मनुष्य का आदिम ज्ञान और भाषा-8

  • 2014-02-08 04:22:47.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

imagesगतांक से आगे....
आगामी धर्म
संसार में फेले हुए समस्त मतमतांतरों की आलोचना करता हुआ, एक विद्वान नामी पुस्तक में कहता है कि आगामी धर्म वैदिक धर्म ही होगा। अब संसार ईमान के दुर्ग से निकलकर बुद्घि और तर्क की ओर चल रहा है। जब तक मजहबी सिद्घांत को तत्वज्ञान पुष्ट न करे, तब तक वह स्थिर नही हो सकता। क्योंकि तर्क अपने ही सहारे पर खड़ा होता है। चाहे संसार का भूत इतिहास कैसा ही क्यों न हो, भविष्यकाल तो बुद्घि और तर्क का ही है। ज्यों ही अंधाधुंध विश्वास और ईमान का स्थान तर्क और दलील ने लिया, संसार के आने वाले धर्म का प्रश्न हल हो जाएगा। तर्क के सम्मुख कोई करामात, चमत्कार अथवा कोई भी अराफात जो सृष्टि के विरूद्घ हो नही ठहर सकता। तर्क सब प्रकार की पूजा की विधियों को हटा देता है। केवल वही उपासना रह जाएगी, जो बुद्घि के अनुकूल होगी। आगामी धर्म में सदाचार का अधिक गौरव होगा और वह अधिकांश हिंदू धर्म के आदर्शों के अनुसार ही होगा। यदि ईसाई धर्म के मौजवान के चमत्कारों को निकाल दिया जाए इसके खड़े होने के लिए पांच नही रहते पर यदि हिंदू धर्म से मूर्तिपूजा हटा दी जाए तो वह बुद्घि और तर्क के अनुकूल हो जाता है। वैदिक धर्म का वास्तविक रूप प्रकट हो जाता है और संसार भर के मानने योग्य हो जाता है।
ऋषियों का आश्रय
योरप के लोग केवल बातें ही नही बनाते प्रत्युत उन लोगों ने वैदिक ऋषियों का सा जीवन बनाना भी आरंभ कर दिया है। यहां हम उसका एक नमूना देकर इस प्रकरण को समाप्त करेंगे। ता. 21वीं अक्टूबर 1928 के गुजराती जीवन में महात्मा गांधी लिखते हैं कि ऋषियों का आश्रम शीर्षक का निम्नलिखित एक लेख दीनबंधु एण्डरूज ने योरप भेजा है जो यंग इण्डिया में छपा है। उसमें उन्होंने जर्मनी के मार्बर्ग नामक शहर में स्थापित विद्यापीठ 'ऋषि आश्रम' के नाम से लिखा है। इसमें ऋषिजीवन बिताने वाले एक बुजुर्ग अध्यापक का वर्णन है, जो जानने लायक है। मार्बर्ग विद्यापीठ में वेदों की शिक्षा की बहुत ऊंची स्थिति है। इन पठनपाठन करने वाले अध्यापकों के जीवन पर वेदों ने इतनी गहरी छाप डाली है कि वे लोग ऋषियों के से आचार का पालन करते हैं। इन अध्यापकों के अध्यापक ओटो प्रधानाध्यापक हैं। यद्यपि मैं थोड़े समय के ही लिए अध्यापक ओटो का अतिथि हुआ, पर इससे बड़ा आनंद मिला। अध्यापक ओटो बाल ब्रह्मचारी हैं। उन्होंने शादी नही की। अपना जीवन वेदाभ्यास में ही बिताया है। उनके बाल सफेद हो गये हैं। उनकी बहन जिसकी उमर लगभग उनके ही बराबर है, उनके घर का प्रबंध करती है। मुझे तो वह माता के समान ही लगी, क्योंकि उसने माता के समान ही मेरी खातिरदारी की। अध्यापक ओटो हिंदोस्तान में कई बार आ चुके हैं। उन्होंने जब जब हिंदोस्तान के संबंध में बातचीत की, तब तब उनके चेहरे पर आनंद छा गया। इस पर से मैं उनका भारत के प्रति प्रेम देख सका। भारत में रहने से उनकी तबीयत खराब हो गयी है। सन 1912 में उनको मलेरिया हुआ, जो अब तक निर्मूल नही हुआ है। गर्त वर्ष वे हिंदोस्तान में आये थे, पर बीमारी ने ऐसा तडफ़ाया और इतने दिन बीमार पड़े रहे कि अब तक दुरूस्त नही हुए। तथापि उनको भारत का स्वप्न तो आया ही करता है भारत की सभ्यता का अभ्यास उन्होंने बड़ी बारीकी से किया है। उन्होंने हिंदूधर्म का गहरा अभ्यास करने के लिए वेद उपनिषद और गीता को पढ़ा है। इतना ही नही परंतु पुराणों को भी पढ़ा है और हिंदू धर्म की आधुनिक स्थिति की भी जांच की है। उनका भारत की सूक्ष्म वस्तुओं का ज्ञान देखकर तो मैं आश्चर्य चकित रह गया इसका कारण यह है कि उन्होंने अपना समस्त जीवन संशोधन में ही बिताया है।
