अपराध बढऩे के मुख्य कारण

  • 2014-01-29 02:07:10.0
  • उगता भारत ब्यूरो

downloadआज मौत कितनी सस्ती हो गयी है कि ऐसे कई गिरोह सक्रिय है जो सिर्फ चन्द रुपयो के लिए किसी की भी हत्या कर देते है फिर चाहे जिसकी हत्या करानी है वह कोई भी क्यों न हो वे यह भी नही सोचते कि उस व्यक्ति कि हत्या से कितने बच्चे अनाथ हो जायेंगें उसके बूढे मॉ'-बाप का क्या होगा उसकी बहनो का क्या होगा आदि इसके मुख्य रुप से दो कारण है। पहला ये कि यहॉ गरीब व अमीर के बीच बहुत बडा अन्तर हो गया है भौतिक सुख सुविधाऐ कुछ लोगो के पास सिमट कर रह गयी है जिनसे समाज का एक बडा वर्ग वंचित है और वह इसे बरदाश्त नही कर पा रहा है तथा अपनी इच्छाओ की पूर्ती के लिऐ उसे यह धर्णित कार्य करने मे जरा सी भी हिचक नही हो रही है और उसे यह सबसे छोटा व आसान रास्ता नजर आ रहा है जिससे तुरन्त वह धन प्राप्त कर लेता है साथ ही साथ हमारी न्याय व्यवस्था भी इसके लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है क्योकि इन अपराधियों को या तो दण्ड मिलता ही नही है या फिर मिलता भी है तो उसमे अत्याधिक विलम्ब होता है जिसका डर अपराधियो को नही होता या फिर ऐसा भी कई बार देखने मे आया है कि दण्ड किसी अन्य व्यक्ति को ही मिल जाता है जिससे अपराधियों के होंसले बुलन्द होते है। इसका एक पहलू ये भी है कि आम आदमी इतना डरा-सहमा है कि वह अपराधियों के खिलाफ गवाही देने की स्थिति में नही है जिसका फायदा अपराधियों को बचने में मिलता हैं।
अपराध का दूसरा व मुख्य कारण यह है कि आज हमारे पास अपने बच्चो को संस्कार देने के लिऐ दस मिनट भी नही है जिसका नतीजा यह है कि बच्चो मे वे संस्कार ही नही है जिससे स्थिति बरदाश्त के बाहर होती चली जा रही है। हम भौतिकवाद मे इतने फंस गये है कि आज हमे पैसे के सिवाय कुछ नही दिखायी दे रहा है हर आदमी की हैसियत आज पैसे से ही मापी जाती है विद्वान गरीब का कोई हालचाल भी नही पूछता है।
शराब व नशीली चीजों का सेवन समाज मे हैसियत दिखाने के काम आने लगी है अब तो हमारी शादियो व पार्टियो मे शराब आदि का इन्तजाम करना बडी बात मानी जाने लगी है। सच्ची व नि:स्वार्थ मित्रता अब नही रह गयी है संयुक्त परिवार न होने से जो बुजुर्ग बच्चो का ध्यान रखते थे वे दर-दर की ठोकरे खा रहे जिसका नतीजा है कि हम अपने संस्कार भूल बैठे है नतीजा सामने है प्रिय पाठको मैं ये भी जानता हूॅ कि जो बाते मैं लिख रहा हूॅ आप सब इन बातों को जानते हो मानते भी हो परन्तु फिर भी मेरी लेखिनी विवश है इसलिए नही कि आपको ये कारण बताना चाहता हूॅ परन्तु इसलिए कि मैं ये बताना चाहता हूॅ अब वास्तव में सीमा पार होने लगी है पानी नाक से ऊपर जा रहा है मेरी लेखिनी का ये दर्द कहीं आपका दर्द ना बन जाये इसलिए जरा इन बातो पर गम्भीरता से सोचे और विचार करे तथा आज से ही कुछ कदम जिन्दागी की ओर उठाये जिससे यह घरती वास्तव मे स्वर्ग बन जाऐ वे बाते है कि अपने बच्चो को उत्तम से उत्तम संस्कार प्रदान करने के लिए जहॉ तक हो सके उन्हे बुजुर्गो की संगत में रखे खुद बुजुर्गो की सेवा करे मैं आपसे इतना जरूर कहूगा कि आप सेवा करने में द्धारका नाथ पुराडरीक या श्रवण कुमार न बने परन्तु बुजुर्गो के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह अवश्य करें जो आपके अपने लिए ही हितकारी होगा ।
सुखी बसे संसार सब, दुखियां रहे न कोय।
बस यही अभिलाषा है मेरी, मेरे भगवन पूरी होय।।