण युद्ध होने लगा,मावले रात भर के थके थे और लड़ते लड़ते दोपहर होने लगी थी|लेकिन कहीं कोई ढिलाई नहीं कहीं सुस्ती नहीं,मन में एक ही संकल्प कि महाराज के सुरक्षित होने तक बीजापुर की फ़ौज को यहीं रोके रखना है | बाजीप्रभु दोनों हाथो में तलवार चलते हुए मनो साक्षात् रूद्र का अवतार बने हुए थे| पर एक का दस से मुकाबला आखिर कितनी देर चलता ,बाजीप्रभु के साथियों की संख्या कम होने लगी लेकिन बचे हुए मावले दोगुने जोश से युद्ध करने लगे|
बाजीप्रभु के शरीर पर कई घाव लग चुके थे , उनके सैनिक अब थोड़े ही बचे थे | बाजीप्रभु को चरों ओर से घेर लिया गया |उन्होंने फिर "हर - हर महादेव" की गर्जना की और टूट पड़े मुघलों की सेना पर | काफी रक्त निकल चूका था पर उनके हाथ तलवार चला रहें थे और कान तोप की आवाज़ की ओर लगे थे |
तभी जोर से तोप की आवाज़ आई - धांय धांय धांय | बाजीप्रभु का के मन में आनंद छा गया | शिवाजी महाराज सकुशल पहुच गए अब इस नश्वर शरीर का भी क्या काम यह सोचते हुए एक बार फिर उन्होंने "हर-हर महादेव" कहा और निष्प्राण हो युद्धभूमि में गिर पड़े|
तीन हज़ार की फ़ौज के बाद भी मसूद एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पाया था| तोप की आवाज़ से वह भी समझ गया की शिवाजी सुरक्षित विशालगढ पहुँच गए हैं , आगे जाना निरर्थक समझ कर वह भी अपनी छावनी में लौट गया |
विश्व के सैनिक इतिहास में में यह विलक्षण कारनामा है कि तीन सौ सैनिको ने तीन हज़ार की सेना को दिन भर रोके रखा !!!!!