न हिन्दू बचेगा न मुसलमान बचेगा

  • 2013-10-20 03:29:18.0
  • उगता भारत ब्यूरो

download (1)बजरंग मुनि
मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों के पीछे दो प्रमुख कारण उभरकर सामने आये हैं। एक, हिन्दू लड़कियों के प्रति मुसलमानों का उग्र और गैर वाजिब व्यवहार तथा दो, इन गैर वाजिब व्यवहार का कुछ सांप्रदायिक शक्तियों द्वारा किया जानेवाला समर्थन और निषेध। भारत में हिन्दू मुस्लिम सांप्रदायिकता की बुनिया इसी गैर बराबरी वाले व्यवहार और इसके समर्थन और निषेध की राजनीति में निहित है। बजरंगमुनि मानते हैं कि अगर मुसलमान अपना यह गैर वाजिब व्यवहार जारी रखते हैं तो उन्हें बार बार गुजरात से गुजरना पड़ेगा। लेकिन हिन्दुओं को भी अब संघ जैसे सांप्रदायिक संगठनों से सावधान हो जाना चाहिए जो कि गैर वाजिब मजहबी उन्माद का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करती हैं।
मुजफ्फरनगर के दंगे दो कारणो से हुए। 1. एक हिन्दू लड़की के साथ छेडछाड। 2. स्थानीय मुसलमानों द्वारा कानून अपने हाथ मे लेने की पहल। अगर पहली घटना पर नजर डाले तों एक मुसलमान युवक ने एक हिन्दू लड़की के साथ छेड़छाड़ की। लड़की सहमत नही हुई, फिर भी लडके ने छेडछाड जारी रखी। लड़की के भाइयों ने लडके के साथ मारपीट की। जिसमें उस लड़के की मृत्यु हो गई। उस वक्त तक यह घटना दो परिवारों तक सीमित थी। लेकिन मुस्लिम लडके के गांव के मुसलमानों ने सांम्प्रदायिक आधार पर इकटठा होकर उन दोनों हिन्दू लड़कों को पकड लिया और दोनों लड़कों की मार मार कर हत्या कर दी। उसके बाद दोनो पक्ष के लोग सांम्प्रदायिक तौर पर अलग अलग इक_े होकर मीटिंग करने लगे। मुसलमानों ने अलग मीटिंग की और हिन्दुओं ने अलग। मुसलमानों की मींटिग में भी भड़काऊ भाषण दिये गये तथा हिन्दुओं की मीटिंग में भी। सभी राजनैतिक दलों के लोग सांम्प्रदायिक तौर पर मीटिंग मे शामिल होने लगे। मुसलमानो की मीटिंग के बाद कोई टकराव नही हुआ किन्तु हिन्दुओं की मीटिंग के बाद वापस लौट रहे हिन्दुओं के साथ अलग अलग मुस्लिम बहुल इलाको में हमले हुए, जिसमे कुछ हिन्दू लोग मारे गये और कुछ लोग गायब कर दिये गये।
इस मुस्लिम आक्रमण की तीव्र प्रतिक्रिया हुई और हिन्दुओं ने मुसलमानों पर संगठित होकर आक्रमण किये जिसे गांव के अल्पसंख्यक मुसलमान झेल नही सके और रोकने के लिये सेना बुलानी पडी। सेना के आने के बाद शान्ति तो अवष्य हुई है, दंगे और हत्यायें भी रूकी है, किन्तु संाम्प्रदायिक विष्वास अभी तक नही बन सका है। बडी मात्रा मे मुसलमानो का पलायन हुआ है, जिन्हे लौटने मे कुछ समय लगना स्वाभाविक है। चूंकि घटनाएं लडकी के साथ छेडछाड तथा मुसलमानो द्वारा सामूहिक आक्रमण की पहल के दो कारणो पर आधारित है, अत: दोनो कारणो पर अलग अलग विचार करके ही समाधान खोजा सकता है।
