देशभक्त हुतात्मा स्वामी श्रद्घानंद

  • 2012-12-22 03:52:04.0
  • उगता भारत ब्यूरो
देशभक्त हुतात्मा स्वामी श्रद्घानंद

स्वामी श्रद्धानंद के समय धर्मांधता और पुराणपंथी विचारधारा बहुत जोरों पर थी। एक सच्चे आर्य समाजी के रूप में उन्होंने अपने विचारों को सबसे पहले अपने घर, परिवार और अपने जीवन में पूरी तरह अपना लिया। उन्होंने समाज में एक आदर्श प्रस्तुत कर अपने परिवार में अंतिम संस्कार, विवाह आदि जाति-पांति के बंधन तोड़कर वैदिक रीति से संपन्न किए। इस प्रकार उस समय में भी आदर्श और साहस का परिचय देकर अपने सिद्धांतों का पूरा परिचय दिया। देश में जब भी साम्प्रदायिक दंगे भड़के तो उन्हें शांत करने के लिए स्वामी श्रद्धानंद ने देश में सामाजिक और साम्प्रदायिक एकता बनाए रखने का पूर्ण प्रयास किया। उन्होंने हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख सभी सम्प्रदाय के लोगों को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया। हिन्दू समाज में अनेक प्रकार की बुराइयां तथा अन्धविश्वास भरे पड़े हैं। शैशवावस्था में इनका ज्ञान नहीं हो पाता। जब शिशु किशोर और युवक बनता है तो उसमें तर्कशक्तिका विकास होता है। फिर वह समाज में व्याप्त सभी रुढिय़ों, कुप्रथाओं और अन्धविश्वासों को अपनी तर्क-तुला पर तोलता है। तुला का जो पलड़ा भारी होता है वही उसका मान्य मार्ग बन जाता है।

