जानने योग्य इतिहास के कुछ रोचक तथ्य

  • 2013-11-26 01:00:16.0
  • उगता भारत ब्यूरो
जानने योग्य इतिहास के कुछ रोचक तथ्य

स्वामी सांख्यानंद
सूर्यवंशीय आर्य क्षत्रिय रघुकुल के महापुरूष पुरूषोत्तम श्रीराम के पुत्र कुश के वंशज बलामी का राजा नागादित्यार्जुन का पुत्र महाप्रतापी योद्घा महाराजा गुहयादित्यासिंह जी ने मेवाड़ साम्राज्य की स्थापना की थी।
मेवाड़ साम्राज्य का अंतिम महाराजा उदयसिंह जी की चौदहवीं पत्नी जयवंतीबाई राठौड़ जी का पुत्र चित्तौड़ नरेश महाराजा प्रताप सिंह जी थे।
उनकी पत्नी अजय देवी का पुत्र युवराज अमर सिंह जो भूमिगत होकर मेवाड़ से पलायन कर महाबाहू देश में वेरू नामक गांव में अपना नाम लक्ष्मण सिंह धारण कर रहे थे, उन्हें लोग बाबाजी कहा करते थे।
अमर सिंह जी का पुत्र विक्रम सिंह तथा करण सिंह थे, विक्रम सिंह जी को मालोजी नाम से कहा करते थे। इन की पत्नी ओमवती का पुत्र अभय सिंह जी शाहाजी राजे नाम से जाने जाते थे। इनकी पत्नी यज्ञवती जीजा नाम से प्रख्यात हुई। इन के पिता लक्ष्मण सिंह यादव के पूर्वज देवगिरी के खम साम्राज्य के सम्राट संस्थापक दृढ़ प्रहरी हरीदेवराम जी के वंशज थे।
यज्ञदेवी का पुत्र तथा राष्टïसंत समर्थ रामदास स्वामी जी का शिष्योत्तम एवं आचार्य निष्कंठ पण्डितराव याने दादाजी कोण्डदेव जी का परमशिष्य छत्रपति शिवाजी ने हिंदवी स्वराज्य मराठा साम्राज्य की स्थापना की। इनकी राजधानी किले दुर्ग रामगढ़ थी।
छत्रपति शिवाजी की ज्येष्ठ रानी सत्यवती महारानी शुभवती तथा युवराज स्वयंभूदेव संभाजी युवराज समर्थदेव थे, तथा प्रधान पेशवा श्याम जी निष्कंठ सेनापति नेताजी पालकर, गुप्तचर प्रमुख भैरव जी नाइक, तोपदल प्रमुख मानको जी नाईक, आरमार प्रमुख दौलतराव पान संबंध थे शिवाजी महाराज का पौत्र सार्थक देव था।
छत्रपति शाहु की माता ्रयशवंती चाची तारकेश्वरी तथा पत्नी अम्बीकादेवी थी। छत्रपति शाहु का प्रधान पेशवा का पुत्र पेशवा श्रीमंत बाजीराव प्रथम ब्रह्मïवर्त के नरेश थे, इनके रिसालदार रघुनाथराव नेवालकर जी को झांसी का सूबेदार बनाया था, इन का पौत्र झांसी नरेश गंगाधर राव की पत्नी महारानी लक्ष्मीबाई नेवालकर के पिता मयूरेश्वर पंत तांबे जी का साढू श्रीमंत बाजीराव पेशवा द्वितीय था। छत्रपति के दीवान पाण्डूरंग हरीपंत जी की द्वितीय पत्नी रूक्मणी का पुत्र रामचंद्र तात्या टोपे की सौतेली माता रोहिणी के भ्राता श्रीमंत अमृतराव पेशवा संन्यास लेकर पूर्णानंद बने। स्वामी पूर्णानंद जी से दयानंद जी ने संन्यास आश्रम की दीक्षा ली थी।
('वैदिक संसार' से साभार)