स्पष्ट है कि छेडछाड के मामले लडकों के द्वारा ही होतें है, लडकियों के द्वारा तो नही के बराबर। छेडछाड की घटनाएं विवाहित महिलाओं के साथ भी कम होती है। मैने तो नही सुना कि विवाहित महिलाओं पर भी कभी तेजाब फेंका जाता हो अथवा विवाहित महिलाओ के कारण भी ऐसे दंगे होते हो। हो सकता है अपवाद स्वरूप हुए भी हों लेकिन आमतौर पर ऐसा नही होता। छेडछाड की घटनाएं आपस मे तो होते रहती है, लेकिन मुस्लिम युवकों द्वारा हिन्दू लडकी के साथ छेडछाड की घटनाओ का प्रतिषत ज्यादा है और हिंन्दू युवकों द्वारा मुस्लिम लडकी के साथ छेडछाड की घटनाओं का प्रतिषत कम। इसके कई कारण है। इस्लाम एक संगठन है और हिन्दुत्व एक धर्म। इस्लाम मे चार विवाह तक छूट है। हिन्दू मे एक से अधिक पर रोक है। इस्लाम में हिन्दु लडकी को मुसलमान बना लेना समाजिक दृष्टि से कोई बुराई नही मानी जाती बल्कि कुछ न कुछ उसे अच्छा ही माना जाता है। जबकि हिन्दुओ मे इस कार्य को पारिवारिक बुराई भी माना जाता है और सामाजिक बुराई भी। इस्लाम मे विवाहित लडको द्वारा भी अविवाहित लडकी को बहकाना फुसलाना प्रतिबंधित नही है, जो हिन्दुओ मे है तथा हिन्दुओ के लिये तो कानून से भी ऐसा करना वर्जित है। एक कारण और है कि वैसे ही हिन्दू और मुसलमानो मे कुल मिलाकर लडकियों का अभाव है। जो मुसलमानो मे और भी ज्यादा है, क्योकि उनमे चार विवाह तक छूट है। यह एक महत्वपूर्ण कारण है कि मुसलमान लड़के हिन्दू लड़कियों की ओर अधिक आकर्षित होते है अथवा अधिक प्रयत्नषील होते है।
ऐसी बातें दंगे का रूप लेने का एक दूसरा कारण है-इस्लाम का संगठन होना। मुजफ्फरनगर मे उस छेडछाड करने वाले लडके को लडकी के दो भाइयों ने जाकर मारा था, हिन्दुओं ने नही। यह पारिवारिक विवाद तक सीमित था। किन्तु इन दोनो लडको को उस मरने वाले मुस्लिम युवक के परिवार वालो की जगह गांव के मुसलमानो ने मारा। साम्प्रदायिक आधार पर इकटठा होकर मारा। क्योंकि मारने वालो मे हिन्दु मुसलमान गांव के सभी लोग षामिल नही थे। यह भी सही है कि मरने वाला मुस्लिम युवक एक गुंडा था, जबकि उसे मारने वाले लडकी के दोनो भाई कोई गुंडे नही थे।
शायद इसके बाद भी हिन्दू और मुसलमानो के बीच तार्किक आधार पर इतना फर्क नही दिखता, यदि बैठक से लौट रहे हिन्दुओ को मुसलमानो द्वारा आक्रमण की पहल ना की गई्र होती। अब चाहे तो आजम खां अपनी राजनैतिक आत्महत्या कर ले अथवा अन्य मौलाना लोग मुलायम सिंह को अपदस्थ ही कर दे किन्तु जो अंतर मनो मे आ गया है उसे मिटाने की पहल मुसलमानो को ही करनी होगी, जो वे करेंगें नही अथवा उनका संगठन करने नहीं देंगा। घटना से स्वाभाविक रूप से अखिलेष सरकार को नुकसान हुआ है।