हिन्दू धर्म में वैष्णव शैव शाक्त सनातन धर्म आदि अनेक सम्प्रदाय बनकर लोगों के मनों में भ्रम पैदा कर रहे हैं। उस भ्रम को दूर करने के लिए स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज का बीज-वपन किया तथा स्वामी श्रद्धानन्द ने उसे खाद-पानी देकर पल्लवित-पुष्पित करने का अथक प्रयास किया। 'समाज सुधारक स्वामी श्रद्धानन्द' पुस्तक में स्वामी श्रद्धानन्द के मनोमन्थन, उथल-पुथल, अंग्रेजी शासन के विरोध आदि पर विजय प्राप्त कर हिन्दू समाज में 'आर्य समाज' के वृक्ष को लहलहाते हुए देखने का पूरा विवरण प्रस्तुत है।
समाज सुधारक क्रांतिकारी विचारों के निष्ठावान समाज-सुधारक श्रद्धानंद का जन्म सम्वत 1913 विक्रमी (सन् 1856) को फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की त्र्योदशी को पंजाबप्रांत के जालंधर जिले के पास बहने वाली सतलुज नदी के किनारे बसे प्राकृतिक सम्पदा से सुसज्ज्ति तलवन नगरी में हुआ था।
जन्म के ग्रह लग्नों के अनुसार इनका नाम मुंशीराम रखा गया था। जन्म लग्नपत्रिका के अनुसार इनका नाम बुद्धि विवेक के देवता 'बृहस्पति' पड़ा ! सचमुच मुंशीराम ज्ञान सागर के गुरु साबित हुए। श्री मुंशीराम का जन्म एक सम्पन्न खत्री-परिवार में हुआ था। इनके दादा का नाम श्री गुलाब राय था। जो उस समय के राजा नौनिहाल सिंह की रानी श्रीमती हीरादेवी के मुख्य मुख्तार व मुंशी थे। इस कारणवश मुंशीराम का परिवार एक राजसम्मान से ओतप्रोत प्रतिष्ठित परिवार था। मुंशीराम के पिता का नाम लाला नानक चंद था, जो शहर कोतवाल के प्रतिष्ठित पद पर नियुक्त हुए थे।
मुंशीराम के प्रपितामह का नाम सुखानंद था। इनका ननिहाल तलवन में था। नाना-नानी को सुखानंद से हार्दिक स्नेह था। इसलिए उन्होंने सुखानंद को तलवन में ही अपने पास रख लिया।
सुखानंद के तीन पुत्र और एक पुत्री थी। जो मुंशीराम की मां थीं। सुखानंद जी के एक पुत्र का नाम लाला कन्हैयालाल था। जो उस समय महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में कपूरथला रियासत के वकील थे। उनके दूसरे पुत्र गुलाब राय थे। जो रानी हीरादेवी के मुख्तार थे रानी हीरादेवी जब जालन्धर आ गईं तो इन्हीं लाला गुलाब राय के पुत्र का नाम लाला नानक चंद था, जो मुंशीराम के पिता थे। लाला नानक चंद बड़े धर्मपरायण, ईश्वर-भक्त और बड़े ही शिव-भक्त थे। साथ ही साथ वे बड़े योग्य और कर्मठ व्यक्ति थे। अपनी योग्यता के आधार पर कपूरथला रियासत में थानेदार के पद पर नियुक्त हो गए।लाला नानक चंद ने बड़ी मेहनत और ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन किया। वह बहुत ही कार्यकुशल और स्पष्टवादी और सच्चे व्यक्ति थे। उनकी इन विशेषताओं के कारण रियासत के दीवान दानिश्चंद से लडा़ई हो गई। जिस कारण उन्होंने इस नौकरी को लात मार दी। नौकरी छोडऩे के बाद लाला नानक चंद काफी परेशानियों में फंस गए। उन्हें काफी समय तक कोई अच्छी नौकरी नहीं मिली। इधर पारिवारिक जिम्मेदारियां दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थीं। उन्हें अपने परिवार को अच्छी शिक्षा देना थी। लड़की प्रेम देवी सयानी हो रही थी। उसका विवाह करना था। पर आर्थिक परेशानियां कुछ करने नहीं दे रही थीं। सन् 1856 का समय, सामाजिक बदलाव का युग था। उस समय अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह की आग धीरे-धीरे सुलग रही थी। पूरे देश में अंग्रेजों के कपटपूर्ण व्यवहार के कारण वातावरण विस्फोटकरूप ले रहा था।
