मनुष्य का आदिम ज्ञान और भाषा-7

  • 2014-01-26 05:16:28.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

गतांक से आगे....
नौकरों की हालत इस विज्ञापन से ज्ञात हो जाती है और पता लग जाता है कि नौकरों की कितनी खुशामद करनी पड़ती है। इस वर्णन से स्पष्ट हो रहा है कि अब नौकरों के द्वारा विलास की वृद्घि नही की जा सकती। यह तो नौकरों का हाल हुआ। अब जरा कारखानों के बारे में भी देखिए कि क्या राय है। कंपनियों द्वारा चलाए जाने वाले बड़े बड़े कारखानों के विरूद्घ भी बड़े बड़े अनुभवी व्यापारी और विद्वानों ने अपनी रायें दी हैं। हेनरी फोर्ड जितनी फोर्ड नामक मोटर संसार की समस्त मोटर कंपनियों को पीछे हटा रही है, व्यापारिक विज्ञान के बहुत बड़े ज्ञाता हैं। आप कहते हैं कि गांव गांव छोटे छोटे कारखाने खोलने चाहिए। इसी तरह अमेरिका के प्रसिद्घ व्यापारी एडवर्ड ए. फिलीम कहते हैं कि ग्रामों से अलग अलग माल तैयार होकर ही पर्याप्त माल मिल सकता है। ये रायें हैं जो गृहशिल्प की ओर बढऩे की शिक्षा देती हंै। इसी तरह अन्य 18opi3विद्वानों की राय में जब कल कारखानों की, शिल्प और वाणिज्य की वृद्घि होती है, तो राज्यों का पतन हो जाता है। बेकन नामी प्रसिद्घ विद्वान कहता है कि राज्य की आरंभिक दशा में लड़ाई के शस्त्रों की बढ़ती होती है, मध्यम अवस्था में ज्ञान विज्ञान शस्त्रास्त्र दोनों का दौर दौरा रहता है और राज्य की अवन्नति के समय कल कारखानों की शिल्प और वाणिज्य की वृद्घि होती है।
सादा जीवन
इन विचारों से सूचित होता है कि वाणिज्य शिल्प और कल कारखानों के विरूद्घ आवाज उठने से नगर उजड़ जाएंगे और देहात का सादा जीवन सामने आ जाएगा। इस देहात के सादे जीवन पर कवियों की उक्तियां बड़ी ही मनोरंजक हैं। कास्ट कहता है कि क्या कुदरत ने और उत्तम मस्तिष्कों ने दुखों को दूर करने वाला कोई पर्याप्त मार्ग नही ढूंढ निकाला? इस पर गीथी कहता है कि -हां, ऐसा उपाय प्राप्त हुआ है जो डाक्टर, वैद्य, सोना, चांदी और जादू टोने से भिन्न है। सामने खेत को देख और कुदाली फावड़े से काम कर। आत्मसंयम कर और व्यर्थ की आशाओं को छोड़ दे। अपनी समझ, शक्ति और संकल्पबल को परिमित क्षेत्र में बढऩे दें। अमिश्र खुराक अर्थात फलाहार ही से अपने शरीर को बढऩे दे। गाय-बैल से मित्रतापूर्वक बर्ताव कर। जिस जमीन की पैदावार तू लेता है और उनके लिए जो कुछ काम तू करता है उसे नीच न समझ। मुझ पर विश्वास कर। अस्सी वर्ष तक जवानी कायम रखने का यही उत्तम मार्ग शेष रह गया है।
इस ग्राम्य जीवन में बाधा डालने वाली पाश्चात्य सभ्यता है। उसके विरूद्घ भी विद्वानों ने आवाजें उठाई हैं। चीन का नेता डा. सनयातसेन कहता है कि पाश्चात्य सभ्यता द्वारा संसार में शांति स्थापित नही हो सकती और न किसी देश की वास्तविक उन्नति ही हो सकती है। क्योंकि उस सभ्यता के अंत:स्थल में हिंसा तथा स्वार्थ की लहरें उठा करती हैं और यही लहरें आगे चलकर देश के सत्यानाश का कारण हेाती हैं। इसी विषय में महात्मा गांधी कहते हैं कि इसके नाश के लिए संसार के बड़े से बड़े भयानक अस्त्रों का भी प्रयोग करना पड़े, तो मैं उद्यत हूं, यदि मुझे विश्वास हो जाए कि उसके द्वारा इसका नाश होगा।
यह पाश्चात्य सभ्यता जिस यांत्रिक और सामरिक राज्यबल से चलाई जाती है, उस युद्घपूर्ण राज्य के विषय में भी देखिए विद्वानों की क्या राय है? योरप में वर्तमान प्रजातंत्र और स्वतंत्रता पद्घति को सबसे पहले फ्रांस ने ही उत्पन्न किया। फ्रांस में इस क्रांति का मूल प्रचारक रूसो नामी महापुरूष हुआ। इसका समय 1717 से 1779 तक है। राज्य व्यवस्था के विषय में रूसो कहता है कि जब मनुष्य पर कोई शासन नही था अर्थात जब वे सृष्टि की आदि अवस्था में थे, उस समय उन्हें सच्चा सुख प्राप्त था।