उत्तर प्रदेष मे मुसलमानो का जिस तरह एक पक्षीय मनोबल बढ रहा था, उसे इस घटना से धक्का लगा। फिर भी मुसलमान वास्तविकता को समझने के लिये ना कभी तैयार हुआ है ना भविष्य मे दिखता है। क्योकि मुसलमानो को यह विष्वास है कि भारत मे साम्प्रदायिक आधार पर वे एक मात्र संगठन है बाकी लोग तो कहीं ना कही विभाजित है। मुसलमानो को यह विष्वास है कि ''फर्स्ट अटैक इज वेल डिफेंन्स'' की कहावत उन्हे दुनियां मे हर जगह सफलता दिलाती है। भारत मे भी दिलाएगी ही। और वे नही समझ पा रहे है कि सारी दुनियां मे वे अलग थलग पड रहे है। भारत भी उनमे से एक है। विचारणीय ये है कि इसका समाधान क्या है। कुंवारी लडकियेां के साथ ही छेडछाड की घटनाएं होती है, आक्रमण होते है बलात्कार होते है, तेजाब फेंका जाता है, वह भी प्राय: 12-13 वर्ष से अधिक उम्र की अविवाहित लडकियो के साथ। जबसे समाज मे लडकियो का अभाव हुआ है तब से ऐसी घटनाएं और बढी है। इन समस्याओ का समाधान सिर्फ कानून से नही हो सकता क्योकि कानून की अपनी सीमाएं होती है। वह तो सिर्फ 2 प्रतिषत के आस पास ही अपराधो पर नियंत्रण की शक्ति रखता है। यदि कुल आबादी का 10 प्रतिषत अपराध करने लगे तो कानून ऐसे अपराधो को नही रोक सकता। भारत मे तो इतने कानून बना दिये गये कि यदि उन कानूनों का ठीक से पालन हो तो 99 प्रतिशत आबादी को जेलों मे डालना पड़ेगा। इसलिये बढती छेड़छाड़ की घटनाओं को रोकने के लिये चौतरफा उपाय करने होगे।
वैसे तो विवाह जैसे मामलों में सरकार को काई कानून बनाना ही नही चाहिए और सारा काम परिवार और समाज पर छोड़ देना चाहिये किन्तु सरकार को कानून बनाना ज्यादा ही जरूरी लगे तो विवाह की न्यूनतम उम्र 12 वर्ष तय कर देनी चाहिये। किसी भी व्यवस्था में गुण और दोष दोनो होते है। यदि विवाह की उम्र घटेगी तो कुछ आवादी नियंत्रण पर भी असर पडेगा और बाल मृत्यु दर भी बढेगी किन्तु इन सबकी अपेक्षा बलात्कार और छेडछाड की घटनाएं होना ज्यादा नुकसानदेह है। दूसरा काम सरकार को यह करना चाहिये कि वेश्यालयों को पूरी तरह खुली छूट दे दे। वेश्यालयों का खुला होना ही ऐसी घटनाओं को रोकने मे सहायक है।
तीसरा काम यह भी करना चाहिये कि महिला सशक्तिकरण के प्रयासों को स्वैच्छिक किया जाय न कि प्रोत्साहन के रूप मे। जो महिलाएं पुरूषों के साथ दूरी घटाना चाहती है उन्हे हल्के फुल्के हंसी मजाक सहन करने की आदत भी डालनी होगी तथा बलात्कार को छोडकर अन्य घटनाओं को तब तक गंभीरता से नही लेना होगा जब तक ऐसी घटनाए किसी सीमा को पार करने ना लगे। खुले समाज की व्यवस्था को बंद समाज व्यवस्था पर एकाएक थोपना गंभीर समस्यायें पैदा करेगा।
इसके साथ ही सामाजिक व्यवस्था में भी कुछ सुधार करने होंगे। महिलाओ का विवाह किसी व्यक्ति से करने की अपेक्षा परिवार से करने की व्यवस्था करनी चाहिये। अर्थात यदि बड़े भाई का विवाह होना है तो छोटा भाई बड़े भाई की पत्नी का उपयोग परिवार की अनुमति से कर सकता है। तब तक जब तक उसका विवाह न हो जाए। यह व्यवस्था आपको बुरी दिखेगी किन्तु कुछ व्यवस्थाएं कुछ समय बाद अच्छी दिखने लगती हैं।