स्थान-स्थान पर छोटी-छोटी घटनाएं घट रही थीं, जो आने वाले समय का संकेत थीं। कानपुर, दिल्ली, मेरठ, झांसी, बंगाल और बिहार में विद्रोह की तैयारियां चल रही थीं। उस समय ही ऐसा लगने लगा था जैसे भारतवासी, अंग्रेजोंको हिन्दुस्तान से निकाल कर दम लेंगे।
पंजाब में भी अंग्रेज विरोधी वातावरण तैयार हो गया था। किन्तु अंग्रेज सरकार ने बड़ी चतुराई से विरोध की बोल वहां बढऩे सो रोक दी थी। इसके बावजूद उत्तर पश्चिमी भारत के प्रतिष्ठित नेताओं ने क्रांति फैलाने की कोशिशें जारी रखीं। हिसार में विद्रोह के अंकुर फूटने लगे। अंग्रेजी फौज को उसी समय हिसार पहुंचने के आदेश दिए गए।
अंग्रेज फौज अपने लाव-लश्कर समेत हिसार की ओर चल दी। उसी समय लाला नानक चंद ने भी रोजगार की तलाश में हिसार की ओर का रुख किया। अंग्रेज फौज शाम के समय हिसार शहर की सीमा पर पहुंच गई उसने शहर के बाहर अपना डेरा डाल लिया। अंग्रेजी फौज का कमांडर अपनी फौज हेतु भोजन के लिए बेचैनी से इधर-उधर देख रहा था। तभी लाला नानक चंद भी अपने घोड़े पर सवार होकर उधर से गुजरे, उन्होंने अंग्रेजी फौज के कमांडर को सलाम किया।
अंग्रेज कमांडर भी भोजन की तलाश में था। उसे लाला नानक चंद बहु प्रतिष्ठित सम्पन्न व्यक्ति लगे। उसने उन्हें तुरंत अपने पास बुलाया और फौज के लिए भोजन की व्यवस्था का अनुरोध किया। फौज दिन भर भूखी-प्यासी थी। अंग्रेज कमांडर खुद भी दिन-भर का थका-हारा था। भूख और प्यास दोनों से ही क्लांत था। इस स्थिति में और अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह के कारण किसी से सहायता मांगना भी उसे अनुचित लग रहा था। किस पर विश्वास किया जाये और किस पर नहीं। हिसार में भी अंग्रेजों को अपने दोस्त और दुश्मन का फर्क करना आसान नहीं था। नानक चंद के व्यक्तित्व में अंग्रेजों के प्रति शासक सम्मान भाव था जिस काराण कमांडर ने उनसे सहायता मांग ली। लाला नानक चंद तुरंत ही भोजन का इन्तजाम करने का वायदा कर हिसार रियासत के अन्दर घुसे चले गए। उन्होंने हिसार शहर में प्रवेश करते ही देखा कि एक चौधरी के यहां भारी मात्रा में भोजन की व्यवस्था है। चौधरी से पूछने पर नानक चंद को ज्ञात हुआ कि उस दिन चौधरी के पिता का श्राद्ध था इसलिए ब्राह्मण भोजन की व्यवस्था की हुई थी। लाला नानक चंद ने चौधरी को समझाया कि नगर के बाहर अंग्रेज फौज आ धमकी है। इस कारण इतने ब्राह्मण-भोजन करने शायद ही आ सकें। इस कारण इतना स्वादिष्ट भोजन व्यर्थ जायेगा। अगर यही भोजन भूखे-प्यासे अंग्रेंज सैनिकों तक पहुंचा दिया जाए तो खाना व्यर्थ भी नहीं जायेगा तथा इसके साथ-साथ अंगेज फौज प्रसन्न हो जायेगी, चौधरी को अंग्रेज सरकार से भारी इनाम मिलने की संभावना हो सकती है। चौधरी को लाला नानक चंद की राय समझ में आ गई। सारे पकवान लेकर अंग्रेज फौज के डेरों में जा पहुंचे। भूखे अंग्रेज अधिकारी इतनी भारी मात्रा में पकवान देखकर गद्गद हो गए। उसने ननाक चंद को गले लगा लिया। उनका नाम-पता पूछा और साथ-ही-साथ अंग्रेज कमांडर ने आगे फौज की मदद करते रहने का आश्वासन मांगा। लाला नानक चंद ने तुरंत ही उनकी बात मान ली। अंग्रेजी फौज ने हिसार शहर में फैली हुई विद्रोह की आग को बुजा दिया।