उनके दुख का आरंभ तभी से हुआ जब उनमें शासन प्रणाली का उदभव हुआ अथवा परिस्थिति के बिगड़ जाने पर मनुष्य समाज ने जब अपना रूप धारण किया। समाज बनने के पहले मनुष्य अकेला रहता था, अपनी राह चलता था, न किसी का लेना और न किसी का देना। पर जनसंख्या के बढऩे और संपत्ति पर पैतृक अधिकार हो जाने के कारण लोगों की कभी कभी आपस में मुठभेड़ हो जाती। इसलिए उन्होंने समाज संगठन किया, जिससे लोगों का काम नियमबद्घ हो जाए। सभी लोगों ने प्रतिज्ञा की कि हम अपने व्यक्तित्व को अपने अधिकार को, समाज की सत्ता में, समाज के अधिकार में मिला देते हैं। फलत: सभी मनुष्यों का अपना अलग अलग व्यक्तित्व न रह गया। पर सामाजिक दृष्टि में हर एक के पास समाज के सारे अधिकार थे, क्योंकि उसने अपने अधिकार को समाज के अधिकार में मिलाकर समाज के अधिकार को अपना लिया। इसने राजा को ही सब आपदाओं का मूल बतलाया है। जिन सामरिक यंत्रों के द्वारा वर्तमान राज्य व्यवस्था चलाई जाती है, उन यंत्रों द्वारा होने वाले युद्घों के विषय में एक विद्वान कहता है कि योरप में यंत्र आविष्कारों ने शांति को कुचल दिया है। यहां यंत्र आविष्कार अशांति को मिटा नही सके, प्रत्युत युद्घों को एक प्रकार से अत्याचारी विजेता के पागलपन से भी अधिक भयानक बना दिया है। इसीलिए जेनेवा में रूस की बोलशेविक सरकार की ओर से मो. लिटविनोफ ने प्रस्ताव किया है कि संसार के सभी राज्य, स्थल, जल और आकाश की कुल सेनाएं एक साथ ही तोड़ दें, युद्घ के साधन नष्ट कर दिये जाएं और कानून बनाकर सैनिक प्रचार और सैनिक शिक्षा का निषेध कर दें। यदि वह स्वीकार हो तो एक साथ सैन्य घटाना शुरू करके चार वर्ष के भीतर सभी राज्य कुल सेनाएं तोड़ दें। 'लीग ऑफ नेशन्स' की स्थापना भी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुई है। वर्तमान राज्य व्यवस्था से सभी लोग आरी आ रहे हैं और रूस ने तो उसका अंत ही कर दिया है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या रूस का यह आविष्कार सत्य सिद्घांत पर कायम है? 21 अक्टूबर सन 1928 के गुजराती नवजीवन में विद्यापीठ के एक विद्यार्थी के बोलशेविज्म संबंधी प्रश्न पर महात्मा गांधी ने लिखा है कि मुझे कबूल करना चाहिए कि आज तक मैं बोलशेविज्म का अर्थ पूर्ण रीति से नही जान सका। पर जितना जानता हूं वह यह है कि इस नीति में किसी की अपनी निज की मिलकियत नही होती। यह बात यदि सब लोग अपनी इच्छा से करें, तब तो उससे उत्तम और कुछ भी नही है, पर बोलशेविज्म में बलात्कार को स्थान दिया गया है। बलात्कार से लोगों की मिलकियत जब्त की गयी है और बलात्कार से ही उस पर कब्जा है। यदि हकीकत सत्य हो, तो मेरा दृढ़ विश्वास है कि यह बलात्कार से सिद्घ हुआ व्यक्तित्व अपरिग्रह दीर्घ काल तक निभने वाला नही है। बलात्कार से साधी गई एक भी बात दीर्घकाल तक न तो निभी है और न निभने वाली है। इसलिए मेरा विचार यह है कि जिस प्रकार का बोलशेविज्म मुझे विदित है यह अधिक समय तक टिकने वाला नही है। मालूम हुआ है कि यह बोलशेविक राज्य व्यवस्था भी त्याज्य ही है। यहां तक देखा गया कि पश्चिम की भौतिक उन्नति के द्वारा जो कुछ आविष्कृत हुआ है वह सभी कुछ त्याज्य समझा जाने लगा है। अब वहां के लोग भारतवर्ष की रीति नीति पसंद करने लगे हैं।
अहिंसा
महात्मा टॉलस्टॉय ने वहां अहिंसा का प्रचार किया है। इससे असमानता और युद्घों के प्रति द्वेष बढ़ रहा है। अहमदाबाद के साबरमती आश्रम में 11 सितंबर सन 1928 को टॉलस्टॉय की जयंती के अवसर पर महात्मा गांधी ने कहा कि जिन तीन महापुरूषों ने मुझ पर अपना प्रभाव डाला है, उनमें से एक टॉलस्टॉय भी हैं। उनके संबंध में मैंने बहुत पढ़ा नही है, तथापि उनकी लिखी नामी पुस्तक ने मुझ पर बड़ा असर किया है। इससे मेरी नास्तिकता, हिंसा और अश्रद्घा आदि विचार चले गये हैं। सत्य और त्याग मूर्ति टॉलस्टॉय का मैं आज भी पुजारी हूं टॉलस्टाय में अपना रूख फेरा और तीव्र विरोधों के होते हुए भी वे अपने विचारों पर दृढ़ रहे। टॉलस्टॉय अहिंसा के बहुत बड़े पुजारी थे। उन्होंने पश्चिम को अहिंसाविषयक जितना साहित्य दिया है उतना और किसी ने नही दिया।
क्रमश: