मैं पाप बेचती हूं

  • 2013-04-18 00:27:12.0
  • उगता भारत ब्यूरो
मैं पाप बेचती हूं

एक बार घूमते-घूमते कालिदास बाजार गये । वहाँ एक महिला बैठी मिली। उसके पास एक मटका था और कुछ प्यालियाँ पड़ी थी । कालिदास ने उस महिला से पूछा: क्या बेच रही हो ?
महिला ने जवाब दिया: महाराज ! मैं पाप बेचती हूँ ।
कालिदास ने आश्चर्यचकित होकर पूछा: पाप और मटके में ?
महिला बोली: हाँ , महाराज ! मटके में पाप है ।
कालिदास: कौन-सा पाप है ? महिला: आठ पाप इस मटके में है । मैं चिल्लाकर कहती हूँ की मैं पाप बेचती हूँ पाप, और लोग पैसे देकर पाप ले जाते हैं । अब महाकवि कालिदास को और आश्चर्य हुआ: पैसे देकर लोग पाप ले जाते हैं ? महिला: हाँ, महाराज ! पैसे से खरीदकर लोग पाप ले जाते हैं। कालिदास: इस मटके में आठ पाप कौन-कौन से हैं?
महिला : क्रोध, बुद्धिनाश, यश का नाश, स्त्री एवं बच्चों के साथ अत्याचार और अन्याय, चोरी, असत्य आदि दुराचार , पुण्य का नाश , और स्वास्थ्य का नाश, ऐसे आठ प्रकार के पाप इस घड़े में हैं ।
कालिदास को कौतूहल हुआ कि यह तो बड़ी विचित्र बात है । किसी भी शास्त्र में नहीं आया है की मटके में आठ प्रकार के पाप होते हैं। वे बोले आखिरकार इसमें क्या है ? महिला : महाराज! इसमें शराब है शराब ! कालिदास महिला की कुशलता पर प्रसन्न होकर बोले तुझे धन्यवाद है ! शराब में आठ प्रकार के पाप हैं यह तू जानती है और 'मैं पाप बेचती हूं 'ऐसा कहकर बेचती है फिर भी लोग ले जाते हैं । धिक्कार है ऐसे लोगों को ! साभार