सेना ने नगर पर कब्जा कर लिया। धीरे-धीरे हिसार शहर की हालत सामान्य हो गई। लाला नानक चंद ने अंग्रेजी फौज की इस काम में भी सहायता की। इस कारण प्रसन्न होकर अंग्रेज सरकार ने उन्हें सरकारी सेवा में ले लिया और हिसार रियासत दार बनाकर सहारनपुर भेज दिया। उन्हें अभी सहारनपुर आये थोड़े ही दिन हुए थे कि अंग्रेजों ने नेपाल के पास नेपाल घाट की लड़ाई में फौज के साथ भेज दिया। यहां भी लाला नानक चंद ने बड़ी ईमानदारी और योग्यता के साथ अपने कार्य को सम्पन्न किया।

इसी दौरान उन्हे पुत्र रत्न के रूप में मुंशीराम की प्राप्ति हुई।
1857 में सारे देश में अंग्रेजों के खिलाफ महान क्रांति फैल गई। जगह-जगह अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह फैलने लगा। दिल्ली, अवध, बिहार, बंगाल, मध्य प्रदेश में विद्रोह ने अंग्रेज सरकार के छक्के छुड़ा दिए। सारे देश में अंग्रेजों विरुद्ध वातावरण स्थापित कर दिया था। करीब सारे देश में ही यह भावना फैली हुई थी पर अंग्रेज सरकार का सूर्य अभी अस्त होने वाला नहीं था। अंग्रेज सरकार ने बड़ी बेरहमी से यह विद्रोह दबा लिया।

लाला नानक चंद ने इस कार्य में भी अंग्रेजों का भरपूर साथ दिया, जिसके इनाम में उन्हें बरेली पुलिस इन्सपैक्टर बना दिया गया।

लाला नानक चंद को अपने सम्मानजनक पद के कारण मान-सम्मान मिलता था। जालंधर और तलवन में उनके परिवार को भरपूर सम्मान मिलता था। बालक मुंशीराम उनके छोटे पुत्र थे। उनके सीताराम, मूलाराम, आत्माराम नामक भाई थे और प्रेम देवी और द्रौपदी नाम की बहने थीं।
मुंशीराम अपने परिवार में सबसे छोटे थे। इसलिए घर और बाहर उन्हें सबसे ज्यादा लाड़-प्यार मिलता। तीन वर्ष के होने पर मुंशीराम अपने पिता के पास सपरिवार बरेली चले गए।
बरेली पुलिस लाइन में मुंशीराम दिनभर घूमते और खेलते रहते थे। उनके दो बड़े भाई आत्माराम व मूलाराम मौलवीसे पढऩे जाया करते थे। मुंशीराम भी उनके साथ यों ही चले जाते व अपने भाइयों के पास बैठे रहते। जो कुछ मौलवी जी इनके दोनों भाइयों को सिखाते वह सब मुंशीराम भी सीखते जाते। उनकी बुद्धि बचपन से ही बड़ी प्रखर थी।
लाला नानक चंद की बदली जब बरेली से बदायूं कोर्ट इंस्पैक्टर के पद पर हो गई थी, मुंशीराम तब बड़े हो गए थे। वह अपने पिता के साथ कोर्ट चले जाते थे। वहां मुहर्रिर, मुंशियों, वकीलों के साथ घूमते व खेलते रहते थे। जिनसे प्रसन्न होकर कागज, कलम, दवात आदि इनाम में मिलते थे।

इन्हीं कागजों पर दिन भर वह उर्दू, फारसी लिपि के अक्षर लिखने का अभ्यास करते रहते थे।
बदायूं के बाद मुंशीराम के पिता नानक चंद की बदली बनारस हो गई। बनारस में उनका पदोन्नति निरीक्षक पुलिस इन्सपैक्टर पद पर हो गई थी। उनको प्राय: दौरे पर रहना पड़ता था। इस वजह से उनका परिवार अकेला रहता था। इसलिए नानक चंद ने एक पंजाबी परिवार को बिना किराये के ही अपने मकान में जगह दे दी थी ताकि उनके बच्चों की अच्छी देखभाल हो सके।

पर वह पंजाबी परिवार धर्मान्ध और छुआछूत के विचारों से ग्रस्त था। बात-बात पर पुरातनपंथी आचरण के कारण नानक चंद के परिवार पर भी इस पंजाबी परिवार का असर पड़ा बालक मुंशीराम भी देखा-देखी छुआ-छूत का विचार करने लगा।
लाला नानक चंद अपने परिवार को इस तरह के दुष्प्रभाव से मुक्त रखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने इस मतिभ्रष्ट परिवार को अपने मकान से हटा दिया।