साम्प्रदायिक दंगो में छेड़छाड़ की घटनाओं की अपेक्षा साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण ज्यादा नुकसान करता है। मुजफ्फरनगर की घटना में भी यदि उस छेडछाड की घटना को समाज की तरफ से रोकने का प्रयास होता अथवा उन दो लडकों की हत्या में भी किसी एक सम्प्रदाय के लोग शामिल ना होकर पूरे गांव के आम लोग शामिल होते तो दंगा ऐसा रूप ना लेता। आवश्यकता तो इस बात की है कि हिन्दू और मुसलमान अलग अलग संगठनों में होने की अपेक्षा मिश्रित संगठन बनाने का प्रयास करे। मुझे पता चला है कि बरेलवी मुसलमान अथवा शिया मुसलमान अथवा सूफी मुसलमान ऐसे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण मे पीछे रहते है, तथा देवबंदी या वहावी आगे रहते है। मुसलमानो को चाहिये कि वे कोई अपनी ऐसी पहचान बनावे जिससे उनकी शान्तिप्रियता के प्रति प्रतिबद्धता को आसानी से पहचाना जा सके। अथवा वे अपना पूजा स्थान अलग कर लें अथवा नाम के साथ कोई शब्द जोड लें या दांढी मूछ में फेर करें लेकिन कोई ना कोई एक सार्वजनिक पहचान तो होनी ही चाहिये कि यह मुसलमान कटटर वादी मुसलमानो के समूह के साथ नही है। संघ परिवार को भी चाहिये कि वह सभी मुसलमानों के साथ एक सा ब्यवहार करना छोड दे। हिन्दु राष्ट्र का नारा बहुत घातक है।
इसी तरह सभी मुसलमान अविष्वसनीय होते है ऐसा विचार करना भी घातक होता है। संघ परिवार को चाहिेये कि वह सत्ता के लालच मे हिन्दू मुसलमान के बीच बंटवारा ना कराये। यदि ऐसा धु्रवीकरण होगा अर्थात सभी मुसलमानो को एक तरफ मानने की भूल होगी तो ऐसे दंगें होना स्वाभाविक है। यदि दंगे कराने से राजनैतिक लाभ होने लगेगा तो आवष्यक नही है कि छेडछाड की घटनाऐ ही इसका आधार बन सकती है। इसके लिये तो मस्जिद मंदिर की दीवार अथवा धार्मिक झंडें निकालना अथवा अन्य आधार भी हो सकते है। धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओ का भी कर्तब्य है कि वे संघ परिवार को साम्प्रदायिक आधार पर शक्तिशाली ना होने दें तथा धर्म निरपेक्ष मुसलमानो का भी कर्तव्य है कि वे सांप्रदायिक मुसलमानों के हाथो का खिलौना ना बने। यदि ऐसा होगा तो साम्प्रदायिक शक्तियां हिन्दू मुसलमान के बीच ध्रुवीकरण नही करा सकेगीं। फिर भी यदि मुसलमान संगठन के बल पर अपनी शक्ति बढाने को एक हथियार के रूप में उपयोग करना जारी रखते हैं तो लाचारी में उनके खिलाफ गैर मुस्लिम लोगों को एकजुट होने से नहीं रोका जा सकता। और शासन प्रशासन भी अगर मुस्लिमों के खिलाफ खड़ा नजर आये तो इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं होगा। यह बात सुनने में कठोर और सांप्रदायिक लग सकती है लेकिन स्थायी शांति का दूसरा कोई उपाय नहीं है।