संस्कृत उनको मातृभाषा के समान है और आवश्यकता पडऩे पर वे संस्कृत में बातचीत कर सकते हैं। इसके आगे महात्मा गांधी कहते हैं कि यह तो मैंने एक ही ऋषि के चित्र का अनुवाद दिया है। मैं तो कहता हूं कि हम लोगों को शर्म के साथ कबूल करना चाहिए कि योरप में और खास करके जर्मनी मेें रहने वाले कितने ही विद्वान जिस भाव से जिस प्रयत्न से और जिस सत्यशीलता से वेदादि ग्रंथों का अनुशीलन करते हैं, वह आज यहां करीब करीब लुप्त ही सा हो गया है। ऋषिजीवन का अनुकरण तो बहुत ही कम देखने में आता है। केवल अध्ययन के लिए ही बिना आडंबर के सहज ही ब्रह्मचर्य का पालन, आज यहां कहां दिखलाई पड़ता है? अपने भाई का साथ देने के लिए बहिन कुमारिका रहे और भाई के घर का प्रबंध करे, यह कैसी हर्ष उत्पन्न करने वाली और पवित्र वायुमंडल बनाने वाली बात है। कितने ही दिन पूर्व अमेरिका के एक अध्यापक ने 'बंबई टाईम्सÓ में अपने अनुभव का वर्णन किया था। यह भी संस्कृतज्ञ है। वह लिखता है कि मैं हिंदोस्तान में बड़ी आशा करके आया था, परंतु यहां आने के बाद अनुभव प्राप्त करने पर संस्कृत के पंडितों से मिलने पर निराश हो गया। इसके लेख में अतिश्योक्ति है, जल्दी में बांधे गये विचार हैं, और यहां पर बसने वाले योरप निवासियों के संसर्ग का स्पर्श है। यह सब बात करने पर भी जो कुछ रह जाता है, उसमें मैंने सत्यांश देखा और लज्जित हुआ। हमें सच्ची धर्म जागृति हो और प्राचीन संस्कृति में जितना सत्य, शिव और सुंदर हो, उसको संग्रह करने की रूचि हो, तो हमारी स्थिति आज भिन्न ही हो।
ऋषि लोग निर्भय होकर अरण्य में रह सकते थे और ब्रह़मचर्य उनके निकट सहज वस्तु थी। पर आज हम शहरों में भी निर्भयता से नही रह सकते। ब्रह्मचर्य अदभुत वस्तु प्रतीत होती है। परिश्रम से ढूंढने पर भी कोई शुद्घ ब्रह्मचारी नही मिलता। ब्रह्मचारिणी तो भला कहां से मिले? किसी समय यह ऋषियों का स्थान था। किंतु ऋषि लोगों ने तो अब योरप के कोने कतरे में जहां तहां वास करना शुरू किया है। इस लेख का यह हेतु नही है कि कोई जर्मनी या दूसरे स्थान में जाकर ऋषि बनने का प्रयत्न करे। यदि कोई ऐसा करे भी तो वह निष्फल होगा।
कोई भारतवासी जर्मनी में जाकर ऋषि बन सकेगा यह मेरी कल्पना में भी नही आ सकता। हिंदोस्तानी को तो हिंद में रहकर ही अध्यापक ओटो की भांति ऋषिसंस्था का पुनरूद्घार करना चाहिए। ऐसा कहा जा सकता है कि इस ओर आर्य समाज ने महान प्रयत्न किया है, पर यह प्रयत्न समुद्र में बिन्दु के समान है। इस प्रकार का जब बहुत बड़ा प्रयत्न होगा, तभी हमको प्राचीन सभ्यता की गुम हुई चाबी प्राप्त होगी।
ये हैं गहरे विचारवान विद्वानों के दिली उद्गार। ये हैं त्रसित आत्माओं के उपाय, जिनके द्वारा वे संसार का दुख दूर करना चाहते हैं, और ये हंै वे विचार जो वर्तमान भौतिक उन्नति से आरी आकर समझदार मनुष्यों के मगज में चक्कर काट रहे हैं। इसमें संदेह नही कि इस जमाने में किसी को भी चैन नही है। धनी, निर्धन, रोगी, निरोगी, राजा, रंक तथा मूर्ख और विद्वान कोई भी ऐसा नही है जो संतुष्ट हो। वर्तमान भौतिक विज्ञान और उससे उत्पन्न हुई अशांत बुद्घि ने संसार को इतना अस्वाभाविक बना दिया है कि कहीं सुख-शांति की छाया तक देखने को नही मिलती। इसलिए मान लेना चाहिए कि ऊपर कहे गये समस्त लेखकों ने दुखों के कारण और उन दुखों को दूर करने के उपाय के ढूंढऩे में अच्छा परिश्रम किया है और उनको सफलता भी हुई है। तथापि उसमें कई त्रुटियां हैं। यहां हम नमूने के लिए दो तीन का उल्लेख करते हैं।
कुदरत की ओर लौटना
सबसे प्रथम और बड़ी त्रुटि यह है कि इन कुदरत की ओर लौटाने वालों ने मनुष्य को एक प्रकार का पशु मान लिया है, जिसको कुदरत के नियम पालन करने पर विवश करते हैं। मनुष्य में यदि ज्ञानस्वातंत्रय न होता, तो बेशक यह कुदरती नियमों में आबद्घ किया जा सकता। परंतु उसके विचारस्वातंत्रय ने उसे कुदरत में दखल देने का अधिकारी बना दिया है। इसलिए वह पशु पक्षियों की भांति कुदरती नियमों से बांधा नही जा सकता। उदाहरण के लिए आहार और विहार (रति) समस्त प्राणियों में एक समान ही पाये जाते हैं, परंतु मनुष्यों में वे बिल्कुल ही विलक्षण देखे जाते हैं। गाय, भैंस, बकरी आदि को जब ऋतुधर्म होता है तब उनमें गर्भाधान के लिए एक विलक्षण व्याकुलता उत्पन्न होती है।
क्रमश: