मनुष्य का आदिम ज्ञान और भाषा-21

  • 2014-06-04 02:21:38.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

18opi3गतांक से आगे.....
इसको स्वर्ग ऊपर भेजने वाले विश्वामित्र ही थे। इसलिए इस त्रिशंकु के नीचे ही, दक्षिण में विश्वामित्र नामी नक्षत्र होना चाहिए। क्योंकि उत्तर स्थित वशिष्ठ और दक्षिण स्थित विश्वामित्र के दिशाविरोध से ही वशिष्ठ और विश्वामित्र का विरोधालंकार प्रसिद्घ हुआ है। इन कौशिक अर्थात विश्वामित्र का वर्णन वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 80 में है।
यहां हम एक प्रमाण इन कौशिक के विषय का वेद से देते हैं जिससे प्रकट हो जाएगा कि वे पृथिवी की वस्तु नही है।
महां ऋषिर्देवजा देवजूतोअस्त भ्नात्सन्धुमर्णवं नृचक्षा:।
विश्वनामित्रो यदवहत्सुदासमप्रियायत कुशकेभिरिन्द्र:।
इन मंत्र में कुशिक विश्वामित्र का नाम है ऋषि भी कहा गया है, परंतु यह भी कहा गया है कि आकाश को रोकता है। इसके आगे कहा गया है कि इंद्र कुशिक के द्वारा सुदास का नुकसान करता है। सब जानते हैं कि इंद्र मनुष्य नही हैद्घ यहां इंद्र सूर्य अर्थ में ही है, इसलिए इस मंत्र का यही भाव होता है कि सूर्य, कुशिक नामक नक्षत्र के द्वारा सुदास नामक किसी आकाशीय पदार्थ का नुकसान करता है। सुदास को भी लोग रोजा कहते हैं, पर यहंा वह भी कुछ आकाश ही से संबंध रखने वाला पदार्थ ज्ञात होता है। इस तरह से विश्वामित्र कौशिक और वशिष्ठ आदि सब नक्षत्र ही ज्ञात होते हैं, मनुष्य नही-देहधारी ऋषि नही।
कण्व: कक्षीवान पुरूमीढी अगस्त्य: श्यावाश्व: सौभर्यर्चनाना:।
विश्वामित्रोअयं जमदग्निरत्रिरवन्तु न: कश्यपो वामदेव:।।
विश्वामित्र जमदग्ने वसिष्ठ भरद्वाज गौतम वामदेव।
शर्दिनो अत्रिरग्रभीन्मोभि: सुसंशास: पितरो मृडता न:।।
इन दो मंत्रो में तमाम ऋषियों के नाम गिना दिये गये हैं, पर अंत में कह दिया गया है कि सुसंशास: पितर: अर्थात ये प्रशंसा करने योग्य पितर है। ये पितर सूर्य चंद्र की किरणों के अतिरिक्त और कुछ दनही है। इस विषय पर अथर्ववेद का यह मंत्र प्रकाश डालता है।
अत्रिवदु: क्रिमयो हन्मि कण्डवत मदग्निवत।
अगस्त्यस्य ब्राह्मणा सं पिनष्म्यहं क्रिमीन।
अर्थात हम अत्रि कण्व, जमदग्नि और अगस्त आदि की तरह कीड़ों को मारते हैं। अब देखना है कि ये अत्रि आदि कौन है? और क्रिमियों को कौन मारता है? ऋग्वेद 5/40/8 में लिखा है कि अत्रि सूर्यस्य दिवि चक्षुराघात अर्थात अत्रि सूर्य से संबंध रखता है। दूसरी जगह ऋग्वेद 5/51/8 में कहा गया है कि आ आ याहुग्ने अत्रिवत अर्थात हे अग्नि तुम अत्रि की तरह आओ। सूर्य से संबंध रखने वाले और अग्नि की तरह आने वाले तथा कीड़ों को मारने वाले ये अत्रि आदि पितर किरण नही है तो और क्या है? अथर्व 2/32/1 में तो स्पष्टï ही लिखा हुआ है कि आदित्य: क्रिमीन हन्तु निभ्रोचन हंतु रश्मिभि: अर्थात सूर्य उदय होकर अपनी रश्मियों से क्रिमियों को मारता है। कितना स्पष्टï वर्णन है? इस वर्णन से सब अच्छी तरह समझ में आ गया कि अत्रि, कण्व और जमदग्नि आदि सब रश्मियां ही हैं, जो कीड़ों को मारती हैं। इसलिए ऊपर कहे हुए पितर नामी समस्त ऋषि मनुष्य नही प्रत्युत किरणें ही हैं और रोग जंतुओं का नाश करने वाली है। वर्तमान कालीन डॉक्टर भी मानते हैं कि सूर्य रश्मियों से हर प्रकार के रोग जंतु नष्टï हो जाते हैं। वेदों में नक्षत्र और किरणवाची सैकड़ों प्रमाण हैं जो ऋषियों के नाम से कहे गये हैं, पर यहां हम विस्तारमय से बहुत न ही लिखते।
ये तमा ऋषि जिस ब्राह्मïण राजा के राज्य में रहते हैं उसका भीवर्णन वेद में सुंदर रीति से इस प्रकार किया गया है।
विप्रराज्य अर्थात चंद्रराज्य
अयं सहस्रं ऋषिभि: सहस्कृत: समुद्र इव पप्रथे।
सत्य: सो अस्य महिमा गुणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये।
यहां हजारों ऋषियों को विप्रराज्य अर्थात चंद्रमा के राज्य में बसने वाले कहा है। चंद्रमा को विप्र और द्विवराज आदि कहते ही हैं। चंद्रोदय में ही-रात्रि में ही नक्षत्रों का प्रकाश हेाता है। चमकने वाले सभी तारों में चंद्रमा अधिक विशाल और तेजस्वी है। अत: उसे सबका राजा कहा है कि शीतल होने से विप्र कहा गया है।
क्रमश: