प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा

  • 2013-10-26 15:22:34.0
  • उगता भारत ब्यूरो
प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा

जुगल किशोर सोमाणी
सृष्टि निर्माण कर्ता ने इस धरा पर सभी सजीव वस्तुओं का सृजन बड़े विलक्षण ढंग से व्यवस्थित किया था। यदि बारीकी से वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाय तो पायेंगे कि प्रत्येक जीव ( वनस्पति सहित ) एक दूसरे के पूरक ( उपयोगी ) हैं। उन्नति का गुमान करने वाले हम लोग वास्तव में पतन की राह पर चल रहे हैं। अभी खाने में शक्कर ( शुगर ) बड़ी मीठी लग रही है परन्तु अत्यधिक सेवन के बाद मुँह का स्वाद बिगड़ जाता है , कसैला हो जाता है। हमें हमारी उन्नति का अध्ययन करना चाहिए। इस अध्ययन संस्थान में विभिन्न विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए। आधुनिक विभिन्न वैज्ञानिकों के संग पौराणिक सद्ग्रंथों के प्रकाण्ड विद्वानों , सभी मतावलम्बियों , भू विज्ञानियों से सुसज्जित इस संस्थान को पूर्ण ताकत और बिना किसी हस्तक्षेप के अपने कार्य को निष्पादन करने का कहा जाय। मुझे ऐसा लगता है कि प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा डरावना होगा। पशु - पक्षी हत्या , धरती का दोहन और नदी - नालों को अप्राकृतिक ढंग से रोक कर बिजली पैदा करने का तरीका आगे जाकर हमें बहुत भारी पड़ेगा। आज के सन्दर्भ में भी भीतर झांककर देखें कि हमने अनेक प्राणी , वनस्पति श्रृंखलाओं को खो देने के कारण कितना धोखा खाया है तो हमारी रुह कांप जाएगी। वर्तमान में ही गिद्ध जैसे पक्षी को खो देने के कारण विश्व में अनेक बीमारियों का जन्म हो गया। गौहत्या के कारण खेत खलिहानों की उर्वरक क्षमता नष्ट हो गयी। इस जाति को माँ की संज्ञा क्यों दी गयी थी ? माता गाय से प्राप्त होने वाले पंचगव्यों से धरा के सभी प्राणी - वनस्पति पोषित होते थे। पंचगव्यों में से पहले गव्य दूध के लिए हमने बहुत पापड़ बेले और अनेक बीमारियों को जन्म देने वाले कुपोषित दूध को विदेशी पशुओं के मार्फ़त बाजारू बना डाला। वहीं दूसरे गव्य दही का तो नामोनिशान सा ही मिट गया। दही की कमी के कारण तीसरा गव्य घृत या घी जन्म ही नहीं ले सका। जब दही ही नहीं तो घृत , म_ा , छाछ कहाँ ? घृत की जगह आ गया बटर आयल , जिसका कोई शुद्ध होने का भरोसा नहीं कर सकता। चोथे और पांचवे गव्य गौमूत्र - गोबर के बिना पूरा वनस्पति जगत मानो विधवा हो गया। आज रासायनिक खादों से हमने एक बार तो खेतों को हरा भरा कर लिया परन्तु ये ही खेत आज बेजान हो गए हैं।खेतों में उत्पादित अनाज अब पुष्टिकारक रहे ही नहीं। कोई स्वाद नहीं रहा। ये तो अतिसाधारण सा उदाहरण मैंने उद्धृत्त किया है। ऊपर वर्णित संस्थान का निर्माण तो करें पैरों नीचे की धरती खिसक जाएगी इस लेख को पढ़ने वाले आज के ताकतवर प्रबुद्ध जनों से मेरी विनति है कि कृपया विचार करें - हम क्या कर रहे हैं ? यह कितने दु:ख की बात है कि हम विदेशी मुद्रा के भण्डारण के लिए गौमाँस के सबसे बड़े निर्यातक बन कर इठला रहे हैं तो दूसरी तरफ गौहत्या के कारण गौमूत्र - गोबर की कमी से हुई उर्वरकता की पूर्ति के लिए अन्धाधुन्ध बिना समझ की रासायनिक खादों का आयात कर पुन: विदेशी मुद्रा के भण्डार को खो रहे हैं।

जयपुर