समसामयिक:दुष्कर्म की सजा क्या और कैसे?

  • 2012-12-27 11:59:07.0
  • उगता भारत ब्यूरो
समसामयिक:दुष्कर्म की सजा क्या और कैसे?

दिल्ली में चलती बस में सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद उबाल खाई और अक्रोशित जनता सडक पर उतर आई है और जगह-जगह जनता भावावेश में आकर बलात्कारियों को मृत्यु दंड देने की मांग कर रही है। ऐसा नहीं है कि बलात्कार के विषय में यह आक्रोश पहली बार उभरा हो। पूर्व में भी इस जघन्य अपराध के विरोध में स्वर उठते रहे हैं किन्तु भावावेश से किसी निर्णायक बिंदु पर नहीं पहुंचा जा सकता है। स्मरण रहे कि इस प्रकार की घटनाओं पर राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए पहले भी मृत्यु दंड के प्रावधान की मांग उठी थी किन्तु स्वयं महिला संगठनों ने ही इस प्रावधान का विरोध किया था। महिला संगठनों का यह विचार था कि यदि बलात्कारी को मृत्यु दंड दिया जाने लगा तो पर्याप्त संभव है कि वे पीडि़त महिला से दुष्कर्म के बाद उसकी ह्त्या ही कर देंगे। मानवाधिकारों की रक्षा के चलते आज विश्व में मृत्यु दंड को समाप्त करने की मांग उठ रही है और कई देशों ने अपने कानून में से मृत्यु दंड के प्रावधान को ही समाप्त कर दिया है। भारत में भी उच्चतम न्यायालय का यह विचार है कि मृत्यु दंड की सजा आपवादिक तौर पर और बिरले से बिरले मामलों में ही दी जाये। यहाँ तक कि सामूहिक हत्याओं के मामले में भी मृत्यु दंड नहीं दिया जाता बल्कि मृत्यु दंड तो उन बिरले मामलों में ही दिया जाता है जहां मृत्यु अत्यंत नृशंस तरीके से कारित की गयी हो। ऐसी स्थिति में यदि कानून की किताब में सैद्धांतिक तौर पर मृत्यु दंड का प्रावधान कर दिया गया तो भी वह उक्त कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा और वास्तव में मृत्यु दंड किसी बलात्कारी को मिल पायेगा यह संदेहास्पद है। जहां पीडि़त महिला की ह्त्या ही कर दी गयी हो वहाँ तो स्पष्ट प्रमाण के अभाव में यह और कठिन हो जाएगा। कारावास का उद्देश्य दोषी में सुधार करना होता है जबकि मृत्यु दंड तब दिया जाता है जब उसमें सुधार की संभावनाएं समाप्त हो गयी हों। सजा देने हेतु न्यायालय के लिए मात्र अपराध की प्रकृति ही पर्याप्त नहीं है अपितु पीडि़त व अभियुक्त दोनों का पूर्ववर्ती चरित्र, अभियुक्त की उम्र, पश्चाताप आदि के साथ साथ साक्ष्य की प्रकृति भी विचारणीय होती है।
हाल ही के वर्षों में देश के बलात्कार कानून में संशोधन किये गए हैं और आज इस अपराध के लिए अधिकतम सजा आजीवन कठोर कारावास व न्यूनतम सजा सात वर्ष है। मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से सोचा जाये तो यह प्रावधान अपराध की रोकथाम के लिये पर्याप्त और उचित है यदि देश के पास वास्तव में कठोर कारावास के लिए व्यवस्था हो। क्योंकि कठोर कारावास में दोषी जीवन भर पीडि़त होता जबकि मृत्यु दंड में तो उसे क्षणिक पीड़ा ही होती है और उसकी मृत्यु का दुष्परिणाम, बिना किसी अपराध के, उसका परिवार जीवन भर के लिए भुगतता है। उच्चतम न्यायालय ने भी एडिगा बनाम आंध्र प्रदेश (19।4 रढ्ढक्र ।99) में कहा है कि देरी से दिए गए मृत्यु दंड की बजाय शीघ्र दिया गया