धन का अंधाधुंध उपभोग चुनौती बन रहा है

  • 2013-09-11 12:42:35.0
  • उगता भारत ब्यूरो
धन का अंधाधुंध उपभोग चुनौती बन रहा है

नवधनाढय परिवार में विवाह की गहमागहमी। दूल्हा तथा उसके पिता सहित तताम बाराती शराब के नशे में धुत्त होकर भंगड़ा नृत्य कर रहे हैं। महिलाएं भी इस माहौल में शामिल हो जाती हैं।
बारात की चढ़त में नचनियों के सिर पर नोटों के बार फेर किये जा रहे हैं। सौ साथ के नोट हवा में लहराए जा रहे हैं। बाजे वाले अश्लील फिल्मी धुनें बजा रहे हैं औरकाली कमाई यानि दो नंबर के नोटों और शराब के दौर ने वातावरण को अश्लीलता व उच्छृंखलता के चरमोत्कर्ष पर पहुंचा डाला है।
यह सब लक्ष्मी के भौंडे उपभोग का एक शर्मनाक नमूना है। हमारे धर्मशास्त्रों में लक्ष्मी (धन) की चार गति बताई गयी है-दान, भोग, संग्रह और विनाश। पुराणों में कहा गया है जो व्यक्ति गरीबों, असहायों को दान देता है, गौशाला, मंदिर, बावड़ी, कुआं, बाग आदि पर धन खर्च करता है उसके धन का पूरी तरह सदुपयोग होता है। लक्ष्मी ऐसे दानी से पूरी तरह प्रसन्न होकर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखती है।
इसी प्रकार कहा गया है कि धन का अपनी संतान के लिए असीमित संग्रह बहुत घातक होता है। बिना परिश्रम किये संतान को मिला धन उसके अंदर तरह तरह के दुर्व्यसन और अकर्मण्यता पैदा करता है। गलत साधनों से अर्जित धन तरह तरह की कलह, घातक बीमारियों, उच्छृंखलता, कपट, अविश्वास को जनम देता है। ऐसी स्थिति में हमें यह सोचना होगा कि धन प्राप्ति के साधन पवित्र होने चाहिए। धनार्जन यदि परिश्रम, ईमानदारी और धर्मशास्त्र की आचार संहिता के अनुसार होगा तो उसका दुरूपयोग हम कर ही नही सकते।
पुराणों में लक्ष्मी धन को साक्षात मां माना गया है। उसे मंगल की देवी कहा गया है। लक्ष्मी को श्री समृद्घि प्रदान करने वाली बताया गया है। दीपावली के पावन पर्व पर मां लक्ष्मी का विधिवत गणेश जी सहित पूजन किया जाता है। उसके पूरी तरह परोपकार हेतु सदुपयोग का संकल्प लिया जाता है।
पहले व्यापारी लक्ष्मी पर्व दीपावली पर संकल्प करते थे कि मिलावट, कृत्रिम अभाव के लिए जमाखोरी, चोरबाजारी जैसे गलत साधनों से धन कदापि नही कमाएंगे। अपनी आय का दसवां भाग धार्मिक कार्यों, मंदिर, तालाब, कुआं धर्मशाला या औषधालय बनाने में लगाएंगे। किंतु आज तमाम पुरानी मान्यताओं को दरकिनार कर कैसे भी साधनों से ज्यादा से ज्यादा धन कमाकर करोड़पति बनने की होड़ लग गयी है।
धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि मां का सत्कर्मों में उपयोग किया जाता है, उपभोग कभी नही। मां का उपभोग घोर पाप कर्म है। पुराणों में ऐसी अनेक कथाएं आई हैं जिनसे प्रेरणा मिलती है कि ईमानदारी और तपस्या श्रम से प्राप्त की गयी लक्ष्मी ही सुख, शांति और बरकत सच्ची समृद्घि प्रदान करती है। गुरूड़ पुराण में जीवन के कार्यों का लेखा जोखा प्रकट करते हुए कथा दी गयी है कि धन पाने के लिए खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों को नरक में अमानवीय यातनाएं भोगनी पड़ती हैं।
यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि धर्मप्राण भारत के लोग अब अपने धर्मशास्त्रों में दी गयी चेतावनी तथा पुरानी परंपराओं की घोर उपेक्षा कर धन के पीछे अंधे होकर दौड़ रहे हैं। लक्ष्मी के दुरूपयोग का ही यह दुष्परिणाम है कि परिवार तेजी से विघटित होते जा रहे हैं। दहेज रूपी दानव न जाने कितनी नवविवाहिताओं को लील लेता है? हम विवाह में तो शराब व तड़क भड़क पर लाखों रूपये देखते उड़ा देते हैं किंतु दहेज न लाने के नाम पर नव वधुओं का उत्पीड़न करने में नही हिचकिचाते। धन के अंधे मोह ने भाई से भाई को लड़ा दिया है। राम लक्ष्मण व भरत के देश की अदालतों में भाई भाई के बीच मुकदमो की झड़ी लगी रहती है। पिता पुत्र की तथा पुत्र पिता की धन के कारण जान लेने में नही हिचकिचाता।
सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत आज आर्थिक दृष्टि से दिवालिया हो चुका है। संसार भर के देशों का उस पर असीमित ऋण चढ़ा हुआ है। सोने की चिड़िया का तमाम सोना विदेशों में गिरवी रखना पड़े, इससे बड़ी दुर्दशा हमारी और क्या हो सकती है? लक्ष्मी का उपासक धर्म प्राण भारत संसार का सबसे बड़ा कर्जदार या भिखमंगा कहलाए